संवादसेतु

मीडिया का आत्मावलोकन…

संपादकीय

संवादसेतु का यह अंक अल्पविराम के बाद आपके समक्ष है। मिशनरी मीडिया की आज भी यह नियति है। यही इसकी शक्ति भी है। जिन लोगों का इसे प्रारंभ करनें में प्रारंभिक प्रयास था उनके अपनी समस्याओं में उलझने के कारण इसके कुछ अंक प्रकाशित न हो सके। इसका श्रेय सुधी पाठकों को जाता है कि उन्होंने न केवल टोकना जारी रखा बल्कि संवादसेतु के पुनः प्रकाशन हेतु प्रेरित किया। परिणाम है कि नवोदित पत्रकारों की टोली नये सहयोगियों, नयी ऊर्जा तथा नये संकल्प के साथ पुनः आपके सामने है। बीते कुछ महीनों में मीडिया जगत यथावत ही चला है। वही खबरों की खींच-तान, वहीं बयानों पर छिड़ी रार और वही प्रेस कोंसिल अध्यक्ष काटजू का बड़बोलापन। प्रेस क्लब के चुनाव में वही पैनल दोबारा चुन लिया गया जो पिछली बार भी जीता था।

मीडिया सक्रियता की बात करें तो वह दो मुद्दों पर खास तौर पर दिखायी दी। पहली संजय दत्त की सजा पर और दूसरी नरेन्द्र मोदी के मामले में मीडिया के यू-टर्न पर। कुछ समय पहले तक मीडिया की आंखों की किरकिरी रहे नरेन्द्र मोदी संभावित केन्द्रीय भूमिका के चलते कथित नेशनल मीडिया के दुलारे बन गये हैं। प्रयाग का महाकुंभ इस बार काफी मीडिया फ्रेंडली रहा। उमड़ती भीड के बीच भी प्रशासन ने मीडिया की सुविधाओं का खास ख्याल रखा। विदेशी मीडिया भी कुंभ में काफी जुटा किंतु उनकी रिपोर्टिंग सतही ज्यादा नजर आयी। उसकी खास रुचि स्नान करती महिलायों और नागा सन्यासियों में अधिक रही है। वही दृश्य उनके फोटो-फीचर का विशेष आकर्षण हमेशा रहते हैं। इस बार की रिपोर्टिंग में कुम्भ की समीक्षा बाजार के रूप में भी काफी की गयी। कुम्भ की व्यवस्थाओं पर होने वाले खर्चे और उसमें होने वाली बिक्री के गणित जुटाने के लिये पत्रकारों ने पिछले डेढ़ सौ वर्षों के सरकारी खाते खंगाल डाले।

इस सब से अलग, बहुत छोटे स्तर पर पत्रकारिता के विद्यार्थियों के गुण-संवर्ध्न हेतु कुछ गतिविधियां भी आयोजित हुईं। प्रभावी शीर्षक लेखन पर प्रेरणा, नोएडा में कार्यशाला का आयोजन किया गया तो दिल्ली मे माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय ने मीडिया शोध पर दो दिवसीय़ कार्यशाला का आयोजन किया। इसी बीच दिल्ली में पत्रकारों द्वारा प्रतिवर्ष वसंत पंचमी पर आयोजित होने वाले सरस्वती पूजन का भव्य आयोजन हुआ तो प्रेरणा में पत्रकारों का होली मिलन समारोह। दोनों ही कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में पत्रकार उपस्थित थे। इनका संक्षिप्त विवरण इस अंक में समाविष्ट है। संवादसेतु के इस अंक के कलेवर और विषयवस्तु पर आपकी टिप्पणी तथा आगामी अंक के लिये आपकी रचनाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

भारतीय नववर्ष की हार्दिक शुभकामना सहित,

आपका,

आशुतोष

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साहित्यिक पत्रकारिता के ‘अमृत‘ विद्यानिवास मिश्र

                                                                                                    viya nivas mishra
हिंदी पत्रकारिता को शिखर तक पहुंचाने में हिंदी साहित्य और साहित्यकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारतीयता, भारतीय संस्कृति और सनातन संस्कृति के प्रवाह को जीवंत बनाए रखने में हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता ने अपना अथक योगदान दिया है। आज के दौर में हिंदी पत्रकारिता जिस प्रकार साहित्य से विलग दिखाई पड़ती है, ऐसी पहले न थी बल्कि एक वक्त तो ऐसा भी था, जब साहित्य और पत्रकारिता एक-दूसरे का सहारा बन आगे बढ़ रहे थे। हिंदी पत्रकारिता को उसका ध्येय पथ दिखलाने का कार्य समय-समय पर ऐसे पत्रकारों ने किया, जो साहित्य की विधा में भी सिद्धहस्त थे। भारतेंदु हरीशचंद्र, माखनलाल चतुर्वेदी, हनुमान प्रसाद पोद्दार, महावीर प्रसाद, हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि इसी कड़ी के नाम हैं, जिन्होंने हिंदी की लड़ाई लड़ी। साहित्य और पत्रकारिता की इस विरासत को बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में प्रवाहमय बनाए रखने का कार्य किया विद्यानिवास मिश्र ने। मिश्र जी हिंदी साहित्य, परंपरा, संस्कृति के मर्मज्ञ थे।
हिंदी पत्रकारिता और साहित्य के बेहतरीन और कारगर सम्मिश्रण की मिसाल पेश करने वाले विद्यानिवास मिश्र ने पत्रकारिता के माध्यम से भारतीयता को मुखरता प्रदान की। सन 1926 में गोरखपुर के पकड़डीहा गांव में जन्मे विद्यानिवास मिश्र अपनी बोली और संस्कृति के प्रति सदैव आग्रही रहे। सन 1945 में प्रयाग विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर एवं डाक्टरेट की उपाधि लेने के बाद उन्होंने अनेकों वर्षों तक आगरा, गोरखपुर, कैलिफोर्निया और वाशिंगटन विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया। विद्यानिवास मिश्र देश के प्रतिष्ठित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय एवं काशी विद्यापीठ के कुलपति भी रहे। इसके बाद अनेकों वर्षों तक वे आकाशवाणी और उत्तर प्रदेश के सूचना विभाग में कार्यरत रहे। हिंदी साहित्य के सर्जक विद्यानिवास मिश्र ने साहित्य की ललित निबंध की विधा को नए आयाम दिए। हिंदी में ललित निबंध की विधा की शुरूआत प्रतापनारायण मिश्र और बालकष्ण भटट ने की थी, किंतु इसे ललित निबंधों का पूर्वाभास कहना ही उचित होगा। ललित निबंध की विधा के लोकप्रिय नामों की बात करें तो हजारी प्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र एवं कुबेरनाथ राय आदि चर्चित नाम रहे हैं। लेकिन यदि लालित्य और शैली की प्रभाविता और परिमाण की विपुलता की बात की जाए तोविद्यानिवास मिश्र इन सभी से कहीं अग्रणी रहे हैं। विद्यानिवास मिश्र के साहित्य का सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्सा ललित निबंध ही हैं। उनके ललित निबंधों के संग्रहों की संख्या भी 25 से अधिक होगी।
लोक संस्कृति और लोक मानस उनके ललित निबंधों के अभिन्न अंग थे, उस पर भी पौराणिक कथाओं और उपदेशों की फुहार उनके ललित निबंधों को और अधिक प्रवाहमय बना देते थे। उनके प्रमुख ललित निबंध संग्रह हैं- राधा माधव रंग रंगी, मेरे राम का मुकुट भीग रहा है, शैफाली झर रही है, चितवन की छांह, बंजारा मन, तुम चंदन हम पानी, महाभारत का काव्यार्थ, भ्रमरानंद के पत्र, वसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं और साहित्य का खुला आकाश आदि आदि। वसंत ऋतु से विद्यानिवास मिश्र को विशेष लगाव था, उनके ललित निबंधों में ऋतुचर्य का वर्णन उनके निबंधों को जीवंतता प्रदान करता था। वसंत ऋतु पर लिखे अपने निबंध संकलन फागुन दुइ रे दिना में वसंत के पर्वों को व्याख्यायित करते हुए, अपना अहंकार इसमें डाल दो शीर्षक से लिखे निबंध में वे शिवरात्रि पर लिखते हैं-

‘‘शिव हमारी गाथाओं में बड़े यायावर हैं। बस जब मन में आया, बैल पर बोझा लादा और पार्वती संग निकल पड़े, बौराह वेश में। लोग ऐसे शिव को पहचान नहीं पाते। ऐसे यायावर विरूपिए को कौन शिव मानेगा ? वह भी कभी-कभी हाथ में खप्पर लिए। ऐसा भिखमंगा क्या शिव है ?”


इसके बाद इन पंक्तियों को विवेचित करते हुए विद्यानिवास मिश्र लिखते हैं-

‘‘हां, यह जो भीख मांग रहा है, वह अहंकार की भीख है। लाओ, अपना अहंकार इसमें डाल दो। उसे सब जगह भीख नहीं मिलती। कभी-कभी वह बहुत ऐश्वर्य देता है और पार्वती बिगड़ती हैं। क्या आप अपात्र को देते हैं ? शिव हंसते हैं, कहते हैं, इस ऐश्वर्य की गति जानती हो, क्या है ? मद है। और मद की गति तो कागभुसुंडि से पूछो, रावण से पूछो, बाणासुर से पूछो।”

इन पंक्तियों का औचित्य समझाते हुए मिश्र जी लिखते हैं-

‘‘पार्वती छेड़ती हैं कि देवताओं को सताने वालों को आप इतना प्रतापी क्यों बनाते हैं ? शिव अट्टाहास कर उठते हैं, उन्हें प्रतापी न बनाएं तो देवता आलसी हो जाएं, उन्हें झकझोरने के लिए कुछ कौतुक करना पड़ता है।”


यह मिश्र जी की अपनी उद्भावना है, प्रसंग पौराणिक हैं, किंतु वर्तमान पर लागू होते हैं। पुराण कथाओं का संदर्भ देते हुए विद्यानिवास मिश्र ने साहित्य के पाठकों को भारतीय संस्कति का मर्म समझाने का प्रयास किया है। उनके ललित निबंधों में जीवन दर्शन, संस्कृति, परंपरा और प्रकति के अनुपम सौंदर्य का तालमेल मिलता है। इस सबके बीच वसंत ऋतु का वर्णन उनके ललित निबंधों को और अधिक रसमय बना देता है। ललित निबंधों के माध्यम से साहित्य को अपना योगदान देने वाले विद्यानिवास हिंदी की प्रतिष्ठा हेतु सदैव संघर्षरत रहे, मारीशस से सूरीनाम तक अनेकों हिंदी सम्मेलनों में मिश्र जी की उपस्थिति ने हिंदी के संघर्ष को मजबूती प्रदान की। हिंदी की शब्द संपदा, हिंदी और हम, हिंदीमय जीवन और प्रौढ़ों का शब्द संसार जैसी उनकी पुस्तकों ने हिंदी की सम्प्रेषणीयता  के दायरे को विस्तृत किया। तुलसी और सूर समेत भारतेंदु, अज्ञेय, कबीर, रसखान, रैदास, रहीम और राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं को संपादित कर उन्होंने हिंदी के साहित्य को विपुलता प्रदान की।

         विद्यानिवास जी कला एवं भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ थे। खजुराहो की चित्रकला का सूक्ष्मता और तार्किकता से अध्ययन कर उसकी नई अवधारणा प्रस्तुत करने वाले विद्यानिवास मिश्र ही थे। अकसर भारतीय चिंतक विदेशी विद्वानों से बात करते हुए खजुराहो की कलाकृतियों को लेकर कोई ठोस तार्किक जवाब नहीं दे पाते थे। विद्यानिवास जी ने अपने विवेचन के माध्यम से खजुराहो की कलाकृतियों की अवधारणा स्पष्ट करते हुए लिखा है-

‘‘यहां के मिथुन अंकन साधन हैं, साध्य नहीं। साधक की अर्चना का केंद्रबिंदु तो अकेली प्रतिमा के गर्भग्रह में है। यहां अभिव्यक्ति कला रस से भरपूर है। जिसकी अंतिम परिणति ब्रहम रूप है। हमारे दर्शन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की जो मान्यताएं हैं, उनमें मोक्ष प्राप्ति से पूर्व का अंतिम सोपान है काम।”

 उन्होंने कहा कि यह हमारी नैतिक दुर्बलता ही है कि खजुराहो की कलाकृतियों में हम विकृत कामुकता की छवि पाते हैं। स्त्री पुरूष अनादि हैं, जिनके सहयोग से ही सृष्टि जनमती है।सन 1990 के दशक में मिश्र जी ने नवभारत टाइम्स के संपादक के रूप में जिम्मेदारी संभाली। उदारीकरण के दौर में खांटी हिंदी पत्रकारिता को आगे बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण पत्रकारों में से एक मिश्र जी ने नवभारत टाइम्स को हिंदी के प्रतिष्ठित समाचार पत्र के रूप में नई पहचान दिलाई। पत्रकारीय धर्म और उसकी सीमाओं को लेकर वे सदैव सचेत रहते थे। वे अकसर कहा करते थे कि-

‘‘मीडिया का काम नायकों का बखान करना अवश्य है, लेकिन नायक बनाना मीडिया का काम नहीं है।” 

अपने पत्रकारीय जीवन में भी विद्यानिवास मिश्र हिंदी के प्रति आग्रही बने रहे। वे अंग्रेजी के विद्वान थे, लेकिन हिंदी लिखते समय अंग्रेजी के शब्दों का घालमेल उन्हें पसंद नहीं था। उन्होंने नवभारत टाइम्स के संपादक की जिम्मेदारी ऐसे वक्त में संभाली, जब हिंदी पत्रों के मालिक उदारीकरण के बाद बाजारू दबाव में हिंदी में अंग्रेजी के घालमेल का प्रयास कर रहे थे। अखबार मालिकों की मान्यता थी कि युवा पाठकों को यदि लंबे समय तक पत्र से जोड़े रखना है, तो हिंदी में अंग्रेजी शब्दों को जबरदस्ती ही सही घुसाना ही होगा। नवभारत टाइम्स के मालिक समीर जैन की भी यही मान्यता थी कि हिंदी समाचार पत्रों में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग होना वक्त की जरूरत है।  इन्हीं वाद-विवादों के बीच उन्होंने नवभारत टाइम्स के संपादक की जिम्मेदारी से स्वयं को मुक्त कर लिया, किंतु हिंदी में घालमेल को लेकर वे  कभी राजी नहीं हुए। हालांकि विद्यानिवास जी केनवभारत टाइम्स छोड़ने के बाद यह पत्र उसी राह पर आगे बढ़ा, जिस पर इसके मालिक समीर जैन ले जाना चाहते थे। विद्यानिवास जी ने नवभारत टाइम्स से अलग होने के बाद साहित्य अमृत पत्रिका का संपादन किया। व्यावसायिकता के बाजारू दौर में साहित्य अमृत पत्रिका ने विद्यानिवास जी के संपादकत्व में बतौर साहित्यिक पत्रिका नए मानक स्थापित किए। साहित्य अमृत का सौवां अंक भी विद्यानिवास जी के समय ही निकला था। पत्रिका के सौवें अंक के संपादकीय में संकल्पपूर्ण शब्दों में लिखा था-
‘‘हमें इतना परितोष है कि हम साहित्य अमृत पत्रिका को साहित्य की निरंतरता का मानदंड बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं।” 
                                                                                          sahitya-amrit
साहित्य अमृत पत्रिका ऐसे वक्त में जब पत्रकारीय मूल्य अन्य स्तंभों की भांति ही ढलान पर हों, बाजार के दबाव में आए बिना भारतीय संस्कृति के महत्व को उद्घाटित करती रही है। सौवें अंक के संपादकीय में भारतीयता का उद्घोष करते हुए विद्यानिवास मिश्र ने जयशंकर प्रसाद की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए लिखा-
‘‘किसी का हमने छीना नहीं, प्रकति का रहा पालना यही, हमारी जन्मभूमि थी यही, कहीं से हम आए थे नहीं।”

मिश्र जी साहित्य अमृत पत्रिका का संपादन अंतिम समय तक करते रहे। साहित्य अकादमी पुरस्कार, कालिदास पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्म विभूषण, पद्मश्री और अनेकों उपाधियों से सम्मानित विद्यानिवास मिश्र का 14 फरवरी, 2005 का सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया। उस वर्ष उनका प्रिय पर्व वसंत पंचमी 13 फरवरी को था। वसंत ऋतु में ही वे अपना शरीर त्यागकर इहलोक की यात्रा पर निकल पड़े। पं. विद्यानिवास मिश्र के इस दुनिया से जाने के बाद भी उनकी पत्रकारिता और साहित्य की सौरभ इस रचनाशील जगत को महकाती रहेगी।

 

फेसबुक क्रांति के नौ वर्ष

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4 फरवरी को दुनिया की सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक ने अपने जीवन का नौवां वसंत देखा। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के छात्र मार्क जुकरबर्ग ने 4 फरवरी, 2004 को फेसबुक की शुरूआत फेसमैश के नाम से   की थी। शुरू में यह हार्वर्ड के छात्रों के लिए ही अंतरजाल का काम कर रही थी, लेकिन शीघ्र ही लोकप्रियता मिलने के साथ इसका विस्तार पूरे यूरोप में हो गया। सन 2005 में इसका नाम परिवर्तित कर फेसबुक कर दिया गया। दुनिया भर में 2.5 अरब उपयोगकर्ताओं वाली फेसबुक में भी वक्त के साथ कई आयाम जुड़ते चले गए। सन 2005 में फेसबुक ने अपने उपयोगकर्ताओं को नई सौगात दी, जब उसने उन्हें फोटो अपलोड करने की भी सुविधा प्रदान की।
          फेसबुक के सफर का यह सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी कदम था, जिसने वर्चुअल दुनिया को नए आयाम देने का काम किया। फोटो अपलोड करने की सुविधा इस लिए क्रांतिकारी कदम थी, क्योंकि फोटो के माध्यम से विचारों की अभिव्यक्ति को जीवंतता मिली। बदलते वक्त और बदलते समाज का आईना बनी फेसबुक से देखते ही देखते नौ वर्षों में अरबों लोग जुड़े। सन 2006 के सितंबर माह में फेसबुक ने 13 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को फेसबुक से जुड़ने की स्वतंत्रता प्रदान की। इससे इसका दायरा और भी व्यापक हुआ। प्रारंभ में फेसबुक का उपयोग सोशल नेटवर्क स्थापित करने और नए लोगों से जुड़ने के लिए ही होता रहा। लेकिन वक्त की तेजी के साथ ही फेसबुक को भी नए आयाम मिले। संगठित मीडिया की चुनी हुई और प्रायोजित खबरों की घुटन से निकलने के लिए भी सामाजिक तौर पर सक्रिय लोगों ने फेसबुक का प्रयोग किया। दिसंबर 2010 में विश्व ने अरब में क्रांति का अदभुत दौर देखा, अद्भुत इसलिए कि अरब के जिन देशों में कई दशकों से तानाशाही शासन चल रहा था, वहां लोगों ने सड़कों पर उतरकर मुखर प्रदर्शन किया। प्रदर्शन ही नहीं तानाशाहियों को सत्ता से खदेड़ने का काम किया। समस्त विश्व उस समय हतप्रभ रह गया कि यह कैसे हुआ ?
       जिस अरब में आम लोग सरकार की नीतियों की आलोचना करने से भी डरते थे, वहां सत्ता विरोधी ज्वार अचानक कैसे आया। इसका उत्तर केवल यही था, सोशल मीडिया के कारण। ट्यूनीसिया, मिस्र, यमन, लीबिया, सीरिया, बहरीन, सउदी अरब, कुवैत, जार्डन, सूडान जैसे पूर्व मध्य एशिया और अरब के देशों ने क्रांति की नई सुबह को देखा। इसका कारण यही था कि वहां के सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा संचार माध्यमों पर लागू लौह परदा के सिद्धांत का विकल्प लोगों को सोशल मीडिया के रूप में मिल गया। सरकारी मीडिया आमजन की जिस आवाज और गुस्से को मुखरित होने से रोक देता था, सोशल मीडिया ने उसका विकल्प और जवाब आम जन के सामने रखा।
               सरकारी बंदिशों, संपादकीय नीति और समाचार माध्यमों पर बने बाजारू दबावों से मुक्त सोशल मीडिया ने आमजन की आवाज को मंच प्रदान कर मुखरित करने का कार्य किया। सोशल मीडिया द्वारा उभरी इस क्रांति का सबसे लोकप्रिय वाहक बना फेसबुक। एक समय पर अनेकों लोगों के संवाद करने की सुविधा, विचारों को आदान-प्रदान करने का मंच, जिसमें शब्दों की सीमा में बंधे बिना अपने विचारों को अभिव्यक्त किया जा सकता है। फेसबुक की इसी विशेषता ने आमजन के बीच चल रहे विचारों के प्रवाह को दिशा प्रदान की। अपनी व्यस्त जिंदगी में लोगों ने फेसबुक के माध्यम से अपने विचारों को एक-दूसरे को सहज ढंग से पहुंचाया और राजनीतिक-सामाजिक समस्याओं के प्रति जनांदोलनों की नींव रखी जाने लगी। सोशल मीडिया जनित यह आंदोलन अरब देशों तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि अमरीका के वाल स्ट्रीट होते हुए, यह दुनिया के सबसे बड़े  लोकतंत्र के जंतर-मंतर तक पहुंच गए। अमरीका में वाल स्ट्रीट घेरो आंदोलनहुआ, जिसमें अमीर देश का तमगा धारण किए अमरीका के नागरिकों ने आंदोलन किया और देश के संसाधनों का 1 प्रतिशत लोगों के हाथों में सिमटना चिंताजनक बताया। अमरीका में हुए इस आंदोलन ने दुनिया भर का ध्यान खींचा। इस आंदोलन ने बताया कि दुनिया का शीर्ष देश कहलाने वाले अमरीका में भी किस पर गैरबराबरी व्याप्त है। आंदोलनों की इस बयार से भारत भी अछूता नहीं रहा और यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार और नीतिगत असफलताओं को लेकर जंतर-मंतर से सड़कों तक सत्ता विरोधी आंदोलन के स्वर मुखरित हुए। यह आंदोलन सोशल मीडिया और उसके प्रमुख घटक फेसबुक की ही देन थे।
            फेसबुक के नौवें जन्मदिन से कुछ दिन पूर्व ही एक आंदोलन और हुआ। दिल्ली में हुए गैंगरेप के विरोध में आंदोलन। यह आंदोलन तो पूरी तरह उसी जमात का था, जिसे फेसबुकिया या सोशल मीडिया के क्रांतिकारी कहा जाता रहा है। यह कहना ठीक ही होगा कि अपने नौंवा वर्षों के संक्षिप्त समय में फेसबुक ने नई उंचाईयों को छुआ है और मुख्यधारा की मीडिया से अलग भी वैयक्तिक राय की स्वतंत्रता प्रदान करते हुए विभिन्न आंदोलनों को मूर्त रूप दिया है। उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में भी फेसबुक नए पायदान चढ़ता जाएगा और वर्चुअल दुनिया की यह क्रांतिकारी बुक आने वाले वक्त में भी आमजन की आवाज को मुखरता प्रदान करती रहेगी।

खलनायक नहीं, नायक है तू

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समरथ को नही दोष गोसाईं की पंक्तियां व्यवस्था में मत्स्य न्याय जैसी स्थिति की तरफ संकेत करने के लिए उपयोग में लाई जाती हैं। जब कानून व्यक्तियों का भार देखकर काम करने लगता है, व्यक्ति की प्रतिष्ठा और प्रभावित करने की क्षमता से संविधान के अनुच्छेद घुटन सी महसूस करने लगते हैं, तब गोस्वामी तुलसीदास की यह पंक्तियां बरबस याद आ जाती हैं। अभी तक इस पंक्ति का उपयोग राजनीतिक-आर्थिक संदर्भों में होता रहा है। शायद, यह मान लिया गया था कि सामथ्र्य इन दोनों क्षेत्रों तक सीमित रहती है। व्यवस्था के पारंपरिक ढांचे का विश्लेषण एक हद तक इस मान्यता पर मुहर भी लगाता है कि रसूख का स्वरूप या तो राजनीतिक होता है अथवा आर्थिक। लेकिन हाल-फिलहाल की कुछ घटनाएं इस बात की तरफ इशारा करती हैं कि रसूखदारी अब राजनीति अथवा आर्थिकी की बपौती नहीं रह गई है।
 सामर्थ्य में हिस्सेदारी रखने वाले कुछ नवघटक व्यवस्था में जुड़ चुके हैं। संजय दत्त की सजा के बाद जिस तरह का गुबार और अंधड़ पैदा करने की कोशिश की गई, वह इस बात की तस्दीक करते हैं। सजा के बाद व्यवस्था की विसंगतियों पर जैसे गंभीर सवाल उठाए गए और जिस तरह से दूर-दराज के अपरिचित हमदर्द मदद के लिए सामने आए, उससे तो ऐसा लगा कि मानो गलती संजय दत्त की नहीं, माननीय उच्चतम न्यायालय की है। संजय दत्त के खिलाफ हुई कथित ज्यादती को दूर करने के लिए कुछ लोगों ने व्यवस्था परिवर्तन की बात की तो कुछ अन्य ने व्यवस्था के गैर-पारंपरिक विधानों का उपयोग कर उच्चतम न्यायालय द्वारा हो गई गलती को सुधारने का अभियान चलाया। इस अभियान के मुखिया बने प्रेस परिषद् के अध्यक्ष – मार्कंडेय काटजू और इस गंभीर वैधानिक विमर्श को आगे बढ़ाया मीडिया ने।
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मार्कंडेय काटजू ने बहस की शुरूआत करते हुए कहा कि क्योंकि संजय दत्त एक अच्छे आदमी हैं, उनके पास परिवार है और उनका ताल्लुक एक समाजसेवी परिवार से है, इसलिए मानवीय आधार पर उनको सजा से मुक्ति मिलनी चाहिए। इसके बाद तो संजय दत्त के पक्ष में जिरह करने वालों की भीड़ लग गई। कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने कहा अपराध के समय उनकी उम्र मात्र 33 वर्ष थी। उन्होंने बचपने में एक गलती कर दी थी, इसलिए उनको क्षमादान मिलना चाहिए। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मानना था कि संजय दत्त पहले ही काफी कुछ भुगत चुके हैं और अधिक सजा की जरूरत नहीं है। अभिनेत्री राखी सावंत तो इतनी भावविह्वल थीं कि उन्होंने खुद को संजय की जगह जेल जाने के लिए प्रस्तुत कर दिया। आंध्र के पूर्व अभिनेता और वर्तमान में नेता चिरंजीवी ने कहा कि संजय ने काफी सजा पहले ही काट ली है, अब उनको दया के आधार पर सजा से मुक्त कर दिया जाना चाहिए। धर्मेंद्र ने फरमाया कि मेरा हृदय संजय के लिए रोता है। बीमार अमर सिंह यकायक सक्रिय हो गए और वह अभिनेत्री जयाप्रदा को लेकर महाराष्ट्र के राज्यपाल के.शंकरनारायणन के पास जा पहुंचे तथा दरबार में माफी की गुहार लगाई। इन सारे लोगों के पास कोई ठोस तर्क नहीं थे। अपने को हमेशा क्रांतिकारी मुद्रा और नई सोच की पैरोकार के रूप में प्रस्तुत करने वाली तवलीन सिंह ने भी अपनी धारदार कलम संजय के पक्ष में चलाई। सभी माननीय, बेचारे संजय के हक की लड़ाई मानवीय मूल्यों के आधार पर लड़ रहे थे।
 संजय दत्त की असली पैरवी तो आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में से एक शांतिभूषण ने की। उन्होंने 26 मार्च को द हिंदू में एक लेख लिखकर कानूनी जिरह की और उच्चतम न्यायायलय से संजय दत्त को सजा देने की अपनी गलती सुधारने की अपील की। इस लेख में उन्होंने लिखा कि संजय दत्त ने सांप्रदायिक हिंसा से उपजी हुई स्थितियों को ध्यान में रखते हुए अपने पास एके-56 जैसे हथियार रखे थे। उस समय उग्र भीड़ कुछ भी कर सकती थी, इसलिए उन्होंने उग्र भीड़ से अपनी रक्षा के लिए सुरक्षा के घातक हथियार रखे थे। किसी भी व्यक्ति को अपनी सुरक्षा के लिए ऐसा करने का हक है। अब चूंकि भारतीय कानून घातक हथियारों का लाइसेंस नहीं देते, इसलिए संजय दत्त के पास डी कंपनी की शरण में जाने के सिवाय कोई विकल्प ही नहीं बचा था।
पहली श्रेणी के तर्क तो इतने सतही और भोथरे हैं कि उनके खंडन की जरूरत ही नहीं पड़ती। अब यदि किसी अपराधी के लिए इस आधार पर क्षमा मांगी जाए कि उसके पास बीवी-बच्चे हैं, तब तो भारत के 99 प्रतिशत अपराधियों को छोडना पड़ेगा। वैसे भी पिछले कुछ समय में काटजू द्वारा दिए गए बयानों का विश्लेषण करने से यह स्पष्ट होता है कि वह मानते हैं कि सारी विद्वता उनके पास है और निर्णय सुनाने का तो वह एकाधिकार रखते हैं। शायद, इसी कारण अधिकांश पत्रकार उनको मूर्ख लगते हैं। संजय दत्त के प्रकरण में भी वह अपने से असहमति रखने वाले लोगों को खुलेआम मूर्ख और बेवकूफ बता रहे थे। उनको याद रखना चाहिए कि वह माननीय न्यायालय की परिधि से बाहर आ चुके हैं। अब उनके निर्णयों और कथनों से सैकड़ों लोग असहमत होंगे। इस स्थिति में गुर्राने की बजाय सलीके से और तथ्यों और तर्कों के आधार पर बातचीत करना ही अधिक प्रभावी होता है।
 मीडियाई क्षेत्र तो वैसे भी बाल की खाल निकालने के लिए प्रसिद्ध है और जब खाल ही उधड़ी हुई हो तो मीडिया को खिंचाई करने से कौन रोक सकता है ?  अन्य लोग तो हमदर्दी दिखाने के बहाने यह सिद्ध करना चाह रहे थे कि बालीवुड की पैरोकारी का दमखम उन्हीं के पास है और जब उच्चतम न्यायालय ने अन्याय किया है तो सभी लोग, सभी दिशाएं देख लें कि वह हक की लड़ाई लडने में सबसे आगे हैं। दिग्विजय सिंह तो बयान ही खंडन करने के लिए देते हैं। हेमंत करकरे के बारे मे दिग्विजय के बयान का खंडन कुछ ही मिनटों में खुद करकरे की पत्नी ने कर दिया था। अब यदि मान लिया जाए कि संजय 33 साल की उम्र में एके-56 जैसे खिलौने का महत्व नहीं जानते थे, फिर भी उनको पाक-साफ नहीं बताया जा सकता। एबीपी न्यूज सन् 2000 में उनके दाउद के दाहिने हाथ माने जाने वाले गुर्गे से बातचीत के टेप का प्रसारण कर चुका है। अब प्रश्र यह उठता है कि संजय दत्त से अनजाने में गलती हुई थी तो 7 सालों बाद वह क्यों पाकिस्तानी आकाओं को याद कर रहे थे और कुछ फरियादें भी कर रहे थे।
अब कानूनी पक्ष की बात करते हैं। कानून की बारीकियों में जाने से पहले यह आवश्यक हो जाता है कि हम संजय दत्त के अपराधों की पड़ताल कर लें।
 टाडा कोर्ट में सीबीआई ने संजय दत्त के ऊपर जो आरोप लगाए हैं उसके अनुसार 16 जनवरी 1993 को अबू सलेम ने 3 एके-56 रायफलें, 25 हैंडग्रेनेड और 7 एमएम की पिस्टल रखने के लिए दी। इनमें से एक एके-56 रायफल को अपने पास रखकर, शेष सारे हथियार उन्होंने हनीफ लाकड़ावला और समीर हिंगोरा को सौंप दिए। मॉरीशस में शूटिंग के दौरान संजय दत्त को इस बात का पता चला कि सीबीआई मुंबई बम विस्फोटों में उनकी संलिप्तता की भी जांच कर रही है। उन्होंने युसूफ नलावाला, अजय मारवा और रसी मुल्लावाला को इन हथियारों को नष्ट करने की जिम्मेदारी दी। शुरूआत में, संजय दत्त पर टाडा के तहत मुकदमा चलाया गया, बाद में पता नहीं किन कारणों से उन पर से टाडा हटा लिया गया और केवल आम्र्स एक्ट के तहत मुकदमा चलाया जाने लगा। संजय ने न्यायालय में इन तथ्यों की स्वीकारोक्ति भी की।
 अब प्रश्र यह उठता है कि क्या दया का अधिकार केवल सबल को मिलना चाहिए या सबल ही दया मांगने की क्षमता रखता है ? जिस आधार पर संजय के लिए,क्षमादान मांगा जा रहा है , क्या इसी आधार पर अन्य लोगों के लिए भी पैरोकारी करने के लिए लोग सामने आएंगे ? नेशलन क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरों के 2011 के आंकड़ों के अनुसार पूरे भारत में लगभग 2 हजार लोग आम्र्स एक्ट के तहत सजा भुगत रहे हैं, जबकि 10 हजार से अधिक लोगों पर आम्र्स एक्ट के तहत मुकदमे चल रहे हैं। इनमें अधिकांश बहुत ही साधारण हथियार रखने के दोषी पाए गए हैं। इसी साल के आंकड़ों के अनुसार 1 लाख 28 हजार सजायाफ्ता कैदियों में से 73 प्रतिशत दसवीं फेल हैं इनमें 30 प्रतिशत तो निरक्षर है। इसी तरह 2 लाख 41 हजार विचाराधीन कैदियों में निरक्षर कैदियों की संख्या 29.5 प्रतिशत और दसवीं फेल कैदियों की संख्या 42.4 प्रतिशत है। इन निरक्षरों और गरीबों के लिए देश में कोई काटजू अपनी आवाज नहीं उठाता। दया का थोड़ा-बहुत हक तो इनका भी है।
 दया, निर्बलों और असहायों के लिए मांगी जाती है। जब व्यक्ति संसाधनों के अभाव में अपनी लड़ाई नहीं लड़ पाता अथवा बिना किसी गुनाह के किसी को सजा दे दी जाती है, तब दया मांगी जाती है। यहां तो उल्टी गंगा बहाने की कोशिश की जा रही है। अभियुक्त अपने गुनाहों को स्वीकार कर चुका है और सार्वजनिक रूप से यह घोषणा भी कर चुका है कि वह क्षमादान नहीं मांगेगा। फिर भी, उसके  नाम पर कुछ लोग कटोरा लिए हुए घूम रहे हैं। यह अजीब स्थिति है। खलनायक और खलनायकी को वैध ठहराने के प्रयास किसी स्वस्थ व्यवस्था में तो नहीं होते। संजय दत्त का क्षमादान प्रकरण, पूंजी के अबाध प्रवाह के कारण पैदा हुए नवधनाढ्यों की अनियंत्रित मनःस्थिति का संकेतक है। यह अनियंत्रित मनोवृत्ति व्यवस्था को अपने ठेंगे पर नचाना चाहती है और सही-गलत को अपने ढंग से परिभाषित करने की कोशिश करती है। व्यवस्था में ऐसी मनोवृत्ति के शिकार लोगों का प्रचार पाना किसी भी दृष्टि से शुभ नहीं कहा जा सकता।

आस्था नहीं, आश्चर्य का कुंभ

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सूचनाओं और संदेशों को उसके संदर्भों से काटकर प्रस्तुत करने की प्रक्रिया हमेशा अनर्थ को ही जन्म देती है। जड़ से कटी सूचना पाठक को भी दिग्भ्रमित करती है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में सूचना का स्वरुप भी वैश्विक हो गया है और तथ्य हर परिस्थितियों में समान रुप से प्रभावी होते हैं। लेकिन यह लोग भूल जाते हैं कि तथ्यों के चयन की प्रक्रिया कोई निरपेक्ष प्रक्रिया नहीं है, व्यक्ति की दृष्टि और स्थानीय संस्कृति इस चयन प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। यदि कुंभ को मीडियाई जगत में एक केस स्टडी मानकर अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि परिप्रेक्ष्य विहीन सूचना समझ को बढाती नहीं, बल्कि समझ के चारों ओर एक कुहासा पैदा कर देती है। शायद, इसी कारण, पश्चिमी नजरों में आस्था का एक सैलाब, संवाद का एक वृहद प्लेटफार्म, आश्चर्य के एक आयोजन के रूप में तब्दील हो जाता है। इलाहाबाद में लगभग दो महीने तक चले कुंभ में जहां करोड़ों लोगों ने आस्था की डुबकी लगाई। वहीं पश्चिमी मीडिया भी एक स्थान पर इतने लोगों को देखकर हतप्रभ रहा। ऐसे वक्त में जब उपभोक्तावादी संस्कृति हावी है, तब आस्था और आध्यात्म के संगम में इतने विशाल जनसमुदाय का एकत्रीरण कम से कम विदेशी मीडिया को तो हतप्रभ करने वाला ही था।
 विश्व के प्रतिष्ठित समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं ने कुंभ मेले को आश्चर्य की दृष्टि से देखा कि किस प्रकार से एक स्थान पर करोड़ों लोग एकत्रित हुए। है।संवाद सेतु की टीम ने पश्चिमी मीडिया की अंतर्वस्तु की पडताल कर उसके दृष्टिकोण को समझने की कोशिश की।
कुंभ पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए टाइम मैगजीन ने अपनी वेबसाइट पर लिखा-
‘‘मानव समुदाय का सबसे बड़ा एकत्रीकरण इन दिनों उत्तर भारत के इलाहाबाद शहर में चल रहा है। गंगा, यमुना एवं पौराणिक नदी सरस्वती के तट पर कुंभ मेले के उत्सव का आयोजन चल रहा है, जिसमें एक करोड़ से अधिक लोग एकत्रित हैं। यह ऐसा समय है जब भारत की वैश्विक चिंताएं बढ़ रही हैं और सामाजिक समस्याएं भी गहराई हैं, तब इन साधुओं के भभूत से सराबोर चेहरे और सिर पर सांपों की तरह से लिपटे बाल इन सभी समस्याओं को पिछली सीट पर धकेलने का काम करते हैं। जो पूरे उन्माद के साथ गंगा में डुबकी लगा रहे हैं। हालांकि इसमें कोई नई बात नहीं है कि भारत से बाहर का कोई भी व्यक्ति इसे समय की बर्बादी ही कहेगा। यहां 19वीं सदी में भारत में तैनात रहे एक अधिकारी का यह वक्तव्य महत्वपूर्ण है, जिन्होंने कुंभ को देखने के बाद यह महसूस किया था कि भारत को ईसाईयत के प्रभाव में लाना जरूरी है।‘‘
‘‘अब भी लोग इन पवित्र नदियों के संगम तट पर एकत्र होते हैं। इनमें से कुछ लोग तो जैसे अपना प्राण स्वेच्छा से त्यागने आते हैं। डूबी हुई लाशें जब ऊपर आती हैं तो वह गिद्धों का आहार बन जाती हैं जो आत्माहुति के इस स्थान के चारों तरफ मंडराते रहते हैं। कोई भी समझदार व्यक्ति यदि इस भयानक दृश्य को देखेगा तो प्रसन्नता और अविनाशी आनंद के पीछे पागल इन लोगों के मतांतरण करने की बात उसके भीतर जरूर जगेगी।‘‘
टाइम के अनुसार यह किसी के लिए भी आश्चर्य का विषय हो सकता है कि लोग इतनी विशाल भीड़ से क्यों जुड़ना चाहते हैं। कुछ निश्चित शुभ दिनों में गंगा, यमुना एवं सरस्वती के संगम तट पर लाखों लोग लोग एकत्र होते हैं। एटलांटिक क्वार्टज वेबसाइट ने इस मेले को वैश्विक संदर्भ में देखते हुए लिखा-
‘‘कल्पना करें कि शंघाई शहर की सारी आबादी 4 गुणा 8 किलोमीटर के मैदान में एकत्र होती है। यहां एकत्र आबादी को देखें तो न्यूयार्क का प्रत्येक व्यक्ति, महिला एवं बच्चे यहां अपनी हाजिरी दर्ज कराते हैं। इतना ही नहीं, मेेले का क्षेत्र भी पिछली बार की तुलना में बढ़ा है, जहां 2011 में मेले का क्षेत्रफल 1,495.31 हेक्टेयर था एवं 11 सेक्टरों में विभाजित था। वहीं 2013 में मेले का क्षेत्रफल 1936.56 हेक्टेयर एवं 14 सेक्टर हो गया। यह क्षेत्रफल लगभग 4,784 एकड़ हुआ जो लगभग दुनिया के सबसे बड़े पार्क मैड्रिड के कासा डे कैंपो के बराबर है।
इसी प्रकार से पत्रिका ने कुंभ के दौरान विभिन्न प्रकार प्रदूषण के आंकड़े भी निकाले हैं और मेला क्षेत्र को एक कठिन क्षेत्र करार देने का प्रयास किया है। हालांकि पत्रिका की वेबसाइट पर ही यूनिवर्सिटी आफ सेंट एंडयूज में फीजियोलाजिकल स्टीफन रिचर की यह पंक्तियां भी उद्धृत हैं, जिसमें उन्होंने कुंभ को सामाजिक संबंधों के विकास का प्लेटफार्म बताते हुए लिखा है-
 ‘‘ हमारा मानना है कि यह मेला सामाजिक संबंधों का परिचय कराता है और यह बताता है कि हम अकेले नहीं हैं। हम अन्य लोगों को भी बुला सकते हैं और वह लोग हमारे लिए सुरक्षा जाल का काम करते हैं। यहां आकर लोग एक-दूसरे के मंगल की कामना करते हैं और उसके बाद अपने जीवन की सामान्य पटरी पर लौट जाते हैं।‘‘
अंत में पत्रिका ने लिखा है कि संभवतः हिंदुओं के पूर्वज किसी समय एक उद्देश्य के लिए नदी किनारे एकत्र हुए होंगे और यह परंपरा आज भी जारी है। वहीं द गार्जियन ने अपनी वेबसाइट पर एक सवाल पूछा है कि
-दुनिया में ऐसी कौन सी जगह है, जहां किसी भी स्थान से अधिक लोग एकत्र होते हों ? मानव के समूचे इतिहास में ऐसा कौन सा स्थान है, जहां सबसे अधिक लोगों के पैरों के निशान हों ?
इस सवाल के जवाब में पाठकों ने मक्का, टाइम्स स्क्वायर, टोक्यो शिब्युआ क्रासिंग समेत कुंभ को वह स्थान बताया जहां दुनिया भर के किसी भी स्थान से अधिक लोग एकत्र होते हैं।
एक पाठक सेरजियो कार्वाल्हो का जवाब था कि-
‘‘मेरे अनुमान से भारत के इलाहाबाद में यमुना एवं गंगा के संगम तट पर दुनिया में सबसे अधिक लोग कुंभ मेले के दौरान एकत्रित होते हैं और हजारों तीर्थयात्री यहां अस्थियां भी प्रवाहित करते हैं। यहां पर लोग हजारों वर्षों से तीर्थयात्रा के उद्देश्य से एकत्र होते रहे हैं।‘‘
वहीं द मीडिया इंटरनेशनल ने कुंभ मेले को दुनिया का सबसे बड़ा पर्व करार देते हुए लिखा कि इस मेले में हज यात्रा से भी अधिक लोग एकत्र होते हैं।
बीबीसी ने मार्क टली की रिपोर्ट के जरिए कुंभ को सामाजिक समरसता, संवाद के मंच एवं विश्व कल्याण के उद्देश्य से लगे कुंभ मेले को केवल साधुओं के करतबों और नागा साधुओं तक ही सीमित रखा। मार्क टली ने अपनी रिपोर्ट में भारत में व्यतीत अपने जीवन में कुंभ को सबसे बड़ा आश्चर्य बताते हुए अमृत मंथन की कथा का जिक्र किया है और मेले में साधुओं के करतबों का जिक्र किया है। कुल मिलाकर बीबीसी की पूरी रिपोर्ट कुंभ को आश्चर्य बताने पर ही केंद्रित रही।
कुंभ मेले के संदर्भ में विदेशी मीडिया कवरेज की बात करें तो उसका पूरा ध्यान कुंभ को आश्चर्य एवं अंध आस्था बताने पर ही केंद्रित रहा। जबकि उसने कुंभ मेले के सामाजिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक पक्ष को नजरंदाज कर दिया। जहां मेले के दौरान दुनिया के अनेकों देशों से लोग इस आयोजन के बारे में जानने एवं उसमें भागीदारी के लिए आए थे तो उसके उलट विदेशी मीडिया ने अपनी बौखलाहट के कारण इस आयोजन को नकरात्मक तौर पर प्रस्तुत करने में ही अपनी सारी ताकत झोंक दी।

सम्पादकीय

आश्विन कृष्ण द्वितीया, तद्नुसार 14 सितम्बर 2011। श्राद्ध पक्ष।

आज हिन्दी का वार्षिक श्राद्ध है। मैं इस संयोग से विस्मित हूं कि हिन्दी दिवस अधिकांश श्राद्ध पक्ष में पड़ता है। जिस प्रकार श्राद्ध पक्ष में हम अपने पूर्वजों को स्मरण करते हैं, कुछ वैसे ही हिन्दी को भी याद करने का चलन चल पड़ा है।

मेरे एक पड़ोसी जब तक जीवित रहे, पुत्र-पुत्रवधू के साथ उनकी कभी बनी नहीं। उनकी मृत्यु के बाद वही पुत्र उनको स्मरण करते हुए भाव-विभोर हो जाता है। उनकी तिथि पर प्रतिवर्ष श्राद्ध में ग्यारह ब्राह्मणों को भोजन करा कर दक्षिणा देता है। मैंने एक बार उसे कहा- तुम्हारे पिता तुम्हारे आचरण से हमेशा व्यथित रहे। अब ऐसा क्या हो गया कि तुम इतना समारोहपूर्वक श्राद्ध करते हो। उसने उत्तर दिया –

उनकी तिथि हमें यह आश्वासन देती है कि वह अब लौट कर नहीं आयेंगे। संभवतः हिन्दी दिवस भी मनाने वालों को यही आश्वासन देता है। हिन्दी जल्दी नहीं आयेगी और वे लम्बे समय तक हिन्दी दिवस मना सकेंगे।

जो लोग हिन्दी पत्रकारिता को दशकों तक अंग्रेजी के अनुवाद की खूंटी पर टांग कर रखने के अपराधी हैं वहीं हिन्दी दिवस पर उसकी दुर्दशा का रोना रोते हैं। इस वार्षिक कर्मकाण्ड में उनका स्थान मंच पर तय है। हिन्दी के श्राद्ध के इन महाब्राह्मणों ने अपने भोज का इंतजाम पक्का कर रखा है। नये पत्रकारों को यह हिन्दी को सरल बनाने के लिये विदेशी भाषाओं के शब्द जोड़ने का नुस्खा बताते हैं और खुद हिन्दी के नाम पर विदेश यात्राओं की तिकड़म भिड़ाते हैं।

जिनकी दाल-रोटी हिन्दी के नाम पर चल रही है वही उसको गर्त में धकेलने में लगे हुए हैं। साहित्य के नाम पर लेखक जिस शब्दावली का प्रयोग भाषा में बढ़ाते जा रहे हैं उसका अर्थ समझाने में अध्यापकों को भी पसीना आने लगता है। देश के सबसे बड़े समाचार पत्र समूह का दावा करने वाले समूह के हिन्दी दैनिक के विषय में एक साहित्यकार ने टिप्पणी की कि अमुक हिन्दी पत्र में छपे समाचार को समझने के लिये पाठक को कम से कम स्नातक तक अंग्रेजी पढ़ा होना जरूरी है।

हाल ही में लगे पुस्तक मेले में हर प्रकाशक बिक्री न होने का दुखड़ा रोता मिला। ग्यारह सौ प्रतियां छाप कर पुस्तकालयों में पहुंचाने के बाद प्रकाशक अपने कर्तव्य को पूरा मान लेते हैं। एक-एक प्रकाशक कई-कई नामों से पुस्तकें बेचने की कोशिश करते मिलते हैं। फर्जीवाड़ा यहां तक आ पहुंचा है कि एक ही पुस्तक को दो नामों से छाप कर पुस्तकालयों में खपा दिया जाता है।

हिन्दी की हालत गाय जैसी हो गयी है। उसे पालना बोझ है और काट कर मांस और खाल बेचना मुनाफे का सौदा। इस स्थिति में हिन्दी को बचायेगा कौन। इन कसाइयों के मुंह तो हिन्दी का खून लग चुका है।

इस अंधेरे में भी उम्मीद की एक किरण आती दिख रही है। पेशेवर हिन्दी वालों से इतर शौकिया हिन्दी गुनगुनाने वालों ने इंटरनेट पर हिन्दी का एक वितान बुन दिया है। उन्हें न सरकारी खरीद में कोई रुचि है और न किताबें बेचने की ललक। कोमल-कठोर शब्दों का एक अनगढ़ आसमान आकार ले रहा है। हिन्दी दिवस के इस वार्षिक श्राद्ध पर जब हम दक्षिण दिशा में मुख कर हिन्दी की पेशेवर दुनियां को तर्पण करें तो अदम्य उत्साह से भरी युवा साहित्यकारों की नवोदित पीढ़ी के उजास को पूरब की ओर मुंह कर अर्घ्य देना न भूलें। हिन्दी के भविष्य का सूरज भी इस पूरब से ही निकलेगा और इंटरनेट आधारित संवाद माध्यमों का मंगलाचरण भी इस प्राची में ही गूंजेगा।

हिन्दी हूं मैं…

एक रात जब मैं सोया तो मैंने एक सपना देखा, जिसका जिक्र मैं आपसे करने पर विवश हो गया हूं। सपने में मैं हिन्दी दिवस मनाने जा रहा था। तभी कहीं से आवाज आई…रुको! मैंने मुड़कर देखा तो वहां कोई नही था। मैं फिर चल पड़ा..फिर आवाज आयी…रुको! मेरी बात सुनो। मैंने गौर से सुना तो लगा कि कोई महिला जैसे वेदना भरे स्वर में मुझे पुकार रही हो। मैंने पूछा आप कौन हो जवाब आया…मैं हिन्दी हूं। मैंने कहा कौन हिन्दी\ मैं तो किसी हिन्दी नाम की महिला को नहीं जानता। दोबारा आवाज आई…तुम अपनी मातृभाषा को भूल गए, मेरे तो जैसे रोंगटे खडे़ हो गए…मैंने कहा मातृभाषा आप! मैं आपको कैसे भूल सकता हूं। फिर आवाज आयी…जब तुम सब मुझे बोलने में शर्म महसूस करते हो, तो भूलना न भूलना बराबर ही है।

फिर हिन्दी ने बोलना शुरू किया – तुम मेरी शोक सभा में जा रहे हो न,  मैंने कहा ऐसा नहीं है ये दिवस आपके सम्मान में मनाया जाता है। हिन्दी ने कहा – नहीं चाहिए ऐसा सम्मान… मेरा इससे बड़ा अपमान क्या होगा कि हिन्दुस्तानियों को हिन्दी दिवस मनाना पड़ रहा है।

उसके बाद हिन्दी ने जो भी कहा वो इन पंक्तियों के माध्यम से प्रस्तुत है…

 हिन्दी हूं मैं! हिन्दी हूं मैं..

भारत माता के माथे की बिन्दी हूं मैं

देवों का दिया ज्ञान हूं मैं,

हिन्दुस्तानियों का ईमान हूं मैं,

इस देश की भाषा थी मैं,

करोड़ों लोगों की आशा थी मैं,

हिन्दी हूं, मैं! हिन्दी हूं मैं..

भारत माता के माथे की बिन्दी हूं मैं।

सोचती हूं शायद बची हूं मैं,

किसी दिल में अभी भी बसी हूं मैं,

पर अंग्रेजी के बीच फंसी हूं मैं,

न मनाओ तुम मेरी बरसी,

मत करो ये शोक सभाएं,

मत याद करो वो कहानी,

जो नहीं किसी की जुबानी

सोचती थी हिन्द देश की भाषा हूं मैं,

अभिव्यक्ति की परिभाषा हूं मैं,

सच्ची अभिलाषा हूं मैं,

लेकिन अब निराशा हूं मैं,

जी हां हिन्दी हूं मैं,

भारत मां के माथे की बिन्दी हूं मैं।।

इस सपने के बाद मैं हिन्दी दिवस के किसी कार्यक्रम में नहीं गया। घर में बैठ कर बस यही सोचता रहा कि क्या आज सच में हिन्दी का तिरस्कार हो रहा है\ क्या हमें अपनी मातृभाषा के सम्मान के लिए किसी दिन की आवश्यकता है? शायद नहीं…

मेरा तो यही मानना है कि आप अपनी मातृभाषा को केवल अपने दिलों-जुबान से सम्मान दो और अगर ऐसा सब करें तो हर दिन हिन्दी दिवस होगा।

जय हिन्द, जय हिन्दी…

हिमांशु डबराल, सितम्बर अंक २०११

 

आपातकाल की हिन्दी पत्रकारिता का अनुशीलन

25 जून 1975 भारत के इतिहास में एक ऐसा काला दिवस रहा है जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर भय, आतंक और दहशत का माहौल बना दिया। 19 महीनों तक चले आपातकाल के काले बादल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी छाए और इंदिरा गांधी ने प्रेस पर भी सेंसरशिप थोप दी। आपातकाल के चलते पत्रिका के स्वरूप में बड़ा बदलाव देखा गया और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया तानाशाही का शिकार हुआ।

वर्ष 1974 तक पत्रकारिता के माध्यम से सत्ता और सरकार की सर्वत्र आलोचना हो रही थी। देश में भ्रष्टाचार, शैक्षणिक अराजकता, महंगाई और कुव्यवस्था के विरोध में समाचार-पत्रों में बढ़-चढ़ कर लिखा जा रहा था। गुजरात और बिहार में छात्र-आंदोलन ने जनांदोलन का रूप ले लिया था जिसके नेतृत्व का भार लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने अपने कंधों पर ले लिया। उन्होंने पूरे देश में संपूर्ण क्रांति आंदोलन का आह्वान कर दिया था। दूसरी ओर लंबे समय तक सत्ता में बने रहने, सत्ता का केंद्रीयकरण करने, अपने विरोधियो को मात देने और बांग्लादेश बनाने में अपनी अहम भूमिका के कारण इंदिरा गांधी में अधिनायकवादी प्रवृत्तियां बढ़ती चली गईं और जब इलाहबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद अपने-आपको सत्ता से बेदखल होते पाया तो उन्होंने अपने कुछ चापलूसों के परामर्श से आपातकाल की घोषणा का निर्णय ले लिया। 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्षी नेताओं की जनसभा से श्रीमती गांधी घबरा गईं और उन्होंने आपातकाल की घोषणा कर दी।

आपातकाल के दौरान एक ओर जहां सत्ता और सरकार की चापलूसी करने वाले पत्रकार थे, वहीं दूसरी ओर प्रेस की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले पत्रकारों की भी कमी नहीं थी। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर, देवेंद्र स्वरूप, श्याम खोसला, सूर्यकांत बाली, के.आर. मलकानी जैसे पत्रकारों ने तो जेल की यातनाएं भी भोगीं। इसके विपरीत ऐसे पत्रकारों की भी कमी नहीं थी, जिन्होंने सेंसरशिप को स्वीकार किया और रोजी-रोटी के लिए नौकरी को प्राथमिकता दी। यही स्थिति साहित्यकारों के साथ भी थी।

स्वतंत्र भारत में वर्ष 1975 में आपातकाल की घोषणा के साथ ही पत्र-पत्रिकाओं पर सेंसरशिप लगा दी गई, किंतु तमाम प्रतिबंधों के बावजूद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पूरी तरह ग्रहण नहीं लग सका। पत्र-पत्रिकाओं पर सेंसर लगा तो भूमिगत बुलेटिनों ने कुछ हद तक इसकी क्षतिपूर्ति की। कुछ संपादकों ने संपादकीय का स्थान खाली छोड़कर तो कुछ ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में महापुरूषों की उक्तियों को छापकर सरकार का विरोध किया।

सेंसरशिप और अन्य प्रतिबंधों के कारण सरकार और समाज के बीच सूचनाओं का प्रसारण इकतरफा हो रहा था। सरकार की घोषणाओं और तानाशाही रवैये की खबर तो किसी न किसी रूप में जनता तक पहुंच जाती थी, किंतु जनता द्वारा आपातकाल के विरोध और सरकारी नीतियों की आलोचना की खबर सरकार तक नहीं पहुंच पाती थी। सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों के सहारे ही अखबारों में अधिकतर समाचार छप रहे थे। इकतरफा पक्ष की बार-बार प्रस्तुति से पत्र-पत्रिकाओं की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया था। इसलिए इकतरफा संचार के कारण आपातकाल के 19 महीनों तक सरकार गलतफहमी में रही, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा।

सेंसरशिप के कड़े प्रतिबंधों और भय के वातावरण के कारण अनेक पत्र-पत्रिकाओं को अपने प्रकाशन बंद करने पड़े। इनमें सेमिनार और ओपिनियन के नाम उल्लेखनीय हैं। आपातकाल के दौरान 3801 समाचार-पत्रों के डिक्लेरेशन जब्त कर लिए गए। 327 पत्रकारों को मीसा में बंद कर दिया गया। 290 अखबारों के विज्ञापन बंद कर दिए गए। विदेशी पत्रकारों को भी पीडि़त-प्रताडि़त किया गया। ब्रिटेन के टाइम और गार्जियन के समाचार-प्रतिनिधियों को भारत से निकाल दिया गया। रायटर सहित अन्य एजेंसियों के टेलेक्स और टेलीफोन काट दिए गए। आपातकाल के दौरान 51 पत्रकारों के अधिस्वीकरण रद्द कर दिए गए। इनमें 43 संवाददाता 2 कार्टूनिस्ट तथा 6 कैमरामैन थे। 7 विदेशी संवाददाताओं को भी देश से बाहर जाने को कहा गया।

प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश डालने के लिए समाचार-समितियों का विलय किया गया। आपातकाल के पूर्व देश में चार समाचार-समितियां थीं – पी.टी.आई., यू.एन.आई., हिंदुस्थान समाचार और समाचार भारती जिन्हें मिलाकर एक समिति समाचार का गठन किया गया था जिससे यह पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में रहे। आपातकाल के दौरान आकाशवाणी और दूरदर्शन पर से जनता का विश्वास उठ चुका था। भारत के लोगों ने उस समय बी.बी.सी. और वायस आफ अमेरिका सुनना शुरू कर दिया था।

आपातकाल की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री के द्वारा ली गई पहली ही बैठक में प्रस्ताव आया कि प्रेस-परिषद् को खत्म किया जाए। 18 दिसंबर, 1975 को अध्यादेश द्वारा प्रेस-परिषद् समाप्त कर दी गई। आपातकाल के दौरान भूमिगत पत्रकारों ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया था। भूमिगत संचार-व्यवस्था के द्वारा एक समानांतर प्रचार-तंत्र खड़ा किया गया था। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो जन-जीवन को एकपक्षीय समाचार ही मिल पाता और सच्ची खबरों से वह वंचित रह जाते। आपातकाल में संचार अवरोध का खामियाजा जनता पर नहीं पड़ सका, किंतु सत्ता और सरकार आपातकाल विरोधियों की मनोदशा को नहीं समझ पाए। संचार अवरोध का कितना बड़ा खामियाजा सत्ता को उठाना पड़ सकता है, यह वर्ष 1977 के चुनाव परिणाम से सामने आया।

संपादकों का एक समूह चापलूसी की हद किस तरह पार कर रहा था, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दिल्ली के 47 संपादकों ने 9 जुलाई 1975 को श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा उठाए गए सभी कदमों में अपनी आस्था व्यक्त की, जिसमें समाचार-पत्रों पर लगाया गया सेंसर भी शामिल है। सेंसरशिप के कारण दिनमान एकपक्षीय खबर छापने को बाध्य हुई। दिनमान ने सेंसरशिप लगाए जाने का विरोध भले ही न किया हो, किंतु सेंसरशिप हटाए जाने पर संपादकीय अवश्य लिखा है।

आपातकाल की लोकप्रिय पत्रिका साप्ताहिक हिन्दुस्तान भी सेंसरषिप लागू होते ही सरकार की पक्षधर हो गई। यह पत्रिका सरकार की कितनी तरफदारी कर रही थी इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि चुनाव की घोषणा के बाद 6 फरवरी, 1977 के अंक में राजनीतिक शतरंज के पुराने खिलाड़ी और नए मोहरे, शीर्षक से प्रकाशित आलेख में कांग्रेस का पलड़ा भारी होना सुनिश्चित किया गया है, जबकि वास्तविकता यह है कि वर्ष 1977 के चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह से हार हुई थी।

आपातकाल के पूर्व सरिता में चुटीले बेबाक और धारदार लेख तथा संपादकीय छपा करते थे। सत्ता की मनमानी पर कड़ा प्रहार किया जाता रहा, किंतु आपातकाल लगने के बाद सेंसरशिप के कारण यह सिलसिला टूट गया। सेंसरशिप थोपे जाने और सत्ता के तानाशाही रवैये के कारण सरिता ने 6 महीनों मे संपादकीय कालम लिखना छोड़ दिया।

सारिका का जुलाई 1975 का अंक सेंसरशिप का पालन कड़ाई से किए जाने का जीवंत दस्तावेज बन गया है। सेंसर अधिकारी द्वारा सारिका के पन्नों पर काला किए गए वाक्यों और शब्दों को संपादक ने विरोध-स्वरूप वैसे ही प्रकाशित कर दिया था। इस अंक के पृष्ठ संख्या 27-28 को तो लगभग पूरी तरह काला कर दिया गया था। इसके बाद के अंकों में संपादकीय विभाग इतना संभल गया कि सेंसर अधिकारी को पृष्ठ काला करने की नौबत ही नहीं आई। लोकराज के 5 जुलाई 1975 के अंक में आपातघोषणा शीर्षक से संपादकीय छपा है। इस संपादकीय में कहा गया है कि कुछ लोगों के अपराध के लिए संपूर्ण प्रेस-जगत् को सेंसरशिप क्यों झेलना पड़े\ लोकराज के 12 जुलाई, 1975 के अंक में अनुशासन-पर्व शीर्षक से एक संपादकीय छपा जिसमें आपातकाल की घोषणा का स्वागत किया गया था।

इस प्रकार हम देखते हैं कि सेंसरशिप की कैंची ने पत्रकारिता के स्वरूप को ही बिगाड़ दिया था। दहशत और आतंक के माहौल में अधिकतर पत्र-पत्रिकाओं ने सेंसरशिप को स्वीकार कर लिया था। संपादकीय खाली छोड़ने और पृष्ठों के काले अंश को हू-ब-हू छापने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बच गया था।

आपातकाल की यह अवधि पत्रकारिता की दृष्टि से ऐसी रही कि यह अलग पहचान लिए है। आपातकालीन हिंदी पत्रकारिता के संबंध में आज अधिक सामग्री उपलब्ध नहीं है। ऐसे में डा. अरूण कुमार भगत द्वारा आपातकाल की हिंदी पत्रकारिता का अनुशीलन विषय पर किया गया शोध कार्य महत्वपूर्ण है।

डा. अरूण भगत, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, पीएचडी (सन्-2009)

सितम्बर अंक २०११

 

हिन्दी पत्रकारिता की दशा और दिशा

वर्तमान समय में हिन्दी भाषा को और व्यापक रूप देने के लिए जो संघर्ष चल रहा है उससे सभी भली-भांति परिचित हैं। क्या आपको लगता है कि पत्रकारिता जगत में भी हिन्दी भाषा का जो प्रयोग हो रहा है वह सही प्रकार से नहीं हो रहा है? इसमें भी कहीं कुछ त्रुटियां या अशुद्धियां व्याप्त है, क्या हिन्दी भाषा के वर्तमान प्रयोग की स्थिति पूरी तरह से उचित और अर्थ पूर्ण है?

वर्तमान में जो मीडिया में हिन्दी का स्तर गिरता जा रहा है, उसके पीछे सबसे बड़ा कारण पाश्चात्य संस्कृति का बढ़ता स्तर है। हर व्यक्ति अपने को अंग्रेजी भाषा बोलने में गौरवान्वित महसूस करता है। इसके उत्थान के लिए सबसे पहले हमें ही शुरूआत करनी होगी क्योकि जब हम शुरूआत करेंगे तभी दूसरा हमारा अनुसरण करेगा।

सोहन लाल भारद्वाज, राष्ट्रीय उजाला

संस्कृत मां, हिन्दी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है, ऐसा कथन डा. फादर कामिल बुल्के का है, जो संस्कृत और हिन्दी की श्रेष्ठता को बताने के लिए सम्पूर्ण है। मगर आज हमारे देश में देवभाषा और राष्ट्रभाषा की दिनों-दिन दुर्गति होती जा रही है। या यूं कह लें कि आज के समय में मां और गृहिणी पर नौकरानी का प्रभाव बढ़ता चला जा रहा है तो गलत नहीं होगा। टीवी के निजी चैनलों ने हिन्दी में अंग्रेजी का घालमेल करके हिन्दी को गर्त में और भी नीचे धकेलना शुरू कर दिया और वहां प्रदर्शित होने वाले विज्ञापनों ने तो हिन्दी की चिन्दी की जैसे नीम के पेड़ पर करेला चढ़ गया हो। इसी प्रकार से रोज पढ़े जाने वाले हिन्दी समाचार पत्रों, जिनका प्रभाव लोगों पर सबसे अधिक पड़ता है, ने भी वर्तनी तथा व्याकरण की गलतियों पर ध्यान देना बंद कर दिया और पाठकों का हिन्दी ज्ञान अधिक से अधिक दूषित होता चला गया। मैं ये बात अंग्रेजी का विरोध करने के लिए नहीं कह रहा हूं, बल्कि मेरी ये बात तो हिन्दी के ऊपर अंग्रेजी को प्राथमिकता देने पर केन्द्रित है।

अवनीश सिंह राजपूत, हिन्दुस्थान समाचार

हिन्दी पत्रकारिता स्वतंत्रता पूर्व से ही चली आ रही है और आजादी के आंदोलन में इसका बहुत बड़ा योगदान भी रहा है, लेकिन आज जो मीडिया में हिन्दी का स्तर गिरता दिखाई दे रहा है, वह पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा के बढ़ते प्रभाव के कारण हो रहा है। आज मीडिया ही नहीं बल्कि हर जगह लोग अंग्रेजी के प्रयोग को अपना भाषाई प्रतीक बनाते जा रहे हैं। इसके लिए सभी को एकजुट होकर हिन्दी भाषा को प्रयोग में लाना होगा।

धर्मेन्द्र सिंह, दैनिक हिन्दुस्तान

अगर आज आप किसी को बोलते है कि यंत्र तो शायद उसे समझ न आए लेकिन मशीन, शब्द हर किसी की समझ में आएगा। इसी प्रकार आज अंग्रेजी के कुछ शब्द प्रचलन में हैं, जो सबके समझ में है। इसलिए यह कहना कि पूर्णतया हिन्दी पत्रकारिता में सिर्फ हिन्दी भाषा का प्रयोग ही हो यह तर्क संगत नहीं है। हां, यह जरूर है कि हमें अपनी मातृभाषा का सम्मान अवश्य करना चाहिए और उसे अधिक से अधिक प्रयोग में लाने का प्रयास करना चाहिए।

नागेन्द्र, दैनिक जागरण

हिन्दी दिवस मतलब चर्चा-विमर्श, बयानबाजी, मानक हिन्दी बनाम चलताऊ हिन्दी। हिन्दी के ठेकेदार और पैरोकार की लफ्फाजी। बस करो यार! भाषा को बांधो मत, भाषा जब तक बोली से जुड़ी है, सुहागन है। जुदा होते ही वह विधवा के साथ-साथ बांझ बन जाती है। वह शब्दों को जन्म नहीं दे पाती। बंगाली, मराठी, गुजराती, उर्दू, फारसी, फ्रेंच, इटालियन कहीं से भी हिन्दी से मेल खाते शब्द मिले, उसे उठा लो। बरसाती नदी की तरह। सबको समेटते हुए। तभी तो हिन्दी समंदर बन पाएगी। रोक लगाओगे तो नाला, नहर या बहुत ज्यादा तो डैम बन कर अपनी ही जमीं को ऊसर करेगी। कॉर्पोरेट मीडिया तो इस ओर ध्यान दे नहीं रहा। हां, लोकल मीडिया का योगदान सराहनीय जरूर है। अरे हां, ब्लॉगरों की जमात को भी इसके लिए धन्यवाद।

चंदन कुमार, जागरण जोश.कॉम

हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है और हमें इसका सम्मान करना चाहिए लेकिन समाज में कुछ ऐसे लोग हैं जो हिन्दी के ऊपर उंगली उठाकर हिन्दी का अपमान करते रहते हैं। बात करें पत्रकारिता की तो हिन्दी पत्रकारिता में आजकल हिन्दी और इंग्लिश का मिला जुला रूप प्रयोग किया जा रहा है जो कि हमारे हिसाब से सही नहीं है। मैं आपको बता दूं कि हिन्दी के कुछ ऐसे शब्द हैं, जिनका इस्तेमाल न करने से वह धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं जो हमारे लिए शर्म का विषय है। मैं अपने हिन्दी-भाषियों से निवेदन करता हूं कि हिन्दी को व्यापक रूप देने में सहयोग करें और हिन्दी को गर्व से अपनी राष्ट्रभाषा का दर्जा दें।

आशीष प्रताप सिंह, पीटीसी न्यूज

भाषाई लोकतंत्र का ही तकाजा है कि नित-नए प्रयोग हों। हां, पर वर्तनी आदि की गलतियां बिल्कुल अक्षम्य है। त्रुटियां-अशुद्धियां तो हैं ही। उचित और अर्थपूर्ण तो जाहिर है कि नहीं है। लेकिन यह सवाल इतना महत्वपूर्ण नहीं है। इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है भाषा के अर्थशास्त्र का सवाल। हिन्दी दिवस पर इस बारे में बात होनी चाहिए।

कुलदीप मिश्रा, सीएनईबी

पत्रकारिता के क्षेत्र में हिंदी का प्रयोग अपनी सहूलियत के हिसाब से होता रहा है। यह जो स्थिति है उसका एक कारण हिंदी के एक मानक फान्ट का ना होना भी है। ज्यादातर काम कृति फान्ट में होता है लेकिन जगह-जगह उसके भी अंक बदल जाते है। कहीं श्रीदेव है तो कहीं ४सी गांधी और न जाने कितने फान्ट्स की भरमार है। अब पत्रकारिता में काम करने वाला कोई भी व्यक्ति एक संस्थान से दूसरे संस्थान में जाते समय फान्ट की समस्या से रूबरू होता है। इसलिए यहां हिंदी का प्रयोग सहूलियत के अनुसार हो रहा है, लेकिन पिछले कुछ दिनों में यूनिकोड के आने से कुछ स्थिरता जरूर आई है। दूसरी बड़ी समस्या यह है कि हम अभी भी यही मानते हैं कि अंग्रेजी हिंदी से बेहतर है। इसलिए जान- बूझकर हिंदी को हिंगलिश बना कर काम करना पसंद करते हैं और ऐसा मानते हैं कि अगर मुझे अंग्रेजी नहीं आती तो मेरी तरक्की की राह दोगुनी मुश्किल है। पत्रकारिता भी आम समाज से अलग नहीं है, उसने भी अन्य बोलियों के साथ-साथ विदेशी भाषा के शब्दों को अपना लिया है।

विकास शर्मा, आज समाज

 

सितम्बर अंक २०११

भाषायी पत्रकारिता के संस्थापक राजा राममोहन राय

राजा राममोहन राय! यह नाम एक प्रखर एवं प्रगतिशील व्यक्तित्व का नाम है, जिन्होंने भारत में भाषायी प्रेस की स्थापना का ऐतिहासिक कार्य किया। राजा राममोहन राय को भारतीय पुनर्जागरण एवं सामाजिक आंदोलनों का प्रणेता भी कहा जाता है। उन्होंने तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरूद्ध जनजागरण का कार्य किया, जो तत्कालीन समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता थी। राजा राममोहन राय ने सामाजिक और राष्ट्रव्यापी जनजागरण कार्य पत्रकारिता के माध्यम से ही किया था। उन्होंने पत्रकारिता को जनजागरण के सशक्त माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया था। उनके द्वारा चलाए गए सामाजिक आंदोलन और पत्रकारिता एक-दूसरे के पूरक थे। उनकी पत्रकारिता सामाजिक आंदोलन को मजबूती प्रदान करती थी।

राजा राममोहन राय का जन्म राधानगर, बंगाल में 22 मई, 1772 को कुलीन ब्राहमण परिवार में हुआ था। उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जो धार्मिक विविधताओं से परिपूर्ण था। उनकी माता शैव मत में विश्वास करती थीं एवं पिता वैष्णव मत में, जिसका उनके जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा। सामाजिक परिवर्तनों के प्रणेता और आधुनिक भारत के स्वप्नदृष्टा राजा राममोहन राय ने संवाद कौमुदी, ब्रह्मैनिकल मैगजीन, मिरात-उल-अखबार, बंगदूत जैसे सुप्रसिद्ध पत्रों का प्रकाशन किया। राजा राममोहन राय ने सन 1821 में बंगाली पत्र संवाद कौमुदी का कलकत्ता से प्रकाशन प्रारंभ किया। इसके बाद सन 1822 में उन्होंने फारसी भाषा के पत्र मिरात-उल-अखबार और ब्रह्मैनिकल मैगजीन का प्रकाशन किया। यह पत्र तत्कालीन समय में राष्ट्रवादी एवं जनतांत्रिक विचारों के शुरूआती समाचार पत्रों में से थे। इन समाचार पत्रों का उद्देश्य राष्ट्रीय पुनर्जागरण और सामाजिक चेतना ही था। इन समाचार पत्रों के अलावा राजा राममोहन राय ने अंग्रेजी में बंगला हेराल्ड और बंगदूत का भी प्रकाशन किया।

राजा राममोहन राय ने भारत में उद्देश्यपूर्ण पत्रकारिता की नींव डाली थी। उन्होंने अपने द्वारा प्रकाशित किए गए समाचार पत्रों का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहा था कि-

मेरा उद्देश्य मात्र इतना है कि जनता के सामने ऐसे बौद्धिक निबंध उपस्थित करूं जो उनके अनुभव को बढ़ावें और सामाजिक प्रगति में सहायक सिद्ध हों। मैं अपनी शक्ति भर शासकों को उनकी प्रजा की परिस्थितियों का सही परिचय देना चाहता हूं और प्रजा को उनके शासकों द्वारा स्थापित विधि व्यवस्था से परिचित कराना चाहता हूं, ताकि जनता को शासक अधिकाधिक सुविधा दे सकें। जनता उन उपायों से अवगत हो सके जिनके द्वारा शासकों से सुरक्षा पायी जा सके और अपनी उचित मांगें पूरी कराई जा सकें।

राजा राममोहन राय ने भारत की पत्रकारिता की नींव उस समय डाली थी, जब भारत को पत्रकारिता के महत्वपूर्ण अस्त्र की आवश्यकता थी। वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कोलकाता प्रेस क्लब में अपने संबोधन में कहा था-

प्रधानमंत्री ने प्रेस की स्वतंत्रता के संबंध में राजा राममोहन राय के शब्दों को ही उद्धृत करते हुए कहा-

प्रेस की आजादी के बिना दुनिया के किसी भी हिस्से में क्रांति नहीं हो सकती है।

प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर मौजूदा दौर में आवाजें उठती रहती हैं। प्रेस की स्वतंत्रता की लड़ाई का आरंभ राजा राममोहन राय ने 19वीं सदी में ब्रिटिश शासन से टकराव लेकर किया था। उनका मानना था कि समाचारपत्रों पर सरकार का नियंत्रण नहीं होना चाहिए और सच्चाई सिर्फ इसलिए नहीं दबा देनी चाहिए कि वह सरकार को पसंद नहीं है। प्रेस की स्वतंत्रता के मुद्दे पर ही इतिहास पर दृष्टि डालते हुए मनमोहन सिंह ने कहा-

जब कोलकाता में प्रेस पर नियंत्रण करने का प्रयास किया गया, तब राजा राममोहन राय ने सरकार के निर्णय की आलोचना करते हुए ब्रिटिश सरकार को ज्ञापन सौंपा।

पत्रकारिता की स्वतंत्रता की ओर ब्रिटिश सरकार का ध्यान आकर्षित करते हुए राजा राममोहन राय ने ब्रिटिश सरकार से कहा-

कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले अधिकतर समाचारपत्र यहां के मूल निवासियों के बीच लोकप्रिय हैं, जो उनमें एक स्वतंत्र चिंतन और ज्ञान की व्याख्या करते हैं। यह समाचार पत्र उनके ज्ञान को बढ़ाने और स्थिति को सुधारने का प्रयत्न कर रहे हैं।

उन्होंने ब्रिटिश सरकार से कहा-

इन समाचारपत्रों के प्रकाशन पर रोक लगाया जाना उचित नहीं है।‘राजा राममोहन राय ने हमेशा ही पत्रकारिता की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया था। उन्होंने सन 1815 से 1830 के कम अंतराल में ही तीस पुस्तकें लिखी थीं। सौमेन्द्र नाथ ठाकुर के अनुसार- बंगाली काव्य जगत ने बंकिम चंद्र चटर्जी और रविन्द्र नाथ टैगोर की कविताओं के माध्यम से जो ऊंचाई प्राप्त की है, उसकी आधारशिला राजा राममोहन राय ने ही रखी थी।

राजा राममोहन राय को आधुनिक भारत का जनक माना जाता है। महान क्रांतिकारी सुभाष चंद्र बोस ने राजा राममोहन के बारे में कहा कि-

राजा राममोहन राय भारतीय पुनर्जागरण के अगुआ थे जिन्होंने भारत में एक मसीहा के रूप में नए युग का सूत्रपात किया।

राजा राममोहन राय की अंग्रेजी शासन और अंग्रेजी भाषा के प्रशंसक होने के कारण आलोचना की जाती रही है। उनकी तमाम आलोचनाओं के बाद भी भारत में भाषायी प्रेस की स्थापना और स्वतंत्रता के लिए किए गए उनके योगदान को भाषायी पत्रकारिता के इतिहास में भुलाया नहीं जा सकता है। राजा राममोहन राय अपनी मृत्यु से कुछ वर्ष पूर्व ब्रिटेन में जा बसे थे जहां 27 सितंबर, 1833 को ब्रिस्टल (इंग्लैण्ड) में उनका निधन हो गया।

सूर्यप्रकाश, सितम्बर, अंक २०११

 

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