संवादसेतु

मीडिया का आत्मावलोकन…

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सम्पादकीय

आश्विन कृष्ण द्वितीया, तद्नुसार 14 सितम्बर 2011। श्राद्ध पक्ष।

आज हिन्दी का वार्षिक श्राद्ध है। मैं इस संयोग से विस्मित हूं कि हिन्दी दिवस अधिकांश श्राद्ध पक्ष में पड़ता है। जिस प्रकार श्राद्ध पक्ष में हम अपने पूर्वजों को स्मरण करते हैं, कुछ वैसे ही हिन्दी को भी याद करने का चलन चल पड़ा है।

मेरे एक पड़ोसी जब तक जीवित रहे, पुत्र-पुत्रवधू के साथ उनकी कभी बनी नहीं। उनकी मृत्यु के बाद वही पुत्र उनको स्मरण करते हुए भाव-विभोर हो जाता है। उनकी तिथि पर प्रतिवर्ष श्राद्ध में ग्यारह ब्राह्मणों को भोजन करा कर दक्षिणा देता है। मैंने एक बार उसे कहा- तुम्हारे पिता तुम्हारे आचरण से हमेशा व्यथित रहे। अब ऐसा क्या हो गया कि तुम इतना समारोहपूर्वक श्राद्ध करते हो। उसने उत्तर दिया –

उनकी तिथि हमें यह आश्वासन देती है कि वह अब लौट कर नहीं आयेंगे। संभवतः हिन्दी दिवस भी मनाने वालों को यही आश्वासन देता है। हिन्दी जल्दी नहीं आयेगी और वे लम्बे समय तक हिन्दी दिवस मना सकेंगे।

जो लोग हिन्दी पत्रकारिता को दशकों तक अंग्रेजी के अनुवाद की खूंटी पर टांग कर रखने के अपराधी हैं वहीं हिन्दी दिवस पर उसकी दुर्दशा का रोना रोते हैं। इस वार्षिक कर्मकाण्ड में उनका स्थान मंच पर तय है। हिन्दी के श्राद्ध के इन महाब्राह्मणों ने अपने भोज का इंतजाम पक्का कर रखा है। नये पत्रकारों को यह हिन्दी को सरल बनाने के लिये विदेशी भाषाओं के शब्द जोड़ने का नुस्खा बताते हैं और खुद हिन्दी के नाम पर विदेश यात्राओं की तिकड़म भिड़ाते हैं।

जिनकी दाल-रोटी हिन्दी के नाम पर चल रही है वही उसको गर्त में धकेलने में लगे हुए हैं। साहित्य के नाम पर लेखक जिस शब्दावली का प्रयोग भाषा में बढ़ाते जा रहे हैं उसका अर्थ समझाने में अध्यापकों को भी पसीना आने लगता है। देश के सबसे बड़े समाचार पत्र समूह का दावा करने वाले समूह के हिन्दी दैनिक के विषय में एक साहित्यकार ने टिप्पणी की कि अमुक हिन्दी पत्र में छपे समाचार को समझने के लिये पाठक को कम से कम स्नातक तक अंग्रेजी पढ़ा होना जरूरी है।

हाल ही में लगे पुस्तक मेले में हर प्रकाशक बिक्री न होने का दुखड़ा रोता मिला। ग्यारह सौ प्रतियां छाप कर पुस्तकालयों में पहुंचाने के बाद प्रकाशक अपने कर्तव्य को पूरा मान लेते हैं। एक-एक प्रकाशक कई-कई नामों से पुस्तकें बेचने की कोशिश करते मिलते हैं। फर्जीवाड़ा यहां तक आ पहुंचा है कि एक ही पुस्तक को दो नामों से छाप कर पुस्तकालयों में खपा दिया जाता है।

हिन्दी की हालत गाय जैसी हो गयी है। उसे पालना बोझ है और काट कर मांस और खाल बेचना मुनाफे का सौदा। इस स्थिति में हिन्दी को बचायेगा कौन। इन कसाइयों के मुंह तो हिन्दी का खून लग चुका है।

इस अंधेरे में भी उम्मीद की एक किरण आती दिख रही है। पेशेवर हिन्दी वालों से इतर शौकिया हिन्दी गुनगुनाने वालों ने इंटरनेट पर हिन्दी का एक वितान बुन दिया है। उन्हें न सरकारी खरीद में कोई रुचि है और न किताबें बेचने की ललक। कोमल-कठोर शब्दों का एक अनगढ़ आसमान आकार ले रहा है। हिन्दी दिवस के इस वार्षिक श्राद्ध पर जब हम दक्षिण दिशा में मुख कर हिन्दी की पेशेवर दुनियां को तर्पण करें तो अदम्य उत्साह से भरी युवा साहित्यकारों की नवोदित पीढ़ी के उजास को पूरब की ओर मुंह कर अर्घ्य देना न भूलें। हिन्दी के भविष्य का सूरज भी इस पूरब से ही निकलेगा और इंटरनेट आधारित संवाद माध्यमों का मंगलाचरण भी इस प्राची में ही गूंजेगा।

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हिन्दी हूं मैं…

एक रात जब मैं सोया तो मैंने एक सपना देखा, जिसका जिक्र मैं आपसे करने पर विवश हो गया हूं। सपने में मैं हिन्दी दिवस मनाने जा रहा था। तभी कहीं से आवाज आई…रुको! मैंने मुड़कर देखा तो वहां कोई नही था। मैं फिर चल पड़ा..फिर आवाज आयी…रुको! मेरी बात सुनो। मैंने गौर से सुना तो लगा कि कोई महिला जैसे वेदना भरे स्वर में मुझे पुकार रही हो। मैंने पूछा आप कौन हो जवाब आया…मैं हिन्दी हूं। मैंने कहा कौन हिन्दी\ मैं तो किसी हिन्दी नाम की महिला को नहीं जानता। दोबारा आवाज आई…तुम अपनी मातृभाषा को भूल गए, मेरे तो जैसे रोंगटे खडे़ हो गए…मैंने कहा मातृभाषा आप! मैं आपको कैसे भूल सकता हूं। फिर आवाज आयी…जब तुम सब मुझे बोलने में शर्म महसूस करते हो, तो भूलना न भूलना बराबर ही है।

फिर हिन्दी ने बोलना शुरू किया – तुम मेरी शोक सभा में जा रहे हो न,  मैंने कहा ऐसा नहीं है ये दिवस आपके सम्मान में मनाया जाता है। हिन्दी ने कहा – नहीं चाहिए ऐसा सम्मान… मेरा इससे बड़ा अपमान क्या होगा कि हिन्दुस्तानियों को हिन्दी दिवस मनाना पड़ रहा है।

उसके बाद हिन्दी ने जो भी कहा वो इन पंक्तियों के माध्यम से प्रस्तुत है…

 हिन्दी हूं मैं! हिन्दी हूं मैं..

भारत माता के माथे की बिन्दी हूं मैं

देवों का दिया ज्ञान हूं मैं,

हिन्दुस्तानियों का ईमान हूं मैं,

इस देश की भाषा थी मैं,

करोड़ों लोगों की आशा थी मैं,

हिन्दी हूं, मैं! हिन्दी हूं मैं..

भारत माता के माथे की बिन्दी हूं मैं।

सोचती हूं शायद बची हूं मैं,

किसी दिल में अभी भी बसी हूं मैं,

पर अंग्रेजी के बीच फंसी हूं मैं,

न मनाओ तुम मेरी बरसी,

मत करो ये शोक सभाएं,

मत याद करो वो कहानी,

जो नहीं किसी की जुबानी

सोचती थी हिन्द देश की भाषा हूं मैं,

अभिव्यक्ति की परिभाषा हूं मैं,

सच्ची अभिलाषा हूं मैं,

लेकिन अब निराशा हूं मैं,

जी हां हिन्दी हूं मैं,

भारत मां के माथे की बिन्दी हूं मैं।।

इस सपने के बाद मैं हिन्दी दिवस के किसी कार्यक्रम में नहीं गया। घर में बैठ कर बस यही सोचता रहा कि क्या आज सच में हिन्दी का तिरस्कार हो रहा है\ क्या हमें अपनी मातृभाषा के सम्मान के लिए किसी दिन की आवश्यकता है? शायद नहीं…

मेरा तो यही मानना है कि आप अपनी मातृभाषा को केवल अपने दिलों-जुबान से सम्मान दो और अगर ऐसा सब करें तो हर दिन हिन्दी दिवस होगा।

जय हिन्द, जय हिन्दी…

हिमांशु डबराल, सितम्बर अंक २०११

 

वाद, विवाद, अनुवाद की छाया से मुक्त हो हिन्दी पत्रकारिता

हिन्दी के सर्वप्रथम दैनिक उदन्त मार्तण्ड के प्रथम और अंतिम संपादक पंडित युगल किशोर शुक्ल ने लिखा था-

इस उदन्त मार्तण्ड, के नांव पढ़ने के पहिले पछाहियों के चित का इस कागज न होने से हमारे मनोर्थ सफल होने का बड़ा उतसा था। इसलिए लोग हमारे बिन कहे भी इस कागज की सही की बही पर सही करते गये पै हमें पूछिए तो इनकी मायावी दया से सरकार अंगरेज कम्पनी महाप्रतापी की कृपा कटाक्ष जैसे औरों पर पड़ी, वैसे पड़ जाने की बड़ी आशा थी और मैंने इस विषय में यथोचित उपाय किया पै करम की रेख कौन मेटै। तिस पर भी सही की बही देख जो सुखी होता रहा अन्त में नटों कैसे आम आदमी दिखाई दिए इस हेत स्वारथ अकारथ जान निरे परमारथ को कहां तक बनजिए अब अपने व्यवसायी भाइयों से मन की बात बताय बिदा होते हैं। हमारे कुछ कहे सुने का मन में ना लाइयो जो देव और भूधर मेरी अंतर व्यथा और इस गुण को विचार सुधि करेंगे तो ये गुण मेरे ही हैं। शुभमिति।

यह उद्धरण उस समय का है जब उदन्त मार्तण्ड लगभग अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था। आज इस घटना को लगभग 183 वर्ष होने को हैं लेकिन हालात बहुत कुछ नहीं बदले हैं। बस इतना सा अंतर आया है कि तब पंडित युगल किशोर शुक्ल व्यापारियों से आगे आने को कह रहे थे और आज व्यापारी वर्ग आगे तो आ चुका है मगर आगे आने का उसका एकमात्र उद्देश्य मुनाफा कमाना है। उसे हिन्दी, हिन्दी भाषियों और हिन्दी की पत्रकारिता से कोई भावनात्मक लगाव नहीं है।

यही वजह है कि हर साल हिन्दी दिवस के मौके पर इस भाषा के बढ़ते बाजार, हिन्दीभाषियों की संख्या, इसकी तकनीकी क्षमता के विस्तार और इस प्रकार के तमाम आंकड़ों के सुर्खियों में आने के बावजूद हिन्दी पत्रकारिता अपने स्वतंत्र अस्तित्व के लिए जूझती दिखती है। कहने को हिन्दी पत्रकारिता के बाजार का विस्तार हो रहा है, इसमें निवेश बढ़ रहा है लेकिन साथ ही यह भी कटु सत्य है कि अपनी शुरुआत के 185वें वर्ष में प्रवेश करने के बाद भी हिन्दी पत्रकारिता वाद, विवाद और अनुवाद की छाया से मुक्त नहीं हो पा रही है जिसके कारण सार्थक परिणाम भी नहीं दे पा रही है।

वाद और विवाद सिर्फ हिन्दी की समस्याएं नहीं है बल्कि ये अनुवाद के रास्ते ही हिन्दी जगत में आयी हैं। दरअसल, अनुवाद पर आश्रित होने की वजह से ही हिन्दी पत्रकारिता अंग्रेजी की ही तरह भ्रामक वादों और तुच्छ विवादों में घिरकर अपने मूल उद्देश्य को लगभग भुला चुकी है। इसलिए आज सबसे बड़ी जरूरत उसे अनुवाद की इस छाया से मुक्त करने की है ताकि हिन्दी की पत्रकारिता अपना मौलिक ढांचा विकसित कर सके और हिन्दी के अनुकूल व्यवस्थाएं तैयार हो सकें।

शुक्ल जी ने ही उदन्त मार्तण्ड के प्रथम अंक में लिखा था-

यह उदन्त मार्तण्ड अब पहिले पहल हिन्दुस्तानियों के हित हेतु जो आज तक किसी ने नहीं चलाया पर अंग्रेजी ओ फारसी ओ बंगले में जो समाचार का कागज छपता है उसका सुख उन् बोलियों के जान्ने ओ पढ़ने वालों को ही होता है। ……… देश के सत्य समाचार हिन्दुस्तानी लोग देखकर आप पढ़ ओ समझ लेंय ओपराई अपेक्षा जो अपने भावों के उपज न छोड़े, इसलिए बड़े दयावान करुणा ओ गुणनि के निधान सबके विषय श्रीमान् गवरनर जेनेरल बहादुर की आयस से अैसे चाहत में चित्त लगाय के एक प्रकार से यह नया ठाट ठांटा ………

आज हिन्दी को जान्ने ओ पढ़ने वालों’ के लिए उनकी बोली में काम करने वाले संस्थानों की कमी नहीं है। परंपरागत अखबारों, पत्रिकाओं से लेकर टीवी और इंटरनेट तक सब जगह इनकी मौजूदगी है और संख्यात्मक रूप से कहें तो दमदार मौजूदगी है। देश के सर्वाधिक बिकने वाले अखबारों की सूची में अपना दबदबा होता है लेकिन बस इसलिए कि हिन्दी जानने-समझने वालों के लिए इसे समझना आसान है। मौलिकता की खोज में पाठकों/दर्शकों को एक बार फिर से अंग्रेजी का ही रूख करना पड़ता है। आखिर इसकी वजह क्या है, इसकी सबसे बड़ी वजह अनुवाद पर निर्भर रहने की विवशता है।

आय और लाभांश के मामले में हिन्दी मीडिया संस्थानों की हालत जो भी हो, ढांचागत हालत यही है कि उनके पास उतनी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं जितनी अंग्रेजी के पास हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि हिन्दी में भी अव्वल रहने वाले ज्यादातर संस्थान सिर्फ हिन्दी के नहीं हैं। ये द्विभाषिक या बहुभाषी संस्थान हैं और अंग्रेजी को ही इन्होंने अपना चेहरा बना रखा है। सारी मौलिक व्यवस्थाएं और सुविधाएं अंग्रेजी को प्राप्त हैं और शेष भाषाओं की शाखाएं उनके अनुवाद तक सीमित हैं।

प्रिंट से इलेक्ट्रानिक तक हिन्दी की स्थिति यही है। अखबारों, संवाद समितियों और चैनलों तक में जोर अंग्रेजी पर है। संस्थान अपनी ऊर्जा का अधिकतम हिस्सा अंग्रेजी पर खर्च कर रहा है और हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं से उनका वास्ता काम चलाने भर का है। देश में बड़े स्तर के कार्यक्रम हों, विदेश दौरों का मामला हो या फिर कोई अन्य खर्चीला काम, कवरेज के लिए प्राथमिकता अंग्रेजी के पत्रकारों को दी जाएगी या फिर अगर आप हिन्दी के हैं तो आप इसी शर्त पर भेजे जाएंगे कि अंग्रेजी को भी आप पर्याप्त सेवाएं दें। अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद नियति है लेकिन हिन्दी से अंग्रेजी अनुवाद की जहमत नहीं उठायी जाएगी। यही स्थिति बुनियादी सुविधाओं और कई जगह तो वेतन ढांचों के मामले में भी देखने को मिलती है। कई बार देखा जाता है कि एक ही संस्थान में हिन्दी के पत्रकारों का औसत वेतन उसी संस्थान के अंग्रेजी के पत्रकारों के मुकाबले आधे से भी कम है।

इस परिप्रेक्ष्य में यह बात स्पष्ट तौर पर कही जा सकती है कि हिन्दी इन संस्थानों के लिए दुधारू गाय जरूर मालूम पड़ती है लेकिन उसे चारा देने में सबको परहेज है। हाल के वर्षों तक ऐसा होता था कि बड़े पत्र समूहों में किसी एक संस्करण से प्राप्त होने वाली अच्छी आय का उपयोग नये संस्करण प्रकाशित करने या अखबारों की गुणवत्ता सुधारने में होता था लेकिन अब ऐसी प्रवृति पनप रही है कि हिन्दी का उपयोग केवल राजस्व प्राप्ति के लिए हो और उस राजस्व का इस्तेमाल अन्य खर्चों की पूर्ति के लिए किया जाए। ताज्जुब होता है यह सुनकर कि हिन्दी का एक प्रसिद्ध और काफी पुराना दैनिक इन दिनों अपने विज्ञापन कारोबार से मिलने वाली रकम का भी जायदादी कारोबार में निवेष कर रहा है। बिल्डरों के मीडिया में आने की प्रवृति कुछ वर्ष पहले तक देखी जा रही थी लेकिन मीडिया वालों की बिल्डर बनने या अन्य कारोबार में घुसने की कोशिश कहीं से भी शुभ संकेत नहीं है, खासकर, हिन्दीभाषी मीडिया के मामले में उसकी ढांचागत कमजोरियों के मद्देनजर यह बात ज्यादा प्रभावी दिखती है।

यह तो बात थी अनुवाद की। पत्रकारिता के मूलतः बौद्धिक कार्य होने के कारण इसके पेशेवरों के बीच वैचारिक वादों के प्रति विशेष अनुराग की संभावना हमेशा बनी रहती है। हिन्दी पत्रकारिता के साथ भी ऐसा हो रहा है और वादों के प्रति अनुराग के अतिरेक में इसके पत्रकार कई बार सूचक की अपनी भूमिका से उठकर प्रवक्ता की भूमिका में आने को विकल मालूम पड़ते हैं। इस वजह से बारंबार उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। मार्क्सवाद से उग्र राष्ट्रवाद तक और यथास्थितिवाद से आधुनिकतावाद तक वैचारिक मंथन के मोर्चों पर कई बार पत्रकारों की तटस्थता संदिग्ध होती रही है। इस स्थिति का खामियाजा कहीं न कहीं पत्रकारिता को ही उठाना पड़ेगा। हिन्दी के साथ विडम्बना यह है कि उसके अधिकतर पत्रकार या तो इन वादों के मोहपाश में हैं या तात्कालिक लाभों के अनुकूल अलग-अलग वादों का चोला बदलते रहते हैं और जो लोग बौद्धिकता के इस ज्वर से पीडि़त नहीं हैं उनके लिए विवाद ही खबर है।

जैसा कि पहले कहा गया कि वाद और विवाद की समस्या भी हिन्दी में आयातित है। भारतीय मीडिया का मौलिक चरित्र अंग्रेजी का मीडिया ही तय करता है और इस वजह से अंग्रेजी की ही तरह हिन्दी में भी तुच्छ विवादों को खबर बनाने की कोशिश होती है। अंग्रेजी का टीवी मीडिया तो इस बीमारी से उबरने की बहुत हद तक कोशिश कर रहा है लेकिन अब तक अबोधपन से गुजर रही हिन्दी मीडिया के लिए यह समस्या विकराल ही होती जा रही है। ग्लैमर की दुनिया के बेसिरपैर विवाद प्रिंट से इलेक्ट्रानिक तक में कई बार मुख्य खबर बनकर महत्वपूर्ण खबरों को धकिया रहे हैं। सीएमएस मीडिया लैब समेत कई शोध संस्थान अपनी रिपोर्टों में इस बात की पुष्टि कर चुके हैं। ऐसी सतही खबरों में उलझकर रहने की हिन्दी मीडिया की अनावश्यक विवशता भी कहीं न कहीं उसकी दुर्गति का कारण है। इसलिए अब हिन्दी मीडिया को अपने बेहतर भविष्य से उबरने के लिए वाद, विवाद और अनुवाद की छाया से मुक्त होकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व स्थापित करने के लिए पहल करनी होगी।

ऋतेष पाठक, अगस्त अंक, २०११

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