संवादसेतु

मीडिया का आत्मावलोकन…

Archive for the month “अप्रैल, 2013”

संपादकीय

संवादसेतु का यह अंक अल्पविराम के बाद आपके समक्ष है। मिशनरी मीडिया की आज भी यह नियति है। यही इसकी शक्ति भी है। जिन लोगों का इसे प्रारंभ करनें में प्रारंभिक प्रयास था उनके अपनी समस्याओं में उलझने के कारण इसके कुछ अंक प्रकाशित न हो सके। इसका श्रेय सुधी पाठकों को जाता है कि उन्होंने न केवल टोकना जारी रखा बल्कि संवादसेतु के पुनः प्रकाशन हेतु प्रेरित किया। परिणाम है कि नवोदित पत्रकारों की टोली नये सहयोगियों, नयी ऊर्जा तथा नये संकल्प के साथ पुनः आपके सामने है। बीते कुछ महीनों में मीडिया जगत यथावत ही चला है। वही खबरों की खींच-तान, वहीं बयानों पर छिड़ी रार और वही प्रेस कोंसिल अध्यक्ष काटजू का बड़बोलापन। प्रेस क्लब के चुनाव में वही पैनल दोबारा चुन लिया गया जो पिछली बार भी जीता था।

मीडिया सक्रियता की बात करें तो वह दो मुद्दों पर खास तौर पर दिखायी दी। पहली संजय दत्त की सजा पर और दूसरी नरेन्द्र मोदी के मामले में मीडिया के यू-टर्न पर। कुछ समय पहले तक मीडिया की आंखों की किरकिरी रहे नरेन्द्र मोदी संभावित केन्द्रीय भूमिका के चलते कथित नेशनल मीडिया के दुलारे बन गये हैं। प्रयाग का महाकुंभ इस बार काफी मीडिया फ्रेंडली रहा। उमड़ती भीड के बीच भी प्रशासन ने मीडिया की सुविधाओं का खास ख्याल रखा। विदेशी मीडिया भी कुंभ में काफी जुटा किंतु उनकी रिपोर्टिंग सतही ज्यादा नजर आयी। उसकी खास रुचि स्नान करती महिलायों और नागा सन्यासियों में अधिक रही है। वही दृश्य उनके फोटो-फीचर का विशेष आकर्षण हमेशा रहते हैं। इस बार की रिपोर्टिंग में कुम्भ की समीक्षा बाजार के रूप में भी काफी की गयी। कुम्भ की व्यवस्थाओं पर होने वाले खर्चे और उसमें होने वाली बिक्री के गणित जुटाने के लिये पत्रकारों ने पिछले डेढ़ सौ वर्षों के सरकारी खाते खंगाल डाले।

इस सब से अलग, बहुत छोटे स्तर पर पत्रकारिता के विद्यार्थियों के गुण-संवर्ध्न हेतु कुछ गतिविधियां भी आयोजित हुईं। प्रभावी शीर्षक लेखन पर प्रेरणा, नोएडा में कार्यशाला का आयोजन किया गया तो दिल्ली मे माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय ने मीडिया शोध पर दो दिवसीय़ कार्यशाला का आयोजन किया। इसी बीच दिल्ली में पत्रकारों द्वारा प्रतिवर्ष वसंत पंचमी पर आयोजित होने वाले सरस्वती पूजन का भव्य आयोजन हुआ तो प्रेरणा में पत्रकारों का होली मिलन समारोह। दोनों ही कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में पत्रकार उपस्थित थे। इनका संक्षिप्त विवरण इस अंक में समाविष्ट है। संवादसेतु के इस अंक के कलेवर और विषयवस्तु पर आपकी टिप्पणी तथा आगामी अंक के लिये आपकी रचनाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

भारतीय नववर्ष की हार्दिक शुभकामना सहित,

आपका,

आशुतोष

Advertisements

साहित्यिक पत्रकारिता के ‘अमृत‘ विद्यानिवास मिश्र

                                                                                                    viya nivas mishra
हिंदी पत्रकारिता को शिखर तक पहुंचाने में हिंदी साहित्य और साहित्यकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारतीयता, भारतीय संस्कृति और सनातन संस्कृति के प्रवाह को जीवंत बनाए रखने में हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता ने अपना अथक योगदान दिया है। आज के दौर में हिंदी पत्रकारिता जिस प्रकार साहित्य से विलग दिखाई पड़ती है, ऐसी पहले न थी बल्कि एक वक्त तो ऐसा भी था, जब साहित्य और पत्रकारिता एक-दूसरे का सहारा बन आगे बढ़ रहे थे। हिंदी पत्रकारिता को उसका ध्येय पथ दिखलाने का कार्य समय-समय पर ऐसे पत्रकारों ने किया, जो साहित्य की विधा में भी सिद्धहस्त थे। भारतेंदु हरीशचंद्र, माखनलाल चतुर्वेदी, हनुमान प्रसाद पोद्दार, महावीर प्रसाद, हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि इसी कड़ी के नाम हैं, जिन्होंने हिंदी की लड़ाई लड़ी। साहित्य और पत्रकारिता की इस विरासत को बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में प्रवाहमय बनाए रखने का कार्य किया विद्यानिवास मिश्र ने। मिश्र जी हिंदी साहित्य, परंपरा, संस्कृति के मर्मज्ञ थे।
हिंदी पत्रकारिता और साहित्य के बेहतरीन और कारगर सम्मिश्रण की मिसाल पेश करने वाले विद्यानिवास मिश्र ने पत्रकारिता के माध्यम से भारतीयता को मुखरता प्रदान की। सन 1926 में गोरखपुर के पकड़डीहा गांव में जन्मे विद्यानिवास मिश्र अपनी बोली और संस्कृति के प्रति सदैव आग्रही रहे। सन 1945 में प्रयाग विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर एवं डाक्टरेट की उपाधि लेने के बाद उन्होंने अनेकों वर्षों तक आगरा, गोरखपुर, कैलिफोर्निया और वाशिंगटन विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया। विद्यानिवास मिश्र देश के प्रतिष्ठित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय एवं काशी विद्यापीठ के कुलपति भी रहे। इसके बाद अनेकों वर्षों तक वे आकाशवाणी और उत्तर प्रदेश के सूचना विभाग में कार्यरत रहे। हिंदी साहित्य के सर्जक विद्यानिवास मिश्र ने साहित्य की ललित निबंध की विधा को नए आयाम दिए। हिंदी में ललित निबंध की विधा की शुरूआत प्रतापनारायण मिश्र और बालकष्ण भटट ने की थी, किंतु इसे ललित निबंधों का पूर्वाभास कहना ही उचित होगा। ललित निबंध की विधा के लोकप्रिय नामों की बात करें तो हजारी प्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र एवं कुबेरनाथ राय आदि चर्चित नाम रहे हैं। लेकिन यदि लालित्य और शैली की प्रभाविता और परिमाण की विपुलता की बात की जाए तोविद्यानिवास मिश्र इन सभी से कहीं अग्रणी रहे हैं। विद्यानिवास मिश्र के साहित्य का सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्सा ललित निबंध ही हैं। उनके ललित निबंधों के संग्रहों की संख्या भी 25 से अधिक होगी।
लोक संस्कृति और लोक मानस उनके ललित निबंधों के अभिन्न अंग थे, उस पर भी पौराणिक कथाओं और उपदेशों की फुहार उनके ललित निबंधों को और अधिक प्रवाहमय बना देते थे। उनके प्रमुख ललित निबंध संग्रह हैं- राधा माधव रंग रंगी, मेरे राम का मुकुट भीग रहा है, शैफाली झर रही है, चितवन की छांह, बंजारा मन, तुम चंदन हम पानी, महाभारत का काव्यार्थ, भ्रमरानंद के पत्र, वसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं और साहित्य का खुला आकाश आदि आदि। वसंत ऋतु से विद्यानिवास मिश्र को विशेष लगाव था, उनके ललित निबंधों में ऋतुचर्य का वर्णन उनके निबंधों को जीवंतता प्रदान करता था। वसंत ऋतु पर लिखे अपने निबंध संकलन फागुन दुइ रे दिना में वसंत के पर्वों को व्याख्यायित करते हुए, अपना अहंकार इसमें डाल दो शीर्षक से लिखे निबंध में वे शिवरात्रि पर लिखते हैं-

‘‘शिव हमारी गाथाओं में बड़े यायावर हैं। बस जब मन में आया, बैल पर बोझा लादा और पार्वती संग निकल पड़े, बौराह वेश में। लोग ऐसे शिव को पहचान नहीं पाते। ऐसे यायावर विरूपिए को कौन शिव मानेगा ? वह भी कभी-कभी हाथ में खप्पर लिए। ऐसा भिखमंगा क्या शिव है ?”


इसके बाद इन पंक्तियों को विवेचित करते हुए विद्यानिवास मिश्र लिखते हैं-

‘‘हां, यह जो भीख मांग रहा है, वह अहंकार की भीख है। लाओ, अपना अहंकार इसमें डाल दो। उसे सब जगह भीख नहीं मिलती। कभी-कभी वह बहुत ऐश्वर्य देता है और पार्वती बिगड़ती हैं। क्या आप अपात्र को देते हैं ? शिव हंसते हैं, कहते हैं, इस ऐश्वर्य की गति जानती हो, क्या है ? मद है। और मद की गति तो कागभुसुंडि से पूछो, रावण से पूछो, बाणासुर से पूछो।”

इन पंक्तियों का औचित्य समझाते हुए मिश्र जी लिखते हैं-

‘‘पार्वती छेड़ती हैं कि देवताओं को सताने वालों को आप इतना प्रतापी क्यों बनाते हैं ? शिव अट्टाहास कर उठते हैं, उन्हें प्रतापी न बनाएं तो देवता आलसी हो जाएं, उन्हें झकझोरने के लिए कुछ कौतुक करना पड़ता है।”


यह मिश्र जी की अपनी उद्भावना है, प्रसंग पौराणिक हैं, किंतु वर्तमान पर लागू होते हैं। पुराण कथाओं का संदर्भ देते हुए विद्यानिवास मिश्र ने साहित्य के पाठकों को भारतीय संस्कति का मर्म समझाने का प्रयास किया है। उनके ललित निबंधों में जीवन दर्शन, संस्कृति, परंपरा और प्रकति के अनुपम सौंदर्य का तालमेल मिलता है। इस सबके बीच वसंत ऋतु का वर्णन उनके ललित निबंधों को और अधिक रसमय बना देता है। ललित निबंधों के माध्यम से साहित्य को अपना योगदान देने वाले विद्यानिवास हिंदी की प्रतिष्ठा हेतु सदैव संघर्षरत रहे, मारीशस से सूरीनाम तक अनेकों हिंदी सम्मेलनों में मिश्र जी की उपस्थिति ने हिंदी के संघर्ष को मजबूती प्रदान की। हिंदी की शब्द संपदा, हिंदी और हम, हिंदीमय जीवन और प्रौढ़ों का शब्द संसार जैसी उनकी पुस्तकों ने हिंदी की सम्प्रेषणीयता  के दायरे को विस्तृत किया। तुलसी और सूर समेत भारतेंदु, अज्ञेय, कबीर, रसखान, रैदास, रहीम और राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं को संपादित कर उन्होंने हिंदी के साहित्य को विपुलता प्रदान की।

         विद्यानिवास जी कला एवं भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ थे। खजुराहो की चित्रकला का सूक्ष्मता और तार्किकता से अध्ययन कर उसकी नई अवधारणा प्रस्तुत करने वाले विद्यानिवास मिश्र ही थे। अकसर भारतीय चिंतक विदेशी विद्वानों से बात करते हुए खजुराहो की कलाकृतियों को लेकर कोई ठोस तार्किक जवाब नहीं दे पाते थे। विद्यानिवास जी ने अपने विवेचन के माध्यम से खजुराहो की कलाकृतियों की अवधारणा स्पष्ट करते हुए लिखा है-

‘‘यहां के मिथुन अंकन साधन हैं, साध्य नहीं। साधक की अर्चना का केंद्रबिंदु तो अकेली प्रतिमा के गर्भग्रह में है। यहां अभिव्यक्ति कला रस से भरपूर है। जिसकी अंतिम परिणति ब्रहम रूप है। हमारे दर्शन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की जो मान्यताएं हैं, उनमें मोक्ष प्राप्ति से पूर्व का अंतिम सोपान है काम।”

 उन्होंने कहा कि यह हमारी नैतिक दुर्बलता ही है कि खजुराहो की कलाकृतियों में हम विकृत कामुकता की छवि पाते हैं। स्त्री पुरूष अनादि हैं, जिनके सहयोग से ही सृष्टि जनमती है।सन 1990 के दशक में मिश्र जी ने नवभारत टाइम्स के संपादक के रूप में जिम्मेदारी संभाली। उदारीकरण के दौर में खांटी हिंदी पत्रकारिता को आगे बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण पत्रकारों में से एक मिश्र जी ने नवभारत टाइम्स को हिंदी के प्रतिष्ठित समाचार पत्र के रूप में नई पहचान दिलाई। पत्रकारीय धर्म और उसकी सीमाओं को लेकर वे सदैव सचेत रहते थे। वे अकसर कहा करते थे कि-

‘‘मीडिया का काम नायकों का बखान करना अवश्य है, लेकिन नायक बनाना मीडिया का काम नहीं है।” 

अपने पत्रकारीय जीवन में भी विद्यानिवास मिश्र हिंदी के प्रति आग्रही बने रहे। वे अंग्रेजी के विद्वान थे, लेकिन हिंदी लिखते समय अंग्रेजी के शब्दों का घालमेल उन्हें पसंद नहीं था। उन्होंने नवभारत टाइम्स के संपादक की जिम्मेदारी ऐसे वक्त में संभाली, जब हिंदी पत्रों के मालिक उदारीकरण के बाद बाजारू दबाव में हिंदी में अंग्रेजी के घालमेल का प्रयास कर रहे थे। अखबार मालिकों की मान्यता थी कि युवा पाठकों को यदि लंबे समय तक पत्र से जोड़े रखना है, तो हिंदी में अंग्रेजी शब्दों को जबरदस्ती ही सही घुसाना ही होगा। नवभारत टाइम्स के मालिक समीर जैन की भी यही मान्यता थी कि हिंदी समाचार पत्रों में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग होना वक्त की जरूरत है।  इन्हीं वाद-विवादों के बीच उन्होंने नवभारत टाइम्स के संपादक की जिम्मेदारी से स्वयं को मुक्त कर लिया, किंतु हिंदी में घालमेल को लेकर वे  कभी राजी नहीं हुए। हालांकि विद्यानिवास जी केनवभारत टाइम्स छोड़ने के बाद यह पत्र उसी राह पर आगे बढ़ा, जिस पर इसके मालिक समीर जैन ले जाना चाहते थे। विद्यानिवास जी ने नवभारत टाइम्स से अलग होने के बाद साहित्य अमृत पत्रिका का संपादन किया। व्यावसायिकता के बाजारू दौर में साहित्य अमृत पत्रिका ने विद्यानिवास जी के संपादकत्व में बतौर साहित्यिक पत्रिका नए मानक स्थापित किए। साहित्य अमृत का सौवां अंक भी विद्यानिवास जी के समय ही निकला था। पत्रिका के सौवें अंक के संपादकीय में संकल्पपूर्ण शब्दों में लिखा था-
‘‘हमें इतना परितोष है कि हम साहित्य अमृत पत्रिका को साहित्य की निरंतरता का मानदंड बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं।” 
                                                                                          sahitya-amrit
साहित्य अमृत पत्रिका ऐसे वक्त में जब पत्रकारीय मूल्य अन्य स्तंभों की भांति ही ढलान पर हों, बाजार के दबाव में आए बिना भारतीय संस्कृति के महत्व को उद्घाटित करती रही है। सौवें अंक के संपादकीय में भारतीयता का उद्घोष करते हुए विद्यानिवास मिश्र ने जयशंकर प्रसाद की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए लिखा-
‘‘किसी का हमने छीना नहीं, प्रकति का रहा पालना यही, हमारी जन्मभूमि थी यही, कहीं से हम आए थे नहीं।”

मिश्र जी साहित्य अमृत पत्रिका का संपादन अंतिम समय तक करते रहे। साहित्य अकादमी पुरस्कार, कालिदास पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्म विभूषण, पद्मश्री और अनेकों उपाधियों से सम्मानित विद्यानिवास मिश्र का 14 फरवरी, 2005 का सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया। उस वर्ष उनका प्रिय पर्व वसंत पंचमी 13 फरवरी को था। वसंत ऋतु में ही वे अपना शरीर त्यागकर इहलोक की यात्रा पर निकल पड़े। पं. विद्यानिवास मिश्र के इस दुनिया से जाने के बाद भी उनकी पत्रकारिता और साहित्य की सौरभ इस रचनाशील जगत को महकाती रहेगी।

 

फेसबुक क्रांति के नौ वर्ष

                                 Image
4 फरवरी को दुनिया की सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक ने अपने जीवन का नौवां वसंत देखा। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के छात्र मार्क जुकरबर्ग ने 4 फरवरी, 2004 को फेसबुक की शुरूआत फेसमैश के नाम से   की थी। शुरू में यह हार्वर्ड के छात्रों के लिए ही अंतरजाल का काम कर रही थी, लेकिन शीघ्र ही लोकप्रियता मिलने के साथ इसका विस्तार पूरे यूरोप में हो गया। सन 2005 में इसका नाम परिवर्तित कर फेसबुक कर दिया गया। दुनिया भर में 2.5 अरब उपयोगकर्ताओं वाली फेसबुक में भी वक्त के साथ कई आयाम जुड़ते चले गए। सन 2005 में फेसबुक ने अपने उपयोगकर्ताओं को नई सौगात दी, जब उसने उन्हें फोटो अपलोड करने की भी सुविधा प्रदान की।
          फेसबुक के सफर का यह सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी कदम था, जिसने वर्चुअल दुनिया को नए आयाम देने का काम किया। फोटो अपलोड करने की सुविधा इस लिए क्रांतिकारी कदम थी, क्योंकि फोटो के माध्यम से विचारों की अभिव्यक्ति को जीवंतता मिली। बदलते वक्त और बदलते समाज का आईना बनी फेसबुक से देखते ही देखते नौ वर्षों में अरबों लोग जुड़े। सन 2006 के सितंबर माह में फेसबुक ने 13 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को फेसबुक से जुड़ने की स्वतंत्रता प्रदान की। इससे इसका दायरा और भी व्यापक हुआ। प्रारंभ में फेसबुक का उपयोग सोशल नेटवर्क स्थापित करने और नए लोगों से जुड़ने के लिए ही होता रहा। लेकिन वक्त की तेजी के साथ ही फेसबुक को भी नए आयाम मिले। संगठित मीडिया की चुनी हुई और प्रायोजित खबरों की घुटन से निकलने के लिए भी सामाजिक तौर पर सक्रिय लोगों ने फेसबुक का प्रयोग किया। दिसंबर 2010 में विश्व ने अरब में क्रांति का अदभुत दौर देखा, अद्भुत इसलिए कि अरब के जिन देशों में कई दशकों से तानाशाही शासन चल रहा था, वहां लोगों ने सड़कों पर उतरकर मुखर प्रदर्शन किया। प्रदर्शन ही नहीं तानाशाहियों को सत्ता से खदेड़ने का काम किया। समस्त विश्व उस समय हतप्रभ रह गया कि यह कैसे हुआ ?
       जिस अरब में आम लोग सरकार की नीतियों की आलोचना करने से भी डरते थे, वहां सत्ता विरोधी ज्वार अचानक कैसे आया। इसका उत्तर केवल यही था, सोशल मीडिया के कारण। ट्यूनीसिया, मिस्र, यमन, लीबिया, सीरिया, बहरीन, सउदी अरब, कुवैत, जार्डन, सूडान जैसे पूर्व मध्य एशिया और अरब के देशों ने क्रांति की नई सुबह को देखा। इसका कारण यही था कि वहां के सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा संचार माध्यमों पर लागू लौह परदा के सिद्धांत का विकल्प लोगों को सोशल मीडिया के रूप में मिल गया। सरकारी मीडिया आमजन की जिस आवाज और गुस्से को मुखरित होने से रोक देता था, सोशल मीडिया ने उसका विकल्प और जवाब आम जन के सामने रखा।
               सरकारी बंदिशों, संपादकीय नीति और समाचार माध्यमों पर बने बाजारू दबावों से मुक्त सोशल मीडिया ने आमजन की आवाज को मंच प्रदान कर मुखरित करने का कार्य किया। सोशल मीडिया द्वारा उभरी इस क्रांति का सबसे लोकप्रिय वाहक बना फेसबुक। एक समय पर अनेकों लोगों के संवाद करने की सुविधा, विचारों को आदान-प्रदान करने का मंच, जिसमें शब्दों की सीमा में बंधे बिना अपने विचारों को अभिव्यक्त किया जा सकता है। फेसबुक की इसी विशेषता ने आमजन के बीच चल रहे विचारों के प्रवाह को दिशा प्रदान की। अपनी व्यस्त जिंदगी में लोगों ने फेसबुक के माध्यम से अपने विचारों को एक-दूसरे को सहज ढंग से पहुंचाया और राजनीतिक-सामाजिक समस्याओं के प्रति जनांदोलनों की नींव रखी जाने लगी। सोशल मीडिया जनित यह आंदोलन अरब देशों तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि अमरीका के वाल स्ट्रीट होते हुए, यह दुनिया के सबसे बड़े  लोकतंत्र के जंतर-मंतर तक पहुंच गए। अमरीका में वाल स्ट्रीट घेरो आंदोलनहुआ, जिसमें अमीर देश का तमगा धारण किए अमरीका के नागरिकों ने आंदोलन किया और देश के संसाधनों का 1 प्रतिशत लोगों के हाथों में सिमटना चिंताजनक बताया। अमरीका में हुए इस आंदोलन ने दुनिया भर का ध्यान खींचा। इस आंदोलन ने बताया कि दुनिया का शीर्ष देश कहलाने वाले अमरीका में भी किस पर गैरबराबरी व्याप्त है। आंदोलनों की इस बयार से भारत भी अछूता नहीं रहा और यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार और नीतिगत असफलताओं को लेकर जंतर-मंतर से सड़कों तक सत्ता विरोधी आंदोलन के स्वर मुखरित हुए। यह आंदोलन सोशल मीडिया और उसके प्रमुख घटक फेसबुक की ही देन थे।
            फेसबुक के नौवें जन्मदिन से कुछ दिन पूर्व ही एक आंदोलन और हुआ। दिल्ली में हुए गैंगरेप के विरोध में आंदोलन। यह आंदोलन तो पूरी तरह उसी जमात का था, जिसे फेसबुकिया या सोशल मीडिया के क्रांतिकारी कहा जाता रहा है। यह कहना ठीक ही होगा कि अपने नौंवा वर्षों के संक्षिप्त समय में फेसबुक ने नई उंचाईयों को छुआ है और मुख्यधारा की मीडिया से अलग भी वैयक्तिक राय की स्वतंत्रता प्रदान करते हुए विभिन्न आंदोलनों को मूर्त रूप दिया है। उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में भी फेसबुक नए पायदान चढ़ता जाएगा और वर्चुअल दुनिया की यह क्रांतिकारी बुक आने वाले वक्त में भी आमजन की आवाज को मुखरता प्रदान करती रहेगी।

खलनायक नहीं, नायक है तू

                                  Image
समरथ को नही दोष गोसाईं की पंक्तियां व्यवस्था में मत्स्य न्याय जैसी स्थिति की तरफ संकेत करने के लिए उपयोग में लाई जाती हैं। जब कानून व्यक्तियों का भार देखकर काम करने लगता है, व्यक्ति की प्रतिष्ठा और प्रभावित करने की क्षमता से संविधान के अनुच्छेद घुटन सी महसूस करने लगते हैं, तब गोस्वामी तुलसीदास की यह पंक्तियां बरबस याद आ जाती हैं। अभी तक इस पंक्ति का उपयोग राजनीतिक-आर्थिक संदर्भों में होता रहा है। शायद, यह मान लिया गया था कि सामथ्र्य इन दोनों क्षेत्रों तक सीमित रहती है। व्यवस्था के पारंपरिक ढांचे का विश्लेषण एक हद तक इस मान्यता पर मुहर भी लगाता है कि रसूख का स्वरूप या तो राजनीतिक होता है अथवा आर्थिक। लेकिन हाल-फिलहाल की कुछ घटनाएं इस बात की तरफ इशारा करती हैं कि रसूखदारी अब राजनीति अथवा आर्थिकी की बपौती नहीं रह गई है।
 सामर्थ्य में हिस्सेदारी रखने वाले कुछ नवघटक व्यवस्था में जुड़ चुके हैं। संजय दत्त की सजा के बाद जिस तरह का गुबार और अंधड़ पैदा करने की कोशिश की गई, वह इस बात की तस्दीक करते हैं। सजा के बाद व्यवस्था की विसंगतियों पर जैसे गंभीर सवाल उठाए गए और जिस तरह से दूर-दराज के अपरिचित हमदर्द मदद के लिए सामने आए, उससे तो ऐसा लगा कि मानो गलती संजय दत्त की नहीं, माननीय उच्चतम न्यायालय की है। संजय दत्त के खिलाफ हुई कथित ज्यादती को दूर करने के लिए कुछ लोगों ने व्यवस्था परिवर्तन की बात की तो कुछ अन्य ने व्यवस्था के गैर-पारंपरिक विधानों का उपयोग कर उच्चतम न्यायालय द्वारा हो गई गलती को सुधारने का अभियान चलाया। इस अभियान के मुखिया बने प्रेस परिषद् के अध्यक्ष – मार्कंडेय काटजू और इस गंभीर वैधानिक विमर्श को आगे बढ़ाया मीडिया ने।
 Image
मार्कंडेय काटजू ने बहस की शुरूआत करते हुए कहा कि क्योंकि संजय दत्त एक अच्छे आदमी हैं, उनके पास परिवार है और उनका ताल्लुक एक समाजसेवी परिवार से है, इसलिए मानवीय आधार पर उनको सजा से मुक्ति मिलनी चाहिए। इसके बाद तो संजय दत्त के पक्ष में जिरह करने वालों की भीड़ लग गई। कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने कहा अपराध के समय उनकी उम्र मात्र 33 वर्ष थी। उन्होंने बचपने में एक गलती कर दी थी, इसलिए उनको क्षमादान मिलना चाहिए। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मानना था कि संजय दत्त पहले ही काफी कुछ भुगत चुके हैं और अधिक सजा की जरूरत नहीं है। अभिनेत्री राखी सावंत तो इतनी भावविह्वल थीं कि उन्होंने खुद को संजय की जगह जेल जाने के लिए प्रस्तुत कर दिया। आंध्र के पूर्व अभिनेता और वर्तमान में नेता चिरंजीवी ने कहा कि संजय ने काफी सजा पहले ही काट ली है, अब उनको दया के आधार पर सजा से मुक्त कर दिया जाना चाहिए। धर्मेंद्र ने फरमाया कि मेरा हृदय संजय के लिए रोता है। बीमार अमर सिंह यकायक सक्रिय हो गए और वह अभिनेत्री जयाप्रदा को लेकर महाराष्ट्र के राज्यपाल के.शंकरनारायणन के पास जा पहुंचे तथा दरबार में माफी की गुहार लगाई। इन सारे लोगों के पास कोई ठोस तर्क नहीं थे। अपने को हमेशा क्रांतिकारी मुद्रा और नई सोच की पैरोकार के रूप में प्रस्तुत करने वाली तवलीन सिंह ने भी अपनी धारदार कलम संजय के पक्ष में चलाई। सभी माननीय, बेचारे संजय के हक की लड़ाई मानवीय मूल्यों के आधार पर लड़ रहे थे।
 संजय दत्त की असली पैरवी तो आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में से एक शांतिभूषण ने की। उन्होंने 26 मार्च को द हिंदू में एक लेख लिखकर कानूनी जिरह की और उच्चतम न्यायायलय से संजय दत्त को सजा देने की अपनी गलती सुधारने की अपील की। इस लेख में उन्होंने लिखा कि संजय दत्त ने सांप्रदायिक हिंसा से उपजी हुई स्थितियों को ध्यान में रखते हुए अपने पास एके-56 जैसे हथियार रखे थे। उस समय उग्र भीड़ कुछ भी कर सकती थी, इसलिए उन्होंने उग्र भीड़ से अपनी रक्षा के लिए सुरक्षा के घातक हथियार रखे थे। किसी भी व्यक्ति को अपनी सुरक्षा के लिए ऐसा करने का हक है। अब चूंकि भारतीय कानून घातक हथियारों का लाइसेंस नहीं देते, इसलिए संजय दत्त के पास डी कंपनी की शरण में जाने के सिवाय कोई विकल्प ही नहीं बचा था।
पहली श्रेणी के तर्क तो इतने सतही और भोथरे हैं कि उनके खंडन की जरूरत ही नहीं पड़ती। अब यदि किसी अपराधी के लिए इस आधार पर क्षमा मांगी जाए कि उसके पास बीवी-बच्चे हैं, तब तो भारत के 99 प्रतिशत अपराधियों को छोडना पड़ेगा। वैसे भी पिछले कुछ समय में काटजू द्वारा दिए गए बयानों का विश्लेषण करने से यह स्पष्ट होता है कि वह मानते हैं कि सारी विद्वता उनके पास है और निर्णय सुनाने का तो वह एकाधिकार रखते हैं। शायद, इसी कारण अधिकांश पत्रकार उनको मूर्ख लगते हैं। संजय दत्त के प्रकरण में भी वह अपने से असहमति रखने वाले लोगों को खुलेआम मूर्ख और बेवकूफ बता रहे थे। उनको याद रखना चाहिए कि वह माननीय न्यायालय की परिधि से बाहर आ चुके हैं। अब उनके निर्णयों और कथनों से सैकड़ों लोग असहमत होंगे। इस स्थिति में गुर्राने की बजाय सलीके से और तथ्यों और तर्कों के आधार पर बातचीत करना ही अधिक प्रभावी होता है।
 मीडियाई क्षेत्र तो वैसे भी बाल की खाल निकालने के लिए प्रसिद्ध है और जब खाल ही उधड़ी हुई हो तो मीडिया को खिंचाई करने से कौन रोक सकता है ?  अन्य लोग तो हमदर्दी दिखाने के बहाने यह सिद्ध करना चाह रहे थे कि बालीवुड की पैरोकारी का दमखम उन्हीं के पास है और जब उच्चतम न्यायालय ने अन्याय किया है तो सभी लोग, सभी दिशाएं देख लें कि वह हक की लड़ाई लडने में सबसे आगे हैं। दिग्विजय सिंह तो बयान ही खंडन करने के लिए देते हैं। हेमंत करकरे के बारे मे दिग्विजय के बयान का खंडन कुछ ही मिनटों में खुद करकरे की पत्नी ने कर दिया था। अब यदि मान लिया जाए कि संजय 33 साल की उम्र में एके-56 जैसे खिलौने का महत्व नहीं जानते थे, फिर भी उनको पाक-साफ नहीं बताया जा सकता। एबीपी न्यूज सन् 2000 में उनके दाउद के दाहिने हाथ माने जाने वाले गुर्गे से बातचीत के टेप का प्रसारण कर चुका है। अब प्रश्र यह उठता है कि संजय दत्त से अनजाने में गलती हुई थी तो 7 सालों बाद वह क्यों पाकिस्तानी आकाओं को याद कर रहे थे और कुछ फरियादें भी कर रहे थे।
अब कानूनी पक्ष की बात करते हैं। कानून की बारीकियों में जाने से पहले यह आवश्यक हो जाता है कि हम संजय दत्त के अपराधों की पड़ताल कर लें।
 टाडा कोर्ट में सीबीआई ने संजय दत्त के ऊपर जो आरोप लगाए हैं उसके अनुसार 16 जनवरी 1993 को अबू सलेम ने 3 एके-56 रायफलें, 25 हैंडग्रेनेड और 7 एमएम की पिस्टल रखने के लिए दी। इनमें से एक एके-56 रायफल को अपने पास रखकर, शेष सारे हथियार उन्होंने हनीफ लाकड़ावला और समीर हिंगोरा को सौंप दिए। मॉरीशस में शूटिंग के दौरान संजय दत्त को इस बात का पता चला कि सीबीआई मुंबई बम विस्फोटों में उनकी संलिप्तता की भी जांच कर रही है। उन्होंने युसूफ नलावाला, अजय मारवा और रसी मुल्लावाला को इन हथियारों को नष्ट करने की जिम्मेदारी दी। शुरूआत में, संजय दत्त पर टाडा के तहत मुकदमा चलाया गया, बाद में पता नहीं किन कारणों से उन पर से टाडा हटा लिया गया और केवल आम्र्स एक्ट के तहत मुकदमा चलाया जाने लगा। संजय ने न्यायालय में इन तथ्यों की स्वीकारोक्ति भी की।
 अब प्रश्र यह उठता है कि क्या दया का अधिकार केवल सबल को मिलना चाहिए या सबल ही दया मांगने की क्षमता रखता है ? जिस आधार पर संजय के लिए,क्षमादान मांगा जा रहा है , क्या इसी आधार पर अन्य लोगों के लिए भी पैरोकारी करने के लिए लोग सामने आएंगे ? नेशलन क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरों के 2011 के आंकड़ों के अनुसार पूरे भारत में लगभग 2 हजार लोग आम्र्स एक्ट के तहत सजा भुगत रहे हैं, जबकि 10 हजार से अधिक लोगों पर आम्र्स एक्ट के तहत मुकदमे चल रहे हैं। इनमें अधिकांश बहुत ही साधारण हथियार रखने के दोषी पाए गए हैं। इसी साल के आंकड़ों के अनुसार 1 लाख 28 हजार सजायाफ्ता कैदियों में से 73 प्रतिशत दसवीं फेल हैं इनमें 30 प्रतिशत तो निरक्षर है। इसी तरह 2 लाख 41 हजार विचाराधीन कैदियों में निरक्षर कैदियों की संख्या 29.5 प्रतिशत और दसवीं फेल कैदियों की संख्या 42.4 प्रतिशत है। इन निरक्षरों और गरीबों के लिए देश में कोई काटजू अपनी आवाज नहीं उठाता। दया का थोड़ा-बहुत हक तो इनका भी है।
 दया, निर्बलों और असहायों के लिए मांगी जाती है। जब व्यक्ति संसाधनों के अभाव में अपनी लड़ाई नहीं लड़ पाता अथवा बिना किसी गुनाह के किसी को सजा दे दी जाती है, तब दया मांगी जाती है। यहां तो उल्टी गंगा बहाने की कोशिश की जा रही है। अभियुक्त अपने गुनाहों को स्वीकार कर चुका है और सार्वजनिक रूप से यह घोषणा भी कर चुका है कि वह क्षमादान नहीं मांगेगा। फिर भी, उसके  नाम पर कुछ लोग कटोरा लिए हुए घूम रहे हैं। यह अजीब स्थिति है। खलनायक और खलनायकी को वैध ठहराने के प्रयास किसी स्वस्थ व्यवस्था में तो नहीं होते। संजय दत्त का क्षमादान प्रकरण, पूंजी के अबाध प्रवाह के कारण पैदा हुए नवधनाढ्यों की अनियंत्रित मनःस्थिति का संकेतक है। यह अनियंत्रित मनोवृत्ति व्यवस्था को अपने ठेंगे पर नचाना चाहती है और सही-गलत को अपने ढंग से परिभाषित करने की कोशिश करती है। व्यवस्था में ऐसी मनोवृत्ति के शिकार लोगों का प्रचार पाना किसी भी दृष्टि से शुभ नहीं कहा जा सकता।

आस्था नहीं, आश्चर्य का कुंभ

Image
सूचनाओं और संदेशों को उसके संदर्भों से काटकर प्रस्तुत करने की प्रक्रिया हमेशा अनर्थ को ही जन्म देती है। जड़ से कटी सूचना पाठक को भी दिग्भ्रमित करती है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में सूचना का स्वरुप भी वैश्विक हो गया है और तथ्य हर परिस्थितियों में समान रुप से प्रभावी होते हैं। लेकिन यह लोग भूल जाते हैं कि तथ्यों के चयन की प्रक्रिया कोई निरपेक्ष प्रक्रिया नहीं है, व्यक्ति की दृष्टि और स्थानीय संस्कृति इस चयन प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। यदि कुंभ को मीडियाई जगत में एक केस स्टडी मानकर अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि परिप्रेक्ष्य विहीन सूचना समझ को बढाती नहीं, बल्कि समझ के चारों ओर एक कुहासा पैदा कर देती है। शायद, इसी कारण, पश्चिमी नजरों में आस्था का एक सैलाब, संवाद का एक वृहद प्लेटफार्म, आश्चर्य के एक आयोजन के रूप में तब्दील हो जाता है। इलाहाबाद में लगभग दो महीने तक चले कुंभ में जहां करोड़ों लोगों ने आस्था की डुबकी लगाई। वहीं पश्चिमी मीडिया भी एक स्थान पर इतने लोगों को देखकर हतप्रभ रहा। ऐसे वक्त में जब उपभोक्तावादी संस्कृति हावी है, तब आस्था और आध्यात्म के संगम में इतने विशाल जनसमुदाय का एकत्रीरण कम से कम विदेशी मीडिया को तो हतप्रभ करने वाला ही था।
 विश्व के प्रतिष्ठित समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं ने कुंभ मेले को आश्चर्य की दृष्टि से देखा कि किस प्रकार से एक स्थान पर करोड़ों लोग एकत्रित हुए। है।संवाद सेतु की टीम ने पश्चिमी मीडिया की अंतर्वस्तु की पडताल कर उसके दृष्टिकोण को समझने की कोशिश की।
कुंभ पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए टाइम मैगजीन ने अपनी वेबसाइट पर लिखा-
‘‘मानव समुदाय का सबसे बड़ा एकत्रीकरण इन दिनों उत्तर भारत के इलाहाबाद शहर में चल रहा है। गंगा, यमुना एवं पौराणिक नदी सरस्वती के तट पर कुंभ मेले के उत्सव का आयोजन चल रहा है, जिसमें एक करोड़ से अधिक लोग एकत्रित हैं। यह ऐसा समय है जब भारत की वैश्विक चिंताएं बढ़ रही हैं और सामाजिक समस्याएं भी गहराई हैं, तब इन साधुओं के भभूत से सराबोर चेहरे और सिर पर सांपों की तरह से लिपटे बाल इन सभी समस्याओं को पिछली सीट पर धकेलने का काम करते हैं। जो पूरे उन्माद के साथ गंगा में डुबकी लगा रहे हैं। हालांकि इसमें कोई नई बात नहीं है कि भारत से बाहर का कोई भी व्यक्ति इसे समय की बर्बादी ही कहेगा। यहां 19वीं सदी में भारत में तैनात रहे एक अधिकारी का यह वक्तव्य महत्वपूर्ण है, जिन्होंने कुंभ को देखने के बाद यह महसूस किया था कि भारत को ईसाईयत के प्रभाव में लाना जरूरी है।‘‘
‘‘अब भी लोग इन पवित्र नदियों के संगम तट पर एकत्र होते हैं। इनमें से कुछ लोग तो जैसे अपना प्राण स्वेच्छा से त्यागने आते हैं। डूबी हुई लाशें जब ऊपर आती हैं तो वह गिद्धों का आहार बन जाती हैं जो आत्माहुति के इस स्थान के चारों तरफ मंडराते रहते हैं। कोई भी समझदार व्यक्ति यदि इस भयानक दृश्य को देखेगा तो प्रसन्नता और अविनाशी आनंद के पीछे पागल इन लोगों के मतांतरण करने की बात उसके भीतर जरूर जगेगी।‘‘
टाइम के अनुसार यह किसी के लिए भी आश्चर्य का विषय हो सकता है कि लोग इतनी विशाल भीड़ से क्यों जुड़ना चाहते हैं। कुछ निश्चित शुभ दिनों में गंगा, यमुना एवं सरस्वती के संगम तट पर लाखों लोग लोग एकत्र होते हैं। एटलांटिक क्वार्टज वेबसाइट ने इस मेले को वैश्विक संदर्भ में देखते हुए लिखा-
‘‘कल्पना करें कि शंघाई शहर की सारी आबादी 4 गुणा 8 किलोमीटर के मैदान में एकत्र होती है। यहां एकत्र आबादी को देखें तो न्यूयार्क का प्रत्येक व्यक्ति, महिला एवं बच्चे यहां अपनी हाजिरी दर्ज कराते हैं। इतना ही नहीं, मेेले का क्षेत्र भी पिछली बार की तुलना में बढ़ा है, जहां 2011 में मेले का क्षेत्रफल 1,495.31 हेक्टेयर था एवं 11 सेक्टरों में विभाजित था। वहीं 2013 में मेले का क्षेत्रफल 1936.56 हेक्टेयर एवं 14 सेक्टर हो गया। यह क्षेत्रफल लगभग 4,784 एकड़ हुआ जो लगभग दुनिया के सबसे बड़े पार्क मैड्रिड के कासा डे कैंपो के बराबर है।
इसी प्रकार से पत्रिका ने कुंभ के दौरान विभिन्न प्रकार प्रदूषण के आंकड़े भी निकाले हैं और मेला क्षेत्र को एक कठिन क्षेत्र करार देने का प्रयास किया है। हालांकि पत्रिका की वेबसाइट पर ही यूनिवर्सिटी आफ सेंट एंडयूज में फीजियोलाजिकल स्टीफन रिचर की यह पंक्तियां भी उद्धृत हैं, जिसमें उन्होंने कुंभ को सामाजिक संबंधों के विकास का प्लेटफार्म बताते हुए लिखा है-
 ‘‘ हमारा मानना है कि यह मेला सामाजिक संबंधों का परिचय कराता है और यह बताता है कि हम अकेले नहीं हैं। हम अन्य लोगों को भी बुला सकते हैं और वह लोग हमारे लिए सुरक्षा जाल का काम करते हैं। यहां आकर लोग एक-दूसरे के मंगल की कामना करते हैं और उसके बाद अपने जीवन की सामान्य पटरी पर लौट जाते हैं।‘‘
अंत में पत्रिका ने लिखा है कि संभवतः हिंदुओं के पूर्वज किसी समय एक उद्देश्य के लिए नदी किनारे एकत्र हुए होंगे और यह परंपरा आज भी जारी है। वहीं द गार्जियन ने अपनी वेबसाइट पर एक सवाल पूछा है कि
-दुनिया में ऐसी कौन सी जगह है, जहां किसी भी स्थान से अधिक लोग एकत्र होते हों ? मानव के समूचे इतिहास में ऐसा कौन सा स्थान है, जहां सबसे अधिक लोगों के पैरों के निशान हों ?
इस सवाल के जवाब में पाठकों ने मक्का, टाइम्स स्क्वायर, टोक्यो शिब्युआ क्रासिंग समेत कुंभ को वह स्थान बताया जहां दुनिया भर के किसी भी स्थान से अधिक लोग एकत्र होते हैं।
एक पाठक सेरजियो कार्वाल्हो का जवाब था कि-
‘‘मेरे अनुमान से भारत के इलाहाबाद में यमुना एवं गंगा के संगम तट पर दुनिया में सबसे अधिक लोग कुंभ मेले के दौरान एकत्रित होते हैं और हजारों तीर्थयात्री यहां अस्थियां भी प्रवाहित करते हैं। यहां पर लोग हजारों वर्षों से तीर्थयात्रा के उद्देश्य से एकत्र होते रहे हैं।‘‘
वहीं द मीडिया इंटरनेशनल ने कुंभ मेले को दुनिया का सबसे बड़ा पर्व करार देते हुए लिखा कि इस मेले में हज यात्रा से भी अधिक लोग एकत्र होते हैं।
बीबीसी ने मार्क टली की रिपोर्ट के जरिए कुंभ को सामाजिक समरसता, संवाद के मंच एवं विश्व कल्याण के उद्देश्य से लगे कुंभ मेले को केवल साधुओं के करतबों और नागा साधुओं तक ही सीमित रखा। मार्क टली ने अपनी रिपोर्ट में भारत में व्यतीत अपने जीवन में कुंभ को सबसे बड़ा आश्चर्य बताते हुए अमृत मंथन की कथा का जिक्र किया है और मेले में साधुओं के करतबों का जिक्र किया है। कुल मिलाकर बीबीसी की पूरी रिपोर्ट कुंभ को आश्चर्य बताने पर ही केंद्रित रही।
कुंभ मेले के संदर्भ में विदेशी मीडिया कवरेज की बात करें तो उसका पूरा ध्यान कुंभ को आश्चर्य एवं अंध आस्था बताने पर ही केंद्रित रहा। जबकि उसने कुंभ मेले के सामाजिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक पक्ष को नजरंदाज कर दिया। जहां मेले के दौरान दुनिया के अनेकों देशों से लोग इस आयोजन के बारे में जानने एवं उसमें भागीदारी के लिए आए थे तो उसके उलट विदेशी मीडिया ने अपनी बौखलाहट के कारण इस आयोजन को नकरात्मक तौर पर प्रस्तुत करने में ही अपनी सारी ताकत झोंक दी।

Post Navigation