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साहित्यिक पत्रकारिता के ‘अमृत‘ विद्यानिवास मिश्र

                                                                                                    viya nivas mishra
हिंदी पत्रकारिता को शिखर तक पहुंचाने में हिंदी साहित्य और साहित्यकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारतीयता, भारतीय संस्कृति और सनातन संस्कृति के प्रवाह को जीवंत बनाए रखने में हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता ने अपना अथक योगदान दिया है। आज के दौर में हिंदी पत्रकारिता जिस प्रकार साहित्य से विलग दिखाई पड़ती है, ऐसी पहले न थी बल्कि एक वक्त तो ऐसा भी था, जब साहित्य और पत्रकारिता एक-दूसरे का सहारा बन आगे बढ़ रहे थे। हिंदी पत्रकारिता को उसका ध्येय पथ दिखलाने का कार्य समय-समय पर ऐसे पत्रकारों ने किया, जो साहित्य की विधा में भी सिद्धहस्त थे। भारतेंदु हरीशचंद्र, माखनलाल चतुर्वेदी, हनुमान प्रसाद पोद्दार, महावीर प्रसाद, हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि इसी कड़ी के नाम हैं, जिन्होंने हिंदी की लड़ाई लड़ी। साहित्य और पत्रकारिता की इस विरासत को बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में प्रवाहमय बनाए रखने का कार्य किया विद्यानिवास मिश्र ने। मिश्र जी हिंदी साहित्य, परंपरा, संस्कृति के मर्मज्ञ थे।
हिंदी पत्रकारिता और साहित्य के बेहतरीन और कारगर सम्मिश्रण की मिसाल पेश करने वाले विद्यानिवास मिश्र ने पत्रकारिता के माध्यम से भारतीयता को मुखरता प्रदान की। सन 1926 में गोरखपुर के पकड़डीहा गांव में जन्मे विद्यानिवास मिश्र अपनी बोली और संस्कृति के प्रति सदैव आग्रही रहे। सन 1945 में प्रयाग विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर एवं डाक्टरेट की उपाधि लेने के बाद उन्होंने अनेकों वर्षों तक आगरा, गोरखपुर, कैलिफोर्निया और वाशिंगटन विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया। विद्यानिवास मिश्र देश के प्रतिष्ठित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय एवं काशी विद्यापीठ के कुलपति भी रहे। इसके बाद अनेकों वर्षों तक वे आकाशवाणी और उत्तर प्रदेश के सूचना विभाग में कार्यरत रहे। हिंदी साहित्य के सर्जक विद्यानिवास मिश्र ने साहित्य की ललित निबंध की विधा को नए आयाम दिए। हिंदी में ललित निबंध की विधा की शुरूआत प्रतापनारायण मिश्र और बालकष्ण भटट ने की थी, किंतु इसे ललित निबंधों का पूर्वाभास कहना ही उचित होगा। ललित निबंध की विधा के लोकप्रिय नामों की बात करें तो हजारी प्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र एवं कुबेरनाथ राय आदि चर्चित नाम रहे हैं। लेकिन यदि लालित्य और शैली की प्रभाविता और परिमाण की विपुलता की बात की जाए तोविद्यानिवास मिश्र इन सभी से कहीं अग्रणी रहे हैं। विद्यानिवास मिश्र के साहित्य का सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्सा ललित निबंध ही हैं। उनके ललित निबंधों के संग्रहों की संख्या भी 25 से अधिक होगी।
लोक संस्कृति और लोक मानस उनके ललित निबंधों के अभिन्न अंग थे, उस पर भी पौराणिक कथाओं और उपदेशों की फुहार उनके ललित निबंधों को और अधिक प्रवाहमय बना देते थे। उनके प्रमुख ललित निबंध संग्रह हैं- राधा माधव रंग रंगी, मेरे राम का मुकुट भीग रहा है, शैफाली झर रही है, चितवन की छांह, बंजारा मन, तुम चंदन हम पानी, महाभारत का काव्यार्थ, भ्रमरानंद के पत्र, वसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं और साहित्य का खुला आकाश आदि आदि। वसंत ऋतु से विद्यानिवास मिश्र को विशेष लगाव था, उनके ललित निबंधों में ऋतुचर्य का वर्णन उनके निबंधों को जीवंतता प्रदान करता था। वसंत ऋतु पर लिखे अपने निबंध संकलन फागुन दुइ रे दिना में वसंत के पर्वों को व्याख्यायित करते हुए, अपना अहंकार इसमें डाल दो शीर्षक से लिखे निबंध में वे शिवरात्रि पर लिखते हैं-

‘‘शिव हमारी गाथाओं में बड़े यायावर हैं। बस जब मन में आया, बैल पर बोझा लादा और पार्वती संग निकल पड़े, बौराह वेश में। लोग ऐसे शिव को पहचान नहीं पाते। ऐसे यायावर विरूपिए को कौन शिव मानेगा ? वह भी कभी-कभी हाथ में खप्पर लिए। ऐसा भिखमंगा क्या शिव है ?”


इसके बाद इन पंक्तियों को विवेचित करते हुए विद्यानिवास मिश्र लिखते हैं-

‘‘हां, यह जो भीख मांग रहा है, वह अहंकार की भीख है। लाओ, अपना अहंकार इसमें डाल दो। उसे सब जगह भीख नहीं मिलती। कभी-कभी वह बहुत ऐश्वर्य देता है और पार्वती बिगड़ती हैं। क्या आप अपात्र को देते हैं ? शिव हंसते हैं, कहते हैं, इस ऐश्वर्य की गति जानती हो, क्या है ? मद है। और मद की गति तो कागभुसुंडि से पूछो, रावण से पूछो, बाणासुर से पूछो।”

इन पंक्तियों का औचित्य समझाते हुए मिश्र जी लिखते हैं-

‘‘पार्वती छेड़ती हैं कि देवताओं को सताने वालों को आप इतना प्रतापी क्यों बनाते हैं ? शिव अट्टाहास कर उठते हैं, उन्हें प्रतापी न बनाएं तो देवता आलसी हो जाएं, उन्हें झकझोरने के लिए कुछ कौतुक करना पड़ता है।”


यह मिश्र जी की अपनी उद्भावना है, प्रसंग पौराणिक हैं, किंतु वर्तमान पर लागू होते हैं। पुराण कथाओं का संदर्भ देते हुए विद्यानिवास मिश्र ने साहित्य के पाठकों को भारतीय संस्कति का मर्म समझाने का प्रयास किया है। उनके ललित निबंधों में जीवन दर्शन, संस्कृति, परंपरा और प्रकति के अनुपम सौंदर्य का तालमेल मिलता है। इस सबके बीच वसंत ऋतु का वर्णन उनके ललित निबंधों को और अधिक रसमय बना देता है। ललित निबंधों के माध्यम से साहित्य को अपना योगदान देने वाले विद्यानिवास हिंदी की प्रतिष्ठा हेतु सदैव संघर्षरत रहे, मारीशस से सूरीनाम तक अनेकों हिंदी सम्मेलनों में मिश्र जी की उपस्थिति ने हिंदी के संघर्ष को मजबूती प्रदान की। हिंदी की शब्द संपदा, हिंदी और हम, हिंदीमय जीवन और प्रौढ़ों का शब्द संसार जैसी उनकी पुस्तकों ने हिंदी की सम्प्रेषणीयता  के दायरे को विस्तृत किया। तुलसी और सूर समेत भारतेंदु, अज्ञेय, कबीर, रसखान, रैदास, रहीम और राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं को संपादित कर उन्होंने हिंदी के साहित्य को विपुलता प्रदान की।

         विद्यानिवास जी कला एवं भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ थे। खजुराहो की चित्रकला का सूक्ष्मता और तार्किकता से अध्ययन कर उसकी नई अवधारणा प्रस्तुत करने वाले विद्यानिवास मिश्र ही थे। अकसर भारतीय चिंतक विदेशी विद्वानों से बात करते हुए खजुराहो की कलाकृतियों को लेकर कोई ठोस तार्किक जवाब नहीं दे पाते थे। विद्यानिवास जी ने अपने विवेचन के माध्यम से खजुराहो की कलाकृतियों की अवधारणा स्पष्ट करते हुए लिखा है-

‘‘यहां के मिथुन अंकन साधन हैं, साध्य नहीं। साधक की अर्चना का केंद्रबिंदु तो अकेली प्रतिमा के गर्भग्रह में है। यहां अभिव्यक्ति कला रस से भरपूर है। जिसकी अंतिम परिणति ब्रहम रूप है। हमारे दर्शन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की जो मान्यताएं हैं, उनमें मोक्ष प्राप्ति से पूर्व का अंतिम सोपान है काम।”

 उन्होंने कहा कि यह हमारी नैतिक दुर्बलता ही है कि खजुराहो की कलाकृतियों में हम विकृत कामुकता की छवि पाते हैं। स्त्री पुरूष अनादि हैं, जिनके सहयोग से ही सृष्टि जनमती है।सन 1990 के दशक में मिश्र जी ने नवभारत टाइम्स के संपादक के रूप में जिम्मेदारी संभाली। उदारीकरण के दौर में खांटी हिंदी पत्रकारिता को आगे बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण पत्रकारों में से एक मिश्र जी ने नवभारत टाइम्स को हिंदी के प्रतिष्ठित समाचार पत्र के रूप में नई पहचान दिलाई। पत्रकारीय धर्म और उसकी सीमाओं को लेकर वे सदैव सचेत रहते थे। वे अकसर कहा करते थे कि-

‘‘मीडिया का काम नायकों का बखान करना अवश्य है, लेकिन नायक बनाना मीडिया का काम नहीं है।” 

अपने पत्रकारीय जीवन में भी विद्यानिवास मिश्र हिंदी के प्रति आग्रही बने रहे। वे अंग्रेजी के विद्वान थे, लेकिन हिंदी लिखते समय अंग्रेजी के शब्दों का घालमेल उन्हें पसंद नहीं था। उन्होंने नवभारत टाइम्स के संपादक की जिम्मेदारी ऐसे वक्त में संभाली, जब हिंदी पत्रों के मालिक उदारीकरण के बाद बाजारू दबाव में हिंदी में अंग्रेजी के घालमेल का प्रयास कर रहे थे। अखबार मालिकों की मान्यता थी कि युवा पाठकों को यदि लंबे समय तक पत्र से जोड़े रखना है, तो हिंदी में अंग्रेजी शब्दों को जबरदस्ती ही सही घुसाना ही होगा। नवभारत टाइम्स के मालिक समीर जैन की भी यही मान्यता थी कि हिंदी समाचार पत्रों में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग होना वक्त की जरूरत है।  इन्हीं वाद-विवादों के बीच उन्होंने नवभारत टाइम्स के संपादक की जिम्मेदारी से स्वयं को मुक्त कर लिया, किंतु हिंदी में घालमेल को लेकर वे  कभी राजी नहीं हुए। हालांकि विद्यानिवास जी केनवभारत टाइम्स छोड़ने के बाद यह पत्र उसी राह पर आगे बढ़ा, जिस पर इसके मालिक समीर जैन ले जाना चाहते थे। विद्यानिवास जी ने नवभारत टाइम्स से अलग होने के बाद साहित्य अमृत पत्रिका का संपादन किया। व्यावसायिकता के बाजारू दौर में साहित्य अमृत पत्रिका ने विद्यानिवास जी के संपादकत्व में बतौर साहित्यिक पत्रिका नए मानक स्थापित किए। साहित्य अमृत का सौवां अंक भी विद्यानिवास जी के समय ही निकला था। पत्रिका के सौवें अंक के संपादकीय में संकल्पपूर्ण शब्दों में लिखा था-
‘‘हमें इतना परितोष है कि हम साहित्य अमृत पत्रिका को साहित्य की निरंतरता का मानदंड बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं।” 
                                                                                          sahitya-amrit
साहित्य अमृत पत्रिका ऐसे वक्त में जब पत्रकारीय मूल्य अन्य स्तंभों की भांति ही ढलान पर हों, बाजार के दबाव में आए बिना भारतीय संस्कृति के महत्व को उद्घाटित करती रही है। सौवें अंक के संपादकीय में भारतीयता का उद्घोष करते हुए विद्यानिवास मिश्र ने जयशंकर प्रसाद की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए लिखा-
‘‘किसी का हमने छीना नहीं, प्रकति का रहा पालना यही, हमारी जन्मभूमि थी यही, कहीं से हम आए थे नहीं।”

मिश्र जी साहित्य अमृत पत्रिका का संपादन अंतिम समय तक करते रहे। साहित्य अकादमी पुरस्कार, कालिदास पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्म विभूषण, पद्मश्री और अनेकों उपाधियों से सम्मानित विद्यानिवास मिश्र का 14 फरवरी, 2005 का सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया। उस वर्ष उनका प्रिय पर्व वसंत पंचमी 13 फरवरी को था। वसंत ऋतु में ही वे अपना शरीर त्यागकर इहलोक की यात्रा पर निकल पड़े। पं. विद्यानिवास मिश्र के इस दुनिया से जाने के बाद भी उनकी पत्रकारिता और साहित्य की सौरभ इस रचनाशील जगत को महकाती रहेगी।

 

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हिन्दी हूं मैं…

एक रात जब मैं सोया तो मैंने एक सपना देखा, जिसका जिक्र मैं आपसे करने पर विवश हो गया हूं। सपने में मैं हिन्दी दिवस मनाने जा रहा था। तभी कहीं से आवाज आई…रुको! मैंने मुड़कर देखा तो वहां कोई नही था। मैं फिर चल पड़ा..फिर आवाज आयी…रुको! मेरी बात सुनो। मैंने गौर से सुना तो लगा कि कोई महिला जैसे वेदना भरे स्वर में मुझे पुकार रही हो। मैंने पूछा आप कौन हो जवाब आया…मैं हिन्दी हूं। मैंने कहा कौन हिन्दी\ मैं तो किसी हिन्दी नाम की महिला को नहीं जानता। दोबारा आवाज आई…तुम अपनी मातृभाषा को भूल गए, मेरे तो जैसे रोंगटे खडे़ हो गए…मैंने कहा मातृभाषा आप! मैं आपको कैसे भूल सकता हूं। फिर आवाज आयी…जब तुम सब मुझे बोलने में शर्म महसूस करते हो, तो भूलना न भूलना बराबर ही है।

फिर हिन्दी ने बोलना शुरू किया – तुम मेरी शोक सभा में जा रहे हो न,  मैंने कहा ऐसा नहीं है ये दिवस आपके सम्मान में मनाया जाता है। हिन्दी ने कहा – नहीं चाहिए ऐसा सम्मान… मेरा इससे बड़ा अपमान क्या होगा कि हिन्दुस्तानियों को हिन्दी दिवस मनाना पड़ रहा है।

उसके बाद हिन्दी ने जो भी कहा वो इन पंक्तियों के माध्यम से प्रस्तुत है…

 हिन्दी हूं मैं! हिन्दी हूं मैं..

भारत माता के माथे की बिन्दी हूं मैं

देवों का दिया ज्ञान हूं मैं,

हिन्दुस्तानियों का ईमान हूं मैं,

इस देश की भाषा थी मैं,

करोड़ों लोगों की आशा थी मैं,

हिन्दी हूं, मैं! हिन्दी हूं मैं..

भारत माता के माथे की बिन्दी हूं मैं।

सोचती हूं शायद बची हूं मैं,

किसी दिल में अभी भी बसी हूं मैं,

पर अंग्रेजी के बीच फंसी हूं मैं,

न मनाओ तुम मेरी बरसी,

मत करो ये शोक सभाएं,

मत याद करो वो कहानी,

जो नहीं किसी की जुबानी

सोचती थी हिन्द देश की भाषा हूं मैं,

अभिव्यक्ति की परिभाषा हूं मैं,

सच्ची अभिलाषा हूं मैं,

लेकिन अब निराशा हूं मैं,

जी हां हिन्दी हूं मैं,

भारत मां के माथे की बिन्दी हूं मैं।।

इस सपने के बाद मैं हिन्दी दिवस के किसी कार्यक्रम में नहीं गया। घर में बैठ कर बस यही सोचता रहा कि क्या आज सच में हिन्दी का तिरस्कार हो रहा है\ क्या हमें अपनी मातृभाषा के सम्मान के लिए किसी दिन की आवश्यकता है? शायद नहीं…

मेरा तो यही मानना है कि आप अपनी मातृभाषा को केवल अपने दिलों-जुबान से सम्मान दो और अगर ऐसा सब करें तो हर दिन हिन्दी दिवस होगा।

जय हिन्द, जय हिन्दी…

हिमांशु डबराल, सितम्बर अंक २०११

 

भाषायी पत्रकारिता के संस्थापक राजा राममोहन राय

राजा राममोहन राय! यह नाम एक प्रखर एवं प्रगतिशील व्यक्तित्व का नाम है, जिन्होंने भारत में भाषायी प्रेस की स्थापना का ऐतिहासिक कार्य किया। राजा राममोहन राय को भारतीय पुनर्जागरण एवं सामाजिक आंदोलनों का प्रणेता भी कहा जाता है। उन्होंने तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरूद्ध जनजागरण का कार्य किया, जो तत्कालीन समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता थी। राजा राममोहन राय ने सामाजिक और राष्ट्रव्यापी जनजागरण कार्य पत्रकारिता के माध्यम से ही किया था। उन्होंने पत्रकारिता को जनजागरण के सशक्त माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया था। उनके द्वारा चलाए गए सामाजिक आंदोलन और पत्रकारिता एक-दूसरे के पूरक थे। उनकी पत्रकारिता सामाजिक आंदोलन को मजबूती प्रदान करती थी।

राजा राममोहन राय का जन्म राधानगर, बंगाल में 22 मई, 1772 को कुलीन ब्राहमण परिवार में हुआ था। उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जो धार्मिक विविधताओं से परिपूर्ण था। उनकी माता शैव मत में विश्वास करती थीं एवं पिता वैष्णव मत में, जिसका उनके जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा। सामाजिक परिवर्तनों के प्रणेता और आधुनिक भारत के स्वप्नदृष्टा राजा राममोहन राय ने संवाद कौमुदी, ब्रह्मैनिकल मैगजीन, मिरात-उल-अखबार, बंगदूत जैसे सुप्रसिद्ध पत्रों का प्रकाशन किया। राजा राममोहन राय ने सन 1821 में बंगाली पत्र संवाद कौमुदी का कलकत्ता से प्रकाशन प्रारंभ किया। इसके बाद सन 1822 में उन्होंने फारसी भाषा के पत्र मिरात-उल-अखबार और ब्रह्मैनिकल मैगजीन का प्रकाशन किया। यह पत्र तत्कालीन समय में राष्ट्रवादी एवं जनतांत्रिक विचारों के शुरूआती समाचार पत्रों में से थे। इन समाचार पत्रों का उद्देश्य राष्ट्रीय पुनर्जागरण और सामाजिक चेतना ही था। इन समाचार पत्रों के अलावा राजा राममोहन राय ने अंग्रेजी में बंगला हेराल्ड और बंगदूत का भी प्रकाशन किया।

राजा राममोहन राय ने भारत में उद्देश्यपूर्ण पत्रकारिता की नींव डाली थी। उन्होंने अपने द्वारा प्रकाशित किए गए समाचार पत्रों का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहा था कि-

मेरा उद्देश्य मात्र इतना है कि जनता के सामने ऐसे बौद्धिक निबंध उपस्थित करूं जो उनके अनुभव को बढ़ावें और सामाजिक प्रगति में सहायक सिद्ध हों। मैं अपनी शक्ति भर शासकों को उनकी प्रजा की परिस्थितियों का सही परिचय देना चाहता हूं और प्रजा को उनके शासकों द्वारा स्थापित विधि व्यवस्था से परिचित कराना चाहता हूं, ताकि जनता को शासक अधिकाधिक सुविधा दे सकें। जनता उन उपायों से अवगत हो सके जिनके द्वारा शासकों से सुरक्षा पायी जा सके और अपनी उचित मांगें पूरी कराई जा सकें।

राजा राममोहन राय ने भारत की पत्रकारिता की नींव उस समय डाली थी, जब भारत को पत्रकारिता के महत्वपूर्ण अस्त्र की आवश्यकता थी। वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कोलकाता प्रेस क्लब में अपने संबोधन में कहा था-

प्रधानमंत्री ने प्रेस की स्वतंत्रता के संबंध में राजा राममोहन राय के शब्दों को ही उद्धृत करते हुए कहा-

प्रेस की आजादी के बिना दुनिया के किसी भी हिस्से में क्रांति नहीं हो सकती है।

प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर मौजूदा दौर में आवाजें उठती रहती हैं। प्रेस की स्वतंत्रता की लड़ाई का आरंभ राजा राममोहन राय ने 19वीं सदी में ब्रिटिश शासन से टकराव लेकर किया था। उनका मानना था कि समाचारपत्रों पर सरकार का नियंत्रण नहीं होना चाहिए और सच्चाई सिर्फ इसलिए नहीं दबा देनी चाहिए कि वह सरकार को पसंद नहीं है। प्रेस की स्वतंत्रता के मुद्दे पर ही इतिहास पर दृष्टि डालते हुए मनमोहन सिंह ने कहा-

जब कोलकाता में प्रेस पर नियंत्रण करने का प्रयास किया गया, तब राजा राममोहन राय ने सरकार के निर्णय की आलोचना करते हुए ब्रिटिश सरकार को ज्ञापन सौंपा।

पत्रकारिता की स्वतंत्रता की ओर ब्रिटिश सरकार का ध्यान आकर्षित करते हुए राजा राममोहन राय ने ब्रिटिश सरकार से कहा-

कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले अधिकतर समाचारपत्र यहां के मूल निवासियों के बीच लोकप्रिय हैं, जो उनमें एक स्वतंत्र चिंतन और ज्ञान की व्याख्या करते हैं। यह समाचार पत्र उनके ज्ञान को बढ़ाने और स्थिति को सुधारने का प्रयत्न कर रहे हैं।

उन्होंने ब्रिटिश सरकार से कहा-

इन समाचारपत्रों के प्रकाशन पर रोक लगाया जाना उचित नहीं है।‘राजा राममोहन राय ने हमेशा ही पत्रकारिता की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया था। उन्होंने सन 1815 से 1830 के कम अंतराल में ही तीस पुस्तकें लिखी थीं। सौमेन्द्र नाथ ठाकुर के अनुसार- बंगाली काव्य जगत ने बंकिम चंद्र चटर्जी और रविन्द्र नाथ टैगोर की कविताओं के माध्यम से जो ऊंचाई प्राप्त की है, उसकी आधारशिला राजा राममोहन राय ने ही रखी थी।

राजा राममोहन राय को आधुनिक भारत का जनक माना जाता है। महान क्रांतिकारी सुभाष चंद्र बोस ने राजा राममोहन के बारे में कहा कि-

राजा राममोहन राय भारतीय पुनर्जागरण के अगुआ थे जिन्होंने भारत में एक मसीहा के रूप में नए युग का सूत्रपात किया।

राजा राममोहन राय की अंग्रेजी शासन और अंग्रेजी भाषा के प्रशंसक होने के कारण आलोचना की जाती रही है। उनकी तमाम आलोचनाओं के बाद भी भारत में भाषायी प्रेस की स्थापना और स्वतंत्रता के लिए किए गए उनके योगदान को भाषायी पत्रकारिता के इतिहास में भुलाया नहीं जा सकता है। राजा राममोहन राय अपनी मृत्यु से कुछ वर्ष पूर्व ब्रिटेन में जा बसे थे जहां 27 सितंबर, 1833 को ब्रिस्टल (इंग्लैण्ड) में उनका निधन हो गया।

सूर्यप्रकाश, सितम्बर, अंक २०११

 

सौदेबाजी की राह पर पत्रकारिता: अशोक टंडन

भारत में पत्रकारिता ने अपनी शुरूआत मिशन के तौर पर  की थी जो धीरे-धीरे पहले प्रोफेशन और फिर कामर्शियलाइजेशन में तब्दील हो गई। आज पत्रकारिता कमर्शियलाइजेशन के दौर से भी आगे निकल चुकी है जिसके संदर्भ में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विशवविद्यालय के पूर्व निदेशक अशोक टंडन से बातचीत के कुछ अंश यहां प्रस्तुत है।  

पत्रकारिता के क्षेत्र में आपका आगमन कैसे हुआ इस दौरान आपके क्या अनुभव रहें ?

दिल्ली विश्वविद्यालय से जब मैं राजनीति शास्त्र में एम.ए. कर रहा था तो उस समय कुछ पत्रकारों को देखकर इस क्षेत्र की ओर आकर्षण बढ़ा। एम.ए. पूरी करने के बाद वर्ष 1970 में मुझे हिन्दुस्थान समाचार से विश्वविद्यालय बीट कवर करने का मौका मिला। वर्ष 1972 में मैंने पीटीआई में रिपोर्टिंग शुरू की और वहां विश्वविद्यालय, पुलिस, दिल्ली प्रशासन, संसद, विदेश मंत्रालय समेत लगभग सभी बीट कवर की। 28 वर्षों के दौरान मैंने लगभग 28 देशों की यात्राएं की। पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करना चुनौतीपूर्ण होता है।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारिता के आपके क्या अनुभव रहें?

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की पत्रकारिता के लिए पहले अपने देश को समझना होता है। भारत में जब वर्ष 1980 के दशक की शुरूआत में नान अलाइनमेंट समिट और कामनवेल्थ गेम्स समिट हुई तो उसमें रिपोर्टिंग का अवसर मिला। वर्ष 1985 में मुझे विदेश मंत्रालय की बीट सौंपी गई। इस दौरान भारत के प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति के साथ विदेश जाने का मौका मिला। वर्ष 1988 में मुझे पीटीआई लंदन का संवाददाता नियुक्त कर दिया गया। जब कोई पत्रकार विदेश में रहकर पत्रकारिता करता है तो उसका फोकस अपने देश पर ही रहता है।

आप पूर्व प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार के रूप में कार्य कर चुके हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय में आपका क्या अनुभव रहा?

वर्ष 1998 में लंदन से जब वापिस आया तो प्रधानमंत्री कार्यालय में काम करने का मौका मिला। इस दौरान अपने साथी पत्रकारों से सहयोग करने का कार्य किया। आमतौर पर पत्रकार मेज के एक तरफ और अधिकारी दूसरी तरफ होता है। यहां मैंने मेज के दूसरी तरफ का भी अनुभव किया। प्रधानमंत्री कार्यालय में रहते हुए देशभर के पत्रकारों व विश्व के कुछ पत्रकारों के साथ सरकार की ओर से वार्तालाप किया जो एक अलग अनुभव रहा।

मीडिया में कमर्शियलाइजेशन का दौर कब से आया?

वर्ष 1947 से पहले पत्रकारिता को मिशन माना जाता था, वर्ष 1947-75 तक मीडिया में प्रोफेशन का दौर था। आपातकाल के खत्म होने के बाद पत्रकारिता में गिरावट आनी शुरू हो गई थी और वर्ष 1991 से उदारीकरण के कारण मीडिया में कमर्शियलाइजेशन का दौर आया। लेकिन पेड न्यूज के दौर में पत्रकारिता के लिए कमर्शियल शब्द भी छोटा पड़ रहा है।

वर्तमान समय में पत्रकारिता जगत में आप क्या बदलाव देखते हैं?

वर्तमान दौर में सौदेबाजी की पत्रकारिता हो रही है। यदि किसी को मीडिया द्वारा कवरेज करवानी है तो उसका मूल्य पहले से ही निर्धारित होता है। कमर्शियल में समाचार पेड नहीं होता, विज्ञापन के जरिए पैसा कमाया जाता है लेकिन अब पत्रकारिता में डील हो रही है। जो लोग इसको कर रहे है वह इसे व्यावसायिक पत्रकारिता मानते हैं। पत्रकारिता में 10 साल पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। हालांकि पूरा पत्रकारिता जगत ही खराब है, मैं ऐसा नहीं मानता। पत्रकारिता में कुछ असामाजिक तत्वों के कारण पूरे पत्रकारिता जगत पर आक्षेप लगाना सही नहीं है।

वर्तमान समय में जहां चौथे स्तम्भ की भूमिका पर सवालिया निशान खड़े किए जा रहें हैं, ऐसी दशा में क्या आपको लगता है कि इसमें कोई सुधार हो सकता है?

पत्रकारिता के स्तर में गिरावट जरूर आई है। यदि कोई बहुराष्ट्रीय कम्पनी अगर अपना उत्पाद बाजार में लेकर आती है तो उसे मीडिया के माध्यम से समाचार के रूप में प्रस्तुत करवाती है। राजनैतिक दलों द्वारा भी चुनाव के समय मीडिया से डील किया जाता है और संवाददाता के जरिए उम्मीदवार का प्रचार कराया जाता है। पत्रकारिता को बचाने वाले अब कम ही लोग रह गए हैं और अन्य धक्का देकर निकल रहे हैं, लेकिन मीडिया में अब भी कई लोग ईमानदारी से काम कर रहे हैं। पत्रकारिता में अभी स्थिति वहां तक नहीं पहुंची कि कुछ सुधार नहीं किया जा सकता। अच्छी पत्रकारिता आवाज बनकर उठेगी। भारतीय समाज की खूबी है कि यहां कोई भी विकृति अपनी चरम सीमा पर नहीं पहुंचती, उसे रास्ते में ही सुधार दिया जाता है। पत्रकारिता में अब तक जो भी निराशाजनक स्थिति सामने आई है वह अवश्य चिंता की बात है। लेकिन जब सीमा पार होने लगती है तो कोई न कोई उसे अवश्य रोकता है। भारत में पत्रकारिता का भविष्य उज्जवल है।

हाल ही में हुए जन आन्दोलन पर मीडिया कवरेज का क्या रूख रहा?

इलेक्ट्रानिक मीडिया घटना आधारित मीडिया है। घटना यदि होगी तो लोग उसे देखेंगे और इससे चैनल की टीआरपी बढ़ेगी। कुछ लोगों का आरोप है कि मीडिया खुद घटना बनाता है जो काफी हद तक ठीक भी है। प्रिंस जब गड्ढे में गिरा तो उसे तीन दिन तक दिखाया गया जिसके कारण अन्य महत्वपूर्ण खबरें छूट गई। वहीं अन्ना के आंदोलन को भी मीडिया ने पूरे-पूरे दिन की कवरेज दी जो कुछ हद तक सही था क्योंकि आम जनता टेलीविजन के माध्यम से ही इस आन्दोलन से जुड़ी। मीडिया के प्रभाव के कारण यह आन्दोलन सफल हो पाया। हालांकि सरकार ने इस दौरान मीडिया की आलोचना की क्योंकि यह कवरेज उनके पक्ष में नहीं था। मीडिया की कवरेज का ही नतीजा था कि लोगों ने इस आन्दोलन के जरिए अपनी भड़ास निकाली। यदि ऐसा नहीं होता तो इसका परिणाम हानिकारक होता। मीडिया के माध्यम से ही विदेशों में भी लोगों ने इस आन्दोलन को देखा। चीन ने तो चिंता भी व्यक्त की कि भारत का मीडिया चीन के मीडिया को बिगाड़ रहा है। भारत का मीडिया स्वतन्त्र रूप से कार्य करता है। जब मैं प्रधानमंत्री कार्यालय में कार्यरत था तो गर्व महसूस किया कि विदेशों में भारतीय लोकतन्त्र की सराहना की जाती है। वह भारत की न्यायिक स्वतन्त्रता और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के कारण भारत के मीडिया को जीवन्त मीडिया की संज्ञा देते हैं।

विश्व की चार सबसे बड़ी समाचार समितियां विदेशी ही है। क्या आपको लगता है कि उनका प्रभाव भारतीय मीडिया पर भी है?

यह चारों समाचार समितियां बहुराष्ट्रीय हैं और इनका मानना है कि यह स्वतन्त्र पत्रकारिता कर रही हैं लेकिन यह समाचार समिति भी किसी देश की ही है और इनके लिए देश का हित सर्वोपरि होता है। यहां राष्ट्रहित व निजी हित विरोधाभासी है। ए.पी. अमेरिका की प्रतिष्ठित समाचार समिति है। इसे सबसे पहले प्रिंट के लिए शुरू किया गया और 180 देशों में फैलाया गया। इसके पीछे उद्देश्य था कि पूरी दुनिया सूचना के तंत्र को अमेरिका के नजरिए से देखे। चीन भी आर्थिक महाशक्ति बनने के साथ अपनी समाचार समिति शिन्हुआ को विश्व में फैला रहा है। वहीं दूसरी ओर भारत आर्थिक महाशक्ति के रूप में तो उभर रहा है लेकिन दुर्भाग्यवश सूचना के क्षेत्र में हम काफी पीछे हैं। सूचना के क्षेत्र में हम पहले की अपेक्षा सिकुड़ रहे हैं। प्रसार भारती, आकाशवाणी व दूरदर्शन पहले से सिकुड़ गए हैं। भारतीय समाचार समितियों की भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। हमारे देश में न तो सरकारी मीडिया का विकास हुआ और न ही समाचार समितियों को विस्तृत होने दिया गया। भारत में स्थित शिन्हुआ के ब्यूरो में 60 व्यक्ति रायटर्स के ब्यूरो में 250 व्यक्ति व एपी के ब्यूरो में 350 व्यक्ति कार्यरत है। यह समाचार समितियां भारत को विश्व में अपने चश्मे से प्रस्तुत कर रही हैं। जिस तरह भारत के फिल्म उद्योग ने विश्व में अपनी पहचान बनाई है, उसी तरह हमें सूचना के क्षेत्र में भी आगे बढ़ना चाहिए था लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो सका।

पाशचात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण आज अंग्रेजी भाषा का जो प्रचलन बढ़ा है, ऐसे में हिन्दी पत्रकारिता को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?

हिन्दी पत्रकारिता की हम जब भी चर्चा करते हैं तो हम उसको अंग्रेजी के सामने लाकर खड़ा कर देते हैं जो गलत है। हिन्दी अंग्रेजी की प्रतिस्पर्धी भाषा नहीं है। भारतीय पत्रकारिता ने अंग्रेजी भाषा को कभी भी अपना प्रतिस्पर्धी नहीं माना लेकिन जब भी हिन्दी पत्रकारिता को बढ़ाने की बात की गई तो हमने कह दिया कि अंग्रेजी के कारण ऐसा नहीं हो रहा। पिछले 10 सालों में हिन्दी पत्रकारिता का विस्तार हुआ है। मैं नहीं मानता कि अंग्रेजी के कारण हिन्दी पत्रकारिता को नुकसान पहुंचा है। शिक्षा में बढ़ोतरी के साथ हिन्दी के स्तर में भी वृद्धि हुई है। आज हिन्दी भाषी समाचार चैनलों की संख्या अंग्रेजी भाषी चैनलों से कहीं अधिक है। भारत में अंग्रेजी भाषा वर्ष 1947 से पहले ब्रिटिष शासन की देन है। अमेरिका के महाशक्ति बनने के कारण आज अंग्रेजी वैश्विक भाषा बन गई है। जिन देशों को अंग्रेजी नहीं आती थी, वह अंग्रेजी सीख रहे हैं। भारत को अंग्रेजी का लाभ वर्तमान समय में मिल रहा है।

नेहा जैन, सितम्बर अंक २०११

पत्रकारिता के प्रकाशपुंज बाबूराव विष्णु पराड़कर

भारत में पत्रकारिता का उद्भव पुनर्जागरण और समाज कल्याण के उद्देश्य से हुआ था। महात्मा गांधी, बाबूराव विष्णु पराड़कर, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, महर्षि अरविंद आदि युगपुरूष पत्रकारिता की इसी परंपरा के प्रस्थापक थे, जिसने पत्रकारिता को देशहित में कार्य करने के लिए लक्ष्य और प्रेरणा दी। पत्रकारिता में उनके आदर्श ही पत्रकारों की वर्तमान पीढ़ी के लिए दिशा-निर्देश के समान हैं, जिन पर चलकर पत्रकारों की वर्तमान पीढ़ी अपनी इस अमूल्य विधा के साथ न्याय कर सकती है। पत्रकारिता की अमूल्य विधा वर्तमान समय में अपने संक्रमण काल के दौर से गुजर रही है। दरअसल पत्रकारिता में यह संक्रमण उन आशंकाओं का अवतरण है, जिसकी आशंका पत्रकारिता के युगपुरूषों ने बहुत पहले ही व्यक्त की थी। संपादकाचार्य बाबूराव विष्णुराव पराड़कर ने भविष्य में पत्रकारिता में बाजारवाद, नैतिकता के अभाव और पत्रकारों की स्वतंत्रता के बारे में कहा था-

पत्र निकालकर सफलतापूर्वक चलाना बड़े-बड़े धनियों अथवा सुसंगठित कंपनियों के लिए ही संभव होगा। पत्र सर्वांग सुंदर होंगे। आकार बड़े होंगे, छपाई अच्छी होगी, मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्द्धक चित्रों से सुसज्जित होंगे, लेखों में विविधता होगी, कल्पकता होगी, गंभीर गवेषणा की झलक होगी, ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जाएगी। यह सब कुछ होगा पर पत्र प्राणहीन होंगे। पत्रों की नीति देशभक्त, धर्मभक्त अथवा मानवता के उपासक महाप्राण संपादकों की नीति न होगी- इन गुणों से सम्पन्न लेखक विकृत मस्तिष्क समझे जाएंगे, संपादक की कुर्सी तक उनकी पहुंच भी न होगी। वेतनभोगी संपादक मालिक का काम करेंगे और बड़ी खूबी के साथ करेंगे। वे हम लोगों से अच्छे होंगे। पर आज भी हमें जो स्वतंत्रता प्राप्त है वह उन्हें न होगी। वस्तुतः पत्रों के जीवन में यही समय बहुमूल्य है। (संपादक पराड़कर में उद्धृत)

पराड़कर जी का यह कथन वर्तमान दौर की पत्रकारिता में चरितार्थ होने लगा हैं, जब पत्रकारों की कलम की स्याही फीकी पड़ने लगी है और समाज हित जैसी बातें बेमानी होने लगी हैं। इसका कारण पत्रकार नहीं बल्कि वे मीडिया मुगल हैं जो मीडिया के कारोबारी होते हैं। पत्रकारिता पर पूंजीपतियों के दखल और उसके दुष्प्रभावों के बारे में पराड़कर जी ने कहा था-

पत्र निकालने का व्यय इतना बढ़ गया है कि लेखक केवल अपने ही भरोसे इसमें सेवा प्राप्त नहीं कर सकता। धनियों का सहयोग अनिवार्य हो गया है। दस जगह से धन संग्रह कर आप कंपनी बनाएं अथवा एक ही पूंजीपति पत्र निकाल दे, संपादक की स्वतंत्रता पर दोनों का परिणाम प्रायः एक सा ही होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि पत्रों की उन्नति के साथ-साथ पत्रों पर धनियों का प्रभाव अधिकाधिक परिमाण में अवश्य पड़ेगा।‘(इतिहास निर्माता पत्रकार, डा. अर्जुन तिवारी)

बाजार के बढ़ते प्रभाव के कारण समाचारपत्र के स्वरूप और समाचारों के प्रस्तुतिकरण में आ रहे बदलावों के बारे में पराड़कर जी ने कहा था-

पत्र बेचने के लाभ से अश्लील समाचारों को महत्व देकर तथा दुराचरण मूलक अपराधों का चित्ताकर्षक वर्णन कर हम परमात्मा की दृष्टि में अपराधियों से भी बड़े अपराधी ठहर रहे हैं, इस बात को कभी न भूलना चाहिए। अपराधी एकाध अत्याचार करके दण्ड पाता है और हम सारे समाज की रूचि बिगाड़ कर आदर पाना चाहते हैं। (प्रथम संपादक सम्मेलन 1925 के वृंदावन हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्षीय वक्तव्य से)

पराड़कर जी का यह कथन वर्तमान समय में और भी प्रासंगिक लगता है, जब खबर के बाजार में मीडिया मुगल अश्लील खबरों के माध्यम से बाजार पर हावी होने के प्रयास में रहते हैं। पत्रकार को देश के समसामयिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक और विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों के बारे में जानकारी अवश्य होनी चाहिए। तभी वह अपने उद्देश्य में सफल हो सकता है। इसका वर्णन करते हुए पराड़कर जी ने कहा था –

मेरे मत से संपादक में साहित्य और भाषा ज्ञान के अतिरिक्त भारत के इतिहास का सूक्ष्म और संसार के इतिहास का साधारण ज्ञान तथा समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र और अंतर्राष्ट्रीय विधानों का साधारण ज्ञान होना आवश्यक है। अर्थशास्त्र का वह पण्डित न हो पर कम से कम भारतीय और प्रान्तीय बजट समझने की योग्यता उसमें अवश्य होनी चाहिए।‘(इतिहास निर्माता पत्रकार, अर्जुन तिवारी)

अभी हाल ही में प्रधानमंत्री ने टिप्पणी की थी कि मीडिया अब जज की भूमिका अदा करने लगा है,‘यह कुछ अर्थों में सही भी है। पत्रकारों पर राजनीति का कलेवर हावी होने लगा है, पत्रकारिता के राजनीतिकरण पर टिप्पणी करते हुए पराड़कर जी ने कहा था-

आज का पत्रकार राजनीति और राजसत्ता का अनुकूल्य उपलब्ध करने के लिए उनके मुहावरे में बोलने लगा है। उपभोक्ता संस्कृति के अभिशाप को लक्ष्य कर राजनेताओं की तरह आवाज टेरने वाले पत्रकार स्वयं व्यावसायिक चाकचिक्य के प्रति सतृष्ण हो गए हैं और उपभोक्ता संस्कृति ही इनकी संस्कृति बनती जा रही है।  (पत्रकारिता इतिहास और प्रश्न, कृष्णबिहारी मिश्र)

संपादकाचार्य पराड़कर जी की पत्रकारिता का लक्ष्य पूर्णतः स्वतंत्रता प्राप्ति के ध्येय को समर्पित था। पराड़कर जी ने अपने उद्देश्य की घोषणा इन शब्दों में की थी-

शब्दों में सामर्थ्य का भरें नया अंदाज।

बहरे कानों को छुए अब अपनी आवाज।

5 सितंबर, 1920 को आज की संपादकीय टिप्पणी में अपनी नीतियों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा था-

हमारा उद्देश्य अपने देश के लिए सर्व प्रकार से स्वातंत्र्य उपार्जन है। हम हर बात में स्वतंत्र होना चाहते हैं। हमारा लक्ष्य है कि हम अपने देश के गौरव को बढ़ावें, अपने देशवासियों में स्वाभिमान संचार करें।

पराड़कर जी की पत्रकारिता पूर्णतः ध्येय समर्पित पत्रकारिता थी, जिसका वर्तमान पत्रकार पीढ़ी में सर्वथा अभाव दिखता है। बाबूराव विष्णु पराड़कर पत्रकारिता जगत के लिए सदैव स्मरणीय आदर्श पत्रकार हैं। पत्रकारिता के सही मूल्यों को चरितार्थ करने वाले बाबूराव विष्णु पराड़कर जी की पत्रकारिता के पदचिन्ह वर्तमान पत्रकार पीढ़ी के लिए पथप्रदर्शक के समान हैं।

सूर्यप्रकाश, सितम्बर अंक २०११

मदारी से मुद्दई बनता मीडिया

कांस्टीट्यूशन क्लब में मीडिया पर आयोजित एक संगोष्ठी में उपस्थित श्रोताओं की आलोचना से खीझकर आजतक के सम्पादक कमर वाहिद नकवी ने खुले मंच से कहा था कि-

मीडिया अब मदारी बन गया है। एक ऐसा मदारी जो तरह-तरह के तमाशे दिखाकर लोगों का मनोरंजन करता है, लेकिन व्यक्ति और समाज के अस्तित्व को चुनौती देने वाली मूल समस्याओं पर ध्यान देने की फुर्सत उसके पास नहीं है और न ही इन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने में उसकी कोई सहभागिता है।

कमर वाहिद नकवी का यह कथन प्रसिद्ध मीडिया विश्लेषक नोम चोमस्की की मीडिया को बाजारु खिलौना बनने के संदर्भ में की गयी टिप्पणी से मेल खाता है। चोमस्की कहते हैं कि –

अपने दर्शकों को बाजार के हाथों उपभोक्ता के रूप में बेचना अब मीडिया का प्राथमिक कार्य हो गया है।

इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक में भारतीय मीडिया विशेषकर इलेक्ट्रानिक मीडिया जिस दिशा में अग्रसर होने की कोशिश कर रहा था, खबरों के चयन और प्रस्तुतीकरण के जिस तरीके को अपनाया जा रहा था, उस पर दृष्टिपात करें तो उपरोक्त दोनों टिप्पणियां एक हद तक सही प्रतीत होती हैं। श्मशान पर किए जाने वाले विभिन्न तांत्रिक प्रयोगों और कापालिक क्रियाओं का प्रसारण एक्सक्लूसिव खबर के रूप में हमारे खबरिया चैनल कर रहे थे। कोई बकरा शराब क्यों पी रहा है, स्वर्ग के लिए सीढि़यां कहां से निकलती हैं, जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों को लेकर हमारे खबरिया चैनल कई दिनों तक माथापच्ची करते रहे।

राजू श्रीवास्तव के भद्दे चुटकुले और राहुल महाजन की अश्लील हरकतें मुख्य समाचार हुआ करते थे। किसी विशेष धारावाहिक के अगले एपीसोड में सास-बहू का रिश्ता किस मोड़ पर पहुंचेगा, इसका कयास भी खबरिया चैनल लगाते थे। समलैंगिकता जैसे गम्भीर मुद्दों पर विशेषज्ञों की राय जानने के लिए समाजशास्त्रियों की बजाय सेलिना जेटली जैसे सेलेब्रिटीज को आमंत्रित किया जाता था। इन महत्वपूर्ण खबरों के बीच यदि कोई रामसेतु आंदोलन हो जाता, तो पूरे देश में चक्काजाम होने तक उसके कवरेज की जरूरत नहीं समझी जाती थी। विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा जैसी छोटी-मोटी घटनाएं सामाजिक मुद्दों पर गहरी नजर और पैनी दृष्टि रखने का दावा करने वाले पत्रकारों की पकड़ में नहीं आती थीं, जबकि इस यात्रा के जरिए साढे़ आठ करोड़ भारतीयों ने हस्ताक्षर कर गोसंरक्षण और गोसंवर्धन के लिए राष्ट्रपति से गुहार लगायी थी। गो ग्राम यात्रा को मिला जनसमर्थन उस मतसंख्या के लगभग बराबर है, जिसको प्राप्त कर कोई राजनीतिक दल केन्द्र में सत्तारुढ़ हो सकता है। मीडिया के तृणमूल तथ्यों के प्रति अज्ञानता के अध्ययन के लिए विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा को केस स्टडी, के लिए चुना जा सकता है। वास्तव में इस दौर का मीडिया मदारी नहीं मदारी का बंदर बन गया था ।

यह सब कुछ अनवरत रूप से चल रहा था। इसी बीच कालेधन के मुद्दे को लेकर योगऋषि स्वामी रामदेव और जनलोकपाल बनाने को लेकर अन्ना हजारे मीडिया में अवतरित होते हैं। सम्पूर्ण मीडिया में इन दोनों व्यक्तियों और इनके द्वारा उठाए गए मुद्दों के प्रति दीवानगी देखने को मिलती है। प्रोटोजोआ प्रजाति के भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्डेटा प्रजाति के स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे के मैदान में उतरने की घटना न केवल भारतीय जनता को प्रेरित करती है बल्कि जनता को सम्मोहित करने वाली मीडिया को भी सम्मोहित करती है। मीडिया में आम आदमी से जुडे़ इन मुद्दों और इन मुद्दों को उठाने वाली आवाजों को पर्याप्त समय और स्थान मिलता है। साथ ही, इस मुद्दे के सतत कवरेज को लेकर मीडिया में एक सर्वसम्मति भी दिखाई दी।

आम आदमी से जुडे़ किसी मुद्दे पर सर्वसम्मति बनना भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया के इतिहास की एक दुर्लभतम घटना है। कभी किसी मुद्दे पर बनी भी तो वह दो चार दिनों में बिखर गयी। भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया का व्यवस्था विरोध भी एक दायरे में होता रहा है। मुद्दों के आधार पर व्यवस्था को खुली चुनौती देने की प्रवृति भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया में अभी तक नदारद रही है। व्यवस्था द्वारा निर्धारित दायरे में ही व्यवस्था का विरोध यह माध्यम करता रहा है।

दूसरे शब्दों में कहें तो इलेक्ट्रानिक मीडिया में मुद्दों को लेकर की जाने वाली मुद्दई पत्रकारिता नहीं की जाती थी। इस पड़ाव पर मुद्दई शब्द के संदर्भ में एक तथ्य स्मरण कराते चलें कि जब कोई व्यक्ति अथवा संस्था मुद्दों के आधार पर जीवनयापन की कोशिश करता है तो शोषणकारी व्यवस्था और व्यक्तियों से उसका टकराव स्वाभाविक हो जाता है। शायद इसीलिए न्यायालय में चलने वाले मुकदमों में प्रतिपक्ष को मुद्दई और समाज में अपने दुश्मन को भी मुद्दई कहा जाता है।

स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे के संदर्भ मे पहली बार इलेक्ट्रानिक मीडिया में न केवल एक सर्वसम्मति बनी बल्कि यह लम्बे समय तक चली भी। विशेषकर अन्ना हजारे के 16 अगस्त से प्रारम्भ होने वाले अनशन के संदर्भ में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने जिस अभूतपूर्व एकजुटता का परिचय दिया और जिस तरह व्यवस्था विरोध की व्यवस्था द्वारा निर्धारित पारंपरिक चैखटों को धराशायी किया, उससे इलेक्ट्रानिक मीडिया के बेहतर भविष्य से एक आस बंधी है।

हम जानते हैं कि भारतीय पत्रकारिता आनुवांशिक रूप से व्यवस्था विरोधी रही है। स्वतंत्रता पूर्व की पत्रकारिता अपने तेवरदार और व्यवस्था विरोधी रवैये के लिए जानी जाती है। स्वतंत्रता के पश्चात भी ऐसे कई मौके आए जब प्रिंट मीडिया ने अद्भुत एकजुटता का प्रदर्षन किया और व्यवस्था के खिलाफ जाकर मुद्दों को उभारने का प्रयास किया। प्रिंट मीडिया के इस मुद्दई रवैये के कारण ही व्यवस्था को कई बार शीर्षासन करना पड़ा। अन्ना के अनशन को लेकर भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया पहली बार उस मोड में दिखी जिसकी उससे अपेक्षा की जाती रही है।

इलेक्ट्रानिक मीडिया का यह व्यवस्था विरोधी न्यू मोड न केवल आम जनता के लिए बल्कि खुद उसके स्वास्थ्य के लिए भी लाभप्रद है। ऊल-जलूल कार्यक्रमों के प्रसारण से पैदा हुए विश्वसनीयता के संकट ने खुद मीडिया की प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर दिया था। शायद इसी कारण नेता-अभिनेता भी बीच बहस में रुककर मीडिया को आईना दिखा देते थे। आजतक पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम सीधी बात में एक बार अभिनेता शाहरुख खान ने प्रभु चावला को लगभग डांटते हुए कहा था कि-

आप लोग जिस तरह अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए ऊल-जलूल कार्यक्रम दिखाते हैं, ठीक उसी तरह हम भी फिल्म को सफल बनाने के लिए कई स्टंट करते हैं। हम और आप दोनों पैसा कमाने के लिए यह सब करते हैं। फिर आपको नैतिक प्रश्न पूछने का क्या अधिकार है।

इसी तरह उदयन शर्मा की पुण्यतिथि पर आयोजित एक कार्यक्रम में कपिल सिब्बल ने मीडिया की क्षमताओं पर कई सवाल खडे़ कर दिए थे। यह बात 2009 के चुनावों के तुरंत बाद की है। ऐसा नहीं था कि इलेक्ट्रानिक मीडिया का प्रभाव क्षीण हो गया था बल्कि वह इतना विखंडित था कि अनेक सटीक मुद्दों पर भी उसका स्वर मास मोबलाईजेशन की परिघटना को जन्म नहीं दे पाता था। जब सभी चैनलों ने एक स्वर में अन्ना के अनशन से जुड़े मुद्दों को उठाया और लगभग 12 दिनों तक उसकी सतत कवरेज की, तब जाकर सत्ताधारियों को इलेक्ट्रानिक मीडिया की ताकत का अंदाजा लगा। सूचना एवं प्रसारण मंत्री ने चैनलों से सभी पक्षों को दिखलाने का आग्रह किया तो दूसरी तरफ कुछ सरकारी प्रवक्ताओं ने अन्ना की आंधी को मीडिया मैनेज्ड, कहकर मीडिया की ताकत को अनिच्छापूर्वक स्वीकार किया।

इस पूरे प्रकरण से यह भी स्पष्ट हुआ है कि मीडिया की असली ताकत आम जनता ही है। आम जनता की आवाज को प्रतिध्वनित कर इलेक्ट्रानिक मीडिया अपने व्यावसायिक हितों और सामाजिक प्रतिबद्धता को एक साथ साध सकती है। आवश्चकता केवल इस बात की है कि अन्ना के अनशन के समय उभरी मुद्दई प्रवृति समय-समय पर मुखरित होती रहे। मुद्दई प्रवृत्ति को अपवाद की बजाय स्थायी भाव बनाकर ही मीडिया भारत की पहचान और अपनी भूमिका को  बेहतर ढंग से परिभाषित और पोषित कर सकती है।

जयप्रकाश सिंह, सितम्बर अंक, २०११

 

पूंजी प्रवाह के आगे नतमस्तक पत्रकारिता

लोकतंत्र में पत्रकारिता ही एक ऐसा पेशा है जिसे सामाजिक सरोकारों का सच्चा पहरूआ कह सकते हैं क्योंकि पत्रकारिता का लक्ष्य सच का अन्वेषण है। सामाजिक शुचिता के लिए सच का अन्वेषण जरूरी है। सच भी ऐसा कि जो समाज में बेहतरी की बयार को निर्विरोध बहाये जिसके तले हर मनुष्य खुद को संतुष्ट समझे।

पत्रकारिता का उद्भव ही मदांध व्यवस्था पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से हुआ था लेकिन आज की वर्तमान स्थिति में यह बातें बेमानी ही नजर आ रहीं हैं। खुद को आगे पहुंचाने और लोगों की भीड़ से अलग दिखने की चाह में जो भी अनर्गल चीज छापी या परोसी जा सकती हैं, सभी किया जा रहा है। अगर आज की पत्रकारिता को मिशन का चश्मा उतार कर देखा जाये तो स्पष्ट ह¨ता है कि मीडिया समाचारों के स्थान पर सस्ती लोकप्रियता के लिए चटपटी खबरों को प्राथमिकता दे रही है।

एक दौर हुआ करता था जब पत्रकारिता को निष्पक्ष एवं पत्रकारों को श्रद्धा के रूप में देखा जाता था। जो समाज के बेसहारों का सहारा बन उनकी आवाज को कुम्भकर्णी नींद में सोए हुक्मरानों तक पहुंचाने का माद्दा रखती थी। उस दौर के पत्रकार की कल्पना दीन-ईमान के ताकत पर सत्तामद में चूर प्रतिष्ठानों की चूलें हिलाने वाले क्रांतिकारी फकीर के रूप में होती थी। यह बात अब बीते दौर की कहानी बन कर रह गयी है। आज की पत्रकारिता के सरोकार बदल गये हैं और वह भौतिकवादी समाज में चेरी की भूमिका में तब्दील हो गयी है। जिसका काम लोगों के स्वाद को और मजेदार बनाते हुए उनके मन को तरावट पहुंचाना है। देश के सामाजिक चरित्र के अर्थ प्रधान होने का प्रभाव मीडिया पर भी पड़ा है और आज मीडिया उसी अर्थ लोलुपता की ओर अग्रसर है, या यूं कहिए की द्रुत गति से भाग रही है। इस दौड़ में पत्रकारिता ने अपने चरित्र को इस कदर बदला है कि अब समझ ही नहीं आता कि मीडिया सच की खबरें बनाती है या फिर खबरों में सच का छलावा करती है, लेकिन जो भी हो यह किसी भी दशा में निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं है।

पत्रकारिता का मूल उद्देश्य है सूचना, ज्ञान और मनोरंजन प्रदान करना। किसी समाचार पत्र को जीवित रखने के लिए उसमें प्राण होना आवश्यक है। पत्र का प्राण होता है समाचार, लेकिन बढ़ते बाजारवाद और आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण विज्ञापन इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि पत्रकारिता का वास्तविक स्वरूप ही बदल गया है। राष्ट्रीय स्तर के समाचारों के लिए सुरक्षित पत्रों के प्रथम पृष्ठ पर भी अर्द्धनग्न चित्र विज्ञापनों के साथ प्रमुखता से प्रकाशित हो रहे हैं। समाचार पत्रों का सम्पादकीय जो समाज के बौद्धिक वर्ग क¨ उद्वेलित करता था, जिनसे जनमानस भी प्रभावित होता था, उसका प्रयोग आज अपने प्रतिद्वन्द्वी को नीचा दिखाने के लिए किया जा रहा है। इससे पत्रकारिता के गिरते स्तर और उसकी दिशा को लेकर अनेक सवाल खडे़ हो गये हैं। फिल्म अभिनेत्रियों की शादी और रोमांस के सम्मुख आम महिलाओं की मौलिक समस्याएं, उनके रोजगार, स्वास्थ्य उनके ऊपर होने वाले अत्याचारों से संबंधित समाचार स्पष्ट रूप से नहीं आ पा रहें हैं। यदि होता भी है तो बेमन, केवल दिखाने के लिए।

पत्रकारिता के इतिहास पर नजर डाले तो समझ आता है कि भारत में पत्रकारिता अमीरों के मनोरंजन के साधन के रूप में विकसित होने की बजाय स्वतंत्रता संग्राम के एक साधन के रूप में विकसित हुई थी। इसलिए जब सन् 1920 के दशक में यूरोप में पत्रकारिता की सामाजिक भूमिका पर बहस शुरू हो रही थी, भारतीय पत्रकारिता ने प्रौढ़ता प्राप्त की। सन् 1827 में राजा राममोहन राय ने पत्रकारिता के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लिखा था- ‘मेरा उद्देश्य मात्र इतना है कि जनता के सामने ऐसे बौद्धिक निबंध उपस्थित करूं जो उनके अनुभव को बढ़ाएं और सामाजिक प्रगति में सहायक सिद्ध हो। मैं अपने शक्तिशाली शासकों को उनकी प्रजा की परिस्थितियों का सही परिचय देना चाहता हूं और प्रजा को उनके शासकों द्वारा स्थापित विधि व्यवस्था से परिचित कराना चाहता हूं ताकि जनता को शासन अधिकाधिक सुविधा दे सके। जनता उन उपायों से अवगत हो सके जिनके द्वारा शासकों से सुरक्षा पाई जा सके और अपनी उचित मांगें पूरी कराई जा सके। वर्तमान में राजा रामम¨हन राय की यह बातें केवल शब्द मात्र हैं जिन पर चलने में किसी भी पत्रकार की कोई रूचि नहीं है। आखिर उसे भी समाज में अपनी ऊंचाईयों को छूना है। आज के समय में मीडिया अर्थात् पत्रकारिता से जुड़े लोगों का लक्ष्य सामाजिक सरोकार न होकर आर्थिक सरोकार हो गया है। वैसे भी व्यवसायिक दौर में सामाजिक सरोकार की बातें अपने आप में ही बेमानी हैं। सरोकार के नाम पर अगर कहीं किसी कोने में पत्रकारिता के अंतर्गत कुछ हो भी रहा है तो वो भी केवल पत्रकारिता के पेशे की रस्म अदायगी भर है।

पत्रकारिता के पतित पावनी कार्यनिष्ठा से सत्य, सरोकार और निष्पक्षता के विलुप्त होने के पीछे वैश्वीकरण की भूमिका भी कम नहीं है। सभी समाचार-पत्र अन्तर्राष्ट्रीय अर राष्ट्रीय समाचारों के बीच झूलने लगे हैं। विदेशी पत्रकारिता की नकल पर आज अधिकांश पत्र सनसनी तथा उत्तेजना पैदा करने वाले समाचारों को सचित्र छापने की दौड़ में जुटे हैं। इन्टरनेट से संकलित समाचार कच्चे माल के रूप में जहां इन्हें सहजता से उपलब्ध हो रहे हैं, वहीं प्रौद्योगिकी का उपयोग कर अपने पत्रों को क्षेत्रीय रूप दे रहे हैं, जिसके कारण पत्रकारिता का सार्वभौमिक स्वर ही विलीन होने लगा है। ऐसी पत्र-पत्रिकाएं व टेलीविजन चैनल जो गे डे यानी कि समलैंगिकता दिवस मनाते हैं संस्कृति की रक्षा की बातों को मोरल पोलिसिंग कहकर बदनाम करने की कोशिशें करते हैं, भारतीय परंपरराओं और जीवन मूल्यों का मजाक उड़ाते हैं, खुलकर अश्लीलता, वासनायुक्त जीवन और अमर्यादित आचरणों का समर्थन करते हैं और कहते हैं कि यह सब वे पब्लिक डिमांड यानी कि जनता की मांग पर कर रहे हैं। परन्तु वास्तविकता यही है कि बाजारवाद से लाभान्वित होने के प्रयास में दूसरों पर दोषारोपण करके स्वयं को मुक्त नहीं किया जा सकता।

आज यदि महात्मा गांधी, राजा राममोहन राय, बाबू राव विष्णु पराड़कर या माखनलाल चतुर्वेदी जीवित होते तो क्या वे इसे सहन कर पाते, क्या उन जैसे पत्रकारों की विरासत को आज के पत्रकार ठीक से स्मरण भी कर पा रहे हैं\ क्या आज के पत्रकारों में उनकी उस समृद्ध विरासत को संभालने की क्षमता है\ ये प्रश्न ऐसे हैं जिनके उत्तर आज की भारतीय पत्रकारिता को तलाशने की जरूरत है, अन्यथा न तो वह पत्रकारिता ही रह जाएगी और न ही उसमें भारतीय कहलाने लायक कुछ होगा। इसके अलावा पत्रकारिता के लिए बड़ा खतरा गलत दिशा में बढ़ा कदम है, जिसके लिए बाजारवादी आकर्षण से मुक्त होकर पुनः स्थापित परंपरा का अनुसरण करना ही होगा, तभी पत्रकारिता की विश्वसनीयता बढ़ेगी। मीडिया संस्थानों और पत्रकारों को पीत पत्रकारिता एवं सत्ताभोगी नेताओं के प्रशस्ति गान के बजाय जनमानस के दुःख दर्द का निवारण, समाज एवं राष्ट्र के उन्नयन के लिए निःस्वार्थ भाव से कर्तव्य-पालन करना होगा, तभी वह लोकतंत्र में चौथे स्तंभ का अस्तित्व बनाये रखने में सफल हो सकेंगे।

आकाश राय, अगस्त अंक 2011

दिल्ली की साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं: स्वाधीनता के बाद

साहित्य और पत्रकारिता दोनों ही समाज के संवेदनशील सदस्य होने के नाते इसके प्रतिरूप को बिम्बित करने का प्रयास करते हैं। वस्तुतः दोनों ही समाज के दर्पण है- अन्तर है तो केवल शैली का। पत्रकार और साहित्यकार दोनों ही समाज के महत्वपूर्ण प्रश्नों एवं विषयों पर अपनी लेखनी चलाते हैं। इस दृष्टि से साहित्य तथा पत्रकारिता दोनों एक-दूसरे के सहयोगी अथवा पूरक माने जा सकते हैं। पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण कार्य तथ्यों एवं विचारों को प्रकाशित करना है और साहित्य का भावों तथा विचारों को अभिव्यक्ति देना। साहित्य को विस्तार देने का कार्य भी पत्रकारिता द्वारा किया जाता है और साहित्यिक पत्रकारिता, पत्रकारिता का ही एक रूप है।

साहित्यिक पत्रकारिता की शुरूआत भारत में 19वीं सदी में हो चुकी थी। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को साहित्यिक पत्रकारिता का प्रवर्तक माना जाता है। उन्होंने वर्ष 1868 में साहित्यिक पत्रिका कवि वचन सुधा का प्रकाशन किया। भारतेन्दु जी के जन्मस्थल बनारस से उस समय छः पत्रिकाएं प्रकाशित होती थी- कविवचन सुधा, हरिश्चन्द्र-मैगजीन, बालबोधिनी, काशी समाचार व आर्यमित्र।

द्विवेदी युग (1900-1918 ई.) में कई साहित्यिक पत्रिकाएं प्रकाशित हुई। वर्ष 1900 में इलाहबाद से मासिक पत्रिका सरस्वती का प्रकाशन शुरू  हुआ। वर्ष 1903 में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के संपादन में इस पत्रिका ने नई ऊंचाइयों को छुआ। साहित्य के क्षेत्र में द्विवेदी जी ने व्याकरण एवं खड़ी बोली को एक नई दिशा प्रदान की। इस समय की अन्य पत्रिकाएं सुदर्शन, देवनागर, मनोरंजन, इन्दु समालोचक आदि थी।

छायावाद काल में चांद, माधुरी, प्रभा साहित्य, संदेश, विशाल भारत, सुधा, कल्याण, हंस, आदर्श, मौजी, समन्वय, सरोज आदि साहित्यिक पत्रिकाएं सामने आई। वर्तमान में सारिका, संचेतना, निहारिका, वीणा, प्रगतिशील समाज, युगदाह, कथासागर, सन्देश, आलोचना, सरस्वती संवाद, नया ज्ञानोदय, हंस आदि साहित्यिक पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं।

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में डा. अवधेश कुमार द्वारा दिल्ली की साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं: स्वाधीनता के बाद विषय पर वर्ष 2000 में शोध प्रस्तुत किया गया है। स्वाधीनता के पश्चात दिल्ली से आजकल, अनुवाद, अकविता, आलोचना, इन्द्रप्रस्थ भारती, समकालीन भारतीय साहित्य, गगलाचल, कृति, भाषा, साहित्य अमृत, नटरंग, संचेतना, नंदन, बाल भारती, सार-संसार, साप्ताहिक हिन्दोस्थान, हंस, कथादेश, नया प्रतीक, समीक्षा आदि.

साहित्यिक पत्रिकाएं प्रकाशित हो रहीं हैं, जिनका संक्षिप्त परिचय शोध में दिया है। शोध में उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं को संकलित करके हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता का इतिहास लिखने का विनम्र प्रयास किया है और इन पत्रिकाओं का मूल्यांकन प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही लेखक ने पत्रकारिता के विभिन्न पक्षों तथा तत्वों का भी अध्ययन-विश्लेषण शोध में करने का प्रयास किया है जो अब पुस्तक के रूप में बाजार में उपलब्ध है। साहित्य के क्षेत्र में उनके द्वारा किया गया यह कार्य बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में साहित्यिक पत्रकारिता के लेखन की आवश्यकता है।

पत्रकारिता की विधा को साहित्य का ही अंग माना जाता है, जिसके माध्यम से हमें तात्कालिक तौर पर साहित्य उपलब्ध होता है। पत्रकारिता और साहित्य का सम्मिश्रण होने पर पत्रकारिता जनसूचना ही नहीं जनशिक्षण के उद्देश्य को भी पूर्ण कर पाती है। साहित्यिक पत्रिकाओं ने भारत के राष्ट्रीय पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, यह क्रम आजादी के पश्चात 90 के दशक तक अनवरत चलता रहा। सन् 1991 में उदारीकरण की नीतियों के लागू होने के पश्चात साहित्यिक पत्रिकाएं बाजारीकरण की दौर में पिछड़ती चली गईं।

साहित्यिक पत्रिकाओं का स्थान अब उन पत्रिकाओं ने ले लिया है, जो किसी विषय पर आधारित होती हैं। इनमें प्रमुख हैं आर्थिक और राजनीतिक पत्रिकाएं। यह पत्रिकाएं बाजारीकरण की दृष्टि से ही कार्य करती हैं, लेकिन समाज का वैचारिक पोषण नहीं कर पाती। भारत में साहित्यिक पत्रिकाओं ने हिन्दी भाषा और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को नई ऊंचाईयां प्रदान की है। वर्तमान समय में जब पत्रकारिता अपने नैतिक मूल्यों और उद्देष्यों से अलग हट रही है, ऐसे में साहित्यिक पत्रिकाओं की आवश्यकता जान पड़ती है।

डा. अवधेश कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय, पीएचडी, सन्-2000

अगस्त अंक, २०११

 

मिशन से प्रोफेशन तक का सफर

आजादी से पहले पत्रकारिता मिशन के रूप में थी। गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबू राव विष्णु पराड़कर, महात्मा गांधी, जुगल किशोर जैसे पत्रकारों ने अंग्रेजों की यातनाएं सहने के बावजूद भी अपने कलम की धार को पैना बनाए रखा और देश की आजादी में अपना सम्पूर्ण योगदान दिया। आजादी के बाद पत्रकारिता का व्यावसायीकरण होने के आरोप लगते रहे हैं। कहा जाता है कि आज पत्रकारिता मिशन न होकर केवल अपने निजी हितों की पूर्ति कर रहा है। आधुनिक भारतीय पत्रकारिता ने स्वतंत्रता संघर्ष की विरासत से स्वयं को डी लिंक कर लिया है। आप इससे कहां तक सहमत हैं ?

मेरे विचारों में आज की पत्रकारिता निश्चित रूप से व्यवसायीकरण के झूले में झूल रही है। पत्रकारिता को जिन लोगों ने उज्ज्वल बनाया वे समझौतावादी नहीं थे। उस दौर के हमारे सामने गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबू राव विष्णु पराड़कर, लाला लाजपत राय आदि उदाहरण हैं, जो पत्रकारिता समाज सेवा के लिए किया करते थे। उस दौर के उदाहरण तो हमें याद हैं लेकिन आज के दौर में हम ऐसे कितने ईमानदार लोगों के नाम गिना सकते हैं, शायद इक्का या दुक्का ही ऐसे लोग होंगे जो इस देश के समाज के उत्थान में कलम के सच्चे सिपाही हैं। खबर की कीमत आज के आधुनिक पत्रकार जान पा रहे हैं कि जिस खबर से पैसा न निकले वे खबर नही है। खबर से पैसा कितना निकल सकता है सभी समाचार उद्योग ये ही देखते हैं।

अरूण कुमार (लेगेसी इंडिया)

 

ये बात सही है कि आज पत्रकारिता व्यावसायिक है। पहले लोगों का जीवन खेती पर निर्भर था। आज औद्योगिकीकरण का दौर है। लोग शहर में नौकरी की तलाश में आते हैं। ऐसे में उनके पास आजीविका का साधन केवल नौकरी ही होती है और यदि वे किसी मिषन के लिये अपना जीवन दांव पार लगा भी दे तो क्या वो संस्था उसके परिवार की जिम्मेदारी लेगी, ये वही भारत है, जहां सीमा पर शहीद हुये जवानों की विधवा मुआवजे के लिये आजीवन सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाती रहती है।

रिचा वर्मा (आकाशवाणी)

अंग्रेजों की यातनाएं सहने के बावजूद भी गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबू राव विष्णु पराड़कर, महात्मा गांधी, जुगल किशोर जैसे पत्रकारों ने अपने कलम की धार को पैना बनाए रखा बिल्कुल सही। सवाल यह है कि ये बड़े नाम किसके लिए लिख रहे थे, स्वयं के लिए, लोक-हित के लिए। हम व्यवसाय के लिए लिख रहे हैं। हमारे कलम की स्याही मीडिया मालिक खरीदता है, इसलिए उसकी धार भी वही तय करता है। पत्रकारिता के मिशन की बजाय राहुल के यूपी मिशन पर ध्यान दें, तरक्की जल्दी होगी। वरना पैर में हवाई चप्पल और कंधे पर झोले के सिवाय पत्रकारिता हमें कुछ नहीं दे सकती। हां, अगर व्यवस्था से लड़ने का इतना ही जूनून है तो पत्रकारों को पहले खुद की लड़ाई लड़नी होगी। 10-20 हजार में खुश होकर मालिक के अहसानों के तले दबने के बजाय मीडिया में ही काम करने वाले आईटी, मैनेजमेंट कर्मियों के समान वेतन की लड़ाई लड़नी होगी। जो खुद की लड़ाई नहीं लड़ सकता, वह पत्रकारिता की लड़ाई क्या खाक लड़ेगा.

चंदन कुमार (उप-संपादक, जागरण जोश.कॉम)

 

ये सही है कि आजादी से पूर्व पत्रकारिता एक मिशन के रूप में थी और आज पत्रकारिता मिशन न होकर केवल अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति भर रह गयी है। मैं इसे थोड़ा अलग नजरिए से भी देखता हूं, पहले भले ही पत्रकारों के विचार अलग-अलग रहें हों मगर सभी का मकसद एक था, सिर्फ और सिर्फ आजादी। आज भी वैचारिक तौर पर पत्रकारों में भिन्नता तो दिखती है मगर साथ ही एक मकसद विहीन पत्रकारिता की अंधी दौड़ में भी वो शामिल दिखाई देते हैं, जो पहले नहीं था। ऐसे में पत्रकारिता के भी मायने बदले हैं, काम का तरीका बदला है स्वरूप बदला है।

अनूप आकाश वर्मा (पंचायत संदेश, संपादक)

 

आज की पत्रकारिता मिशन से हटकर केवल प्रोफेशन बन गयी है! किसी भी मीडियाकर्मी को इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि उसके द्वारा बनायी गयी न्यूज का क्या प्रभाव पड़ता है और उसका क्या औचित्य है ? मतलब सिर्फ इस बात से है कि उसे उस खबर के बदले रकम मिलती है या नहीं। वो रकम जिसके जरिये वो अपना और अपने परिवार को सुख सुविधाएं दिला सके। ऐसे में किसी पर आरोप लगाना कि वह कर्म के बजाये अर्थ को महत्व देने लगा है सही नहीं होगा क्योंकि कहीं न कहीं उसने समाज के बदलते परिवेश के साथ समझौता कर लिया है और ये कहना कि समाज की दिशा गलत है, ठीक नहीं!

आकाश राय (हिन्दुस्थान समाचार)

 

आजादी के पहले पत्रकारिता मिशन थी लेकिन धीरे धीरे जब समाज का विकास हुआ तो पत्रकारिता का भी विकास हुआ। सभी अखबार और चैनल टीआरपी की होड़ में जुट गए। इसके लिए उन्हें अपने जमींर से समझौता करते हुए पूंजी की ओर झुकना पड़ा, इसीलिए पैसा कमाने के चक्कर में पत्रकारिता का धीरे धीरे व्यावसायीकरण होने लगा। आज पत्रकारिता भी पैसा कमाने और रोजी रोटी चलाने का जरिया बन गई है।

आशीष सिंह (पीटीसी न्यूज)

 

पत्रकारिता आज एक व्यवसाय है ये बात एक दम साफ है इसमें कोई दो राय नहीं हैं। रामदेव और अन्ना के मामले में मीडिया की भूमिका सबके सामने है। अपनी स्वतंत्रता का रोना रोने वाली मीडिया ने सरकार का बचाव कुछ ऐसे किया कि कोई अंधा और विवेकहीन भी समझ जाये की मीडिया कितनी स्वतंत्र है। उसके बाद एक के बाद एक कई घटनाएं चाहे मुंबई ब्लास्ट के बाद राहुल वाणी, कश्मीर में तिरंगा या फिर दिग्गी राजा की हर बात पर संघ को बदनाम करने की नाकाम कोशिश, मीडिया ने इन सबको खूब जोर शोर से छापा और अपना मिशन दिखाया। सभी लोग भ्रष्टाचारी हैं या बेईमान हैं ऐसा कहना गलत है लेकिन हर बार बेईमानी को मजबूरी बता देना किसी भी लिहाज से ठीक नहीं है।

विकास शर्मा (आज समाज)

अगस्त अंक, २०११

वैचारिक क्रांति के अग्रदूत: महर्षि अरविंद

महर्षि अरविंद महान योगी, क्रान्तिकारी, राष्ट्रवाद के अग्रदूत, प्रखर वक्ता एवं पत्रकार के रूप में जाने जाते हैं। महर्षि अरविंद की पत्रकारिता के बारे में देशवासियों को बहुत अधिक जानकारी नहीं रही है, जिसके बारे में जानना नवोदित पत्रकार पीढ़ी के लिए आवश्यक है। महर्षि अरविंद उन पत्रकारों में से एक थे, जिन्होंने समाचार पत्रों के माध्यम से तत्कालीन जनमानस को स्वाधीनता संग्राम के लिए तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। उनका जन्म 15 अगस्त, 1872 में कलकत्ता के एक बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता कृष्णधन घोष कलकत्ता के ख्याति प्राप्त वकील थे, जो पूरी तरह से पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव में थे। महर्षि अरविंद की माता का नाम स्वर्णलता देवी था, पिता के दबाव में माता को भी पश्चिम की सभ्यता के अनुसार ही रहना पड़ता था।

महर्षि अरविंद की शिक्षा-दीक्षा भी अंग्रेजी वातावरण में ही हुई थी। उनके पिता ने उन्हें पांच वर्ष की अवस्था में दार्जिलिंग के लोरेटो कान्वेंट स्कूल में दाखिल करवा दिया, जिसका प्रबंध यूरोपीय लोग करते थे। अरविंद अपने बाल्यकाल के सात वर्षों तक ही भारत में रहे, जिसके पश्चात उनके पिताजी ने उन्हें उनके भाइयों के साथ इंग्लैण्ड भेज दिया जहां मैनचेस्टर के एक अंग्रेज परिवार में उनका पालन-पोषण हुआ।

महर्षि अरविंद ने ब्रिटेन में अपनी शिक्षा सैंट पाल स्कूल और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के किंग्स कालेज में प्राप्त की। पश्चिमी सभ्यता में पले-बढ़े महर्षि अरविंद एक दिन भारतीय संस्कृति के व्याख्याता होंगे, ऐसा शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा। फरवरी 1893 में महर्षि अरविंद भारत लौटे, ब्रिटेन से लौटने के पश्चात उन्होंने बड़ौदा कालेज में अध्यापन कार्य किया। यही वह समय था, जब बंगाल विभाजन के परिणामस्वरूप देश में 1857 के पश्चात क्रांति की ज्वाला एक बार फिर से प्रखर हो रही थी, जिसका केन्द्र कलकत्ता ही था। महर्षि अरविंद बड़ौदा से कलकत्ता भी आते-जाते रहते थे जहां वे क्रांतिकारी गतिविधियों में सहयोग करने लगे।

सन 1907 में अरविंद ने कांग्रेस के क्रांतिकारी संगठन नेशनलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन की अध्यक्षता की। इसी वर्ष अरविंद घोष ने विपिनचंद्र पाल के अंग्रेजी दैनिक वन्दे मातरम में काम करना शुरू कर दिया। महर्षि अरविंद का पत्रकारिता के क्षेत्र में इससे पूर्व ही पदार्पण हो चुका था। उन्होंने पत्रकारिता की शुरूआत सन 1893 में मराठी साप्ताहिक इन्दु प्रकाश से की थी जिसमें उनके नौ लेख प्रकाशित हुए थे। इनमें शुरूआती दो लेख उन्होंने भारत और ब्रिटिश संसद शीर्षक के साथ लिखे थे। इसके बाद 16 जुलाई से 27 अगस्त, 1894 के दौरान उनकी सात लेखों की एक श्रृंखला प्रकाशित हुई थी। वे लेख उन्होंने वन्दे मातरम के रचयिता एवं बांग्ला के महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चटर्जी को श्रद्धांजलि देते हुए लिखे थे। इसके बाद अरविंद की लेखन प्रतिभा के दर्शन बंगाली दैनिक युगांतर में हुए जिसकी शुरूआत मार्च, 1906 में उनके भाई बरिन्द्र और अन्य साथियों ने की। इस पत्र के प्रकाशन पर मई, 1908 में ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया।

इसके बाद महर्षि अरविंद ने अंग्रेजी दैनिक वन्दे मातरम में कार्य किया। इस पत्र में प्रकाशित उनके लेखों ने क्रांति के ज्वार में एक नया तूफान ला दिया। वन्दे मातरम में उनके लेखों के बारे में कहा जाता है कि भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में इतने प्रखर राष्ट्रवादी लेख कभी नहीं लिखे गए। ब्रिटिश सरकार की नीतियों के विरोध में लिखने पर वन्दे मातरम पर राजद्रोह का मुकदमा दायर कर दिया गया। अरविंद को संपादक के रूप में अभियुक्त बनाया गया। इस अवसर पर विपिन चंद्र पाल ने उनका बहुत सहयोग किया। उन्होंने अरविंद को पत्र का संपादक मानने से ही इंकार कर दिया जिसके लिए उन्हें छह माह का कारावास भुगतना पड़ा, परंतु सरकार अरविंद को दोषी नहीं सिद्ध कर पाई। अदालत के द्वारा अरविंद को दोषमुक्त करार दिए जाने पर देशभर में जश्न मनाया गया एवं स्थान-स्थान पर संगोष्ठियां आयोजित हुईं। उनके पक्ष में संपादकीय लिखे गए तथा उन्हें सम्मानित किया गया। अरविंद की पत्रकारिता की लोकप्रियता का ही कारण था कि कलकत्ता के लालबाजार की पुलिस अदालत के बाहर हजारों युवा एकत्र होकर वन्दे मातरम के नारे लगाते थे जहां अरविंद के मामले की सुनवाई चल रही थी। सितंबर 1908 में वन्दे मातरम का प्रकाशन बंद हो गया। इसके बाद उन्होंने 15 जून 1909 को कलकत्ता से ही अंग्रेजी साप्ताहिक कर्मयोगी और 23 अगस्त, 1909 को बंगाली साप्ताहिक धर्म की शुरूआत की जिनका मूल स्वर राष्ट्रवाद ही था। महर्षि अरविंद ने इन दोनों पत्रों में राष्ट्रवाद के अलावा सामाजिक समस्याओं पर भी लिखा। उनके इन पत्रों से विचलित होकर तत्कालीन वायसराय के सचिव ने लिखा था-

सारी क्रांतिकारी हलचल का दिल और दिमाग यही व्यक्ति है, जो ऊपर से कोई गैर कानूनी कार्य नहीं करता और किसी तरह कानून की पकड़ में नहीं आता।

महर्षि अरविंद का लेखन उनके अंतिम समय तक अनवरत चलता रहा। सन 1910 में वे कर्मयोगी, और धर्म को भगिनी निवेदिता को सौंप कर चन्द्रनगर चले गए। इसके बाद वे अन्तः प्रेरणा से पांडिचेरी पहुंचे। वहां भी उन्होंने आर्य अंग्रेजी मासिक पत्रिका की शुरूआत की जिसमें उन्होंने प्रमुख रूप से धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों पर लिखा। आर्य में उनकी अमर रचनाएं प्रकाशित हुईं, जिनमें प्रमुख हैं लाइफ डिवाइन, सीक्रेट आफ योग एवं गीता पर उनके निबंध। महर्षि अरविंद का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय की पत्रकारिता में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 5 दिसंबर 1950 को महर्षि अरविंद देह त्याग कर अनंत में विलीन हो गए। पत्रकारिता में राष्ट्रवादी स्वर को स्थान देने वालों में अरविंद का नाम सदैव उल्लेखनीय रहेगा।

सूर्यप्रकाश, अगस्त अंक, २०११

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