संवादसेतु

मीडिया का आत्मावलोकन…

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संपादकीय

संवादसेतु का यह अंक अल्पविराम के बाद आपके समक्ष है। मिशनरी मीडिया की आज भी यह नियति है। यही इसकी शक्ति भी है। जिन लोगों का इसे प्रारंभ करनें में प्रारंभिक प्रयास था उनके अपनी समस्याओं में उलझने के कारण इसके कुछ अंक प्रकाशित न हो सके। इसका श्रेय सुधी पाठकों को जाता है कि उन्होंने न केवल टोकना जारी रखा बल्कि संवादसेतु के पुनः प्रकाशन हेतु प्रेरित किया। परिणाम है कि नवोदित पत्रकारों की टोली नये सहयोगियों, नयी ऊर्जा तथा नये संकल्प के साथ पुनः आपके सामने है। बीते कुछ महीनों में मीडिया जगत यथावत ही चला है। वही खबरों की खींच-तान, वहीं बयानों पर छिड़ी रार और वही प्रेस कोंसिल अध्यक्ष काटजू का बड़बोलापन। प्रेस क्लब के चुनाव में वही पैनल दोबारा चुन लिया गया जो पिछली बार भी जीता था।

मीडिया सक्रियता की बात करें तो वह दो मुद्दों पर खास तौर पर दिखायी दी। पहली संजय दत्त की सजा पर और दूसरी नरेन्द्र मोदी के मामले में मीडिया के यू-टर्न पर। कुछ समय पहले तक मीडिया की आंखों की किरकिरी रहे नरेन्द्र मोदी संभावित केन्द्रीय भूमिका के चलते कथित नेशनल मीडिया के दुलारे बन गये हैं। प्रयाग का महाकुंभ इस बार काफी मीडिया फ्रेंडली रहा। उमड़ती भीड के बीच भी प्रशासन ने मीडिया की सुविधाओं का खास ख्याल रखा। विदेशी मीडिया भी कुंभ में काफी जुटा किंतु उनकी रिपोर्टिंग सतही ज्यादा नजर आयी। उसकी खास रुचि स्नान करती महिलायों और नागा सन्यासियों में अधिक रही है। वही दृश्य उनके फोटो-फीचर का विशेष आकर्षण हमेशा रहते हैं। इस बार की रिपोर्टिंग में कुम्भ की समीक्षा बाजार के रूप में भी काफी की गयी। कुम्भ की व्यवस्थाओं पर होने वाले खर्चे और उसमें होने वाली बिक्री के गणित जुटाने के लिये पत्रकारों ने पिछले डेढ़ सौ वर्षों के सरकारी खाते खंगाल डाले।

इस सब से अलग, बहुत छोटे स्तर पर पत्रकारिता के विद्यार्थियों के गुण-संवर्ध्न हेतु कुछ गतिविधियां भी आयोजित हुईं। प्रभावी शीर्षक लेखन पर प्रेरणा, नोएडा में कार्यशाला का आयोजन किया गया तो दिल्ली मे माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय ने मीडिया शोध पर दो दिवसीय़ कार्यशाला का आयोजन किया। इसी बीच दिल्ली में पत्रकारों द्वारा प्रतिवर्ष वसंत पंचमी पर आयोजित होने वाले सरस्वती पूजन का भव्य आयोजन हुआ तो प्रेरणा में पत्रकारों का होली मिलन समारोह। दोनों ही कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में पत्रकार उपस्थित थे। इनका संक्षिप्त विवरण इस अंक में समाविष्ट है। संवादसेतु के इस अंक के कलेवर और विषयवस्तु पर आपकी टिप्पणी तथा आगामी अंक के लिये आपकी रचनाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

भारतीय नववर्ष की हार्दिक शुभकामना सहित,

आपका,

आशुतोष

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मदारी से मुद्दई बनता मीडिया

कांस्टीट्यूशन क्लब में मीडिया पर आयोजित एक संगोष्ठी में उपस्थित श्रोताओं की आलोचना से खीझकर आजतक के सम्पादक कमर वाहिद नकवी ने खुले मंच से कहा था कि-

मीडिया अब मदारी बन गया है। एक ऐसा मदारी जो तरह-तरह के तमाशे दिखाकर लोगों का मनोरंजन करता है, लेकिन व्यक्ति और समाज के अस्तित्व को चुनौती देने वाली मूल समस्याओं पर ध्यान देने की फुर्सत उसके पास नहीं है और न ही इन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने में उसकी कोई सहभागिता है।

कमर वाहिद नकवी का यह कथन प्रसिद्ध मीडिया विश्लेषक नोम चोमस्की की मीडिया को बाजारु खिलौना बनने के संदर्भ में की गयी टिप्पणी से मेल खाता है। चोमस्की कहते हैं कि –

अपने दर्शकों को बाजार के हाथों उपभोक्ता के रूप में बेचना अब मीडिया का प्राथमिक कार्य हो गया है।

इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक में भारतीय मीडिया विशेषकर इलेक्ट्रानिक मीडिया जिस दिशा में अग्रसर होने की कोशिश कर रहा था, खबरों के चयन और प्रस्तुतीकरण के जिस तरीके को अपनाया जा रहा था, उस पर दृष्टिपात करें तो उपरोक्त दोनों टिप्पणियां एक हद तक सही प्रतीत होती हैं। श्मशान पर किए जाने वाले विभिन्न तांत्रिक प्रयोगों और कापालिक क्रियाओं का प्रसारण एक्सक्लूसिव खबर के रूप में हमारे खबरिया चैनल कर रहे थे। कोई बकरा शराब क्यों पी रहा है, स्वर्ग के लिए सीढि़यां कहां से निकलती हैं, जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों को लेकर हमारे खबरिया चैनल कई दिनों तक माथापच्ची करते रहे।

राजू श्रीवास्तव के भद्दे चुटकुले और राहुल महाजन की अश्लील हरकतें मुख्य समाचार हुआ करते थे। किसी विशेष धारावाहिक के अगले एपीसोड में सास-बहू का रिश्ता किस मोड़ पर पहुंचेगा, इसका कयास भी खबरिया चैनल लगाते थे। समलैंगिकता जैसे गम्भीर मुद्दों पर विशेषज्ञों की राय जानने के लिए समाजशास्त्रियों की बजाय सेलिना जेटली जैसे सेलेब्रिटीज को आमंत्रित किया जाता था। इन महत्वपूर्ण खबरों के बीच यदि कोई रामसेतु आंदोलन हो जाता, तो पूरे देश में चक्काजाम होने तक उसके कवरेज की जरूरत नहीं समझी जाती थी। विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा जैसी छोटी-मोटी घटनाएं सामाजिक मुद्दों पर गहरी नजर और पैनी दृष्टि रखने का दावा करने वाले पत्रकारों की पकड़ में नहीं आती थीं, जबकि इस यात्रा के जरिए साढे़ आठ करोड़ भारतीयों ने हस्ताक्षर कर गोसंरक्षण और गोसंवर्धन के लिए राष्ट्रपति से गुहार लगायी थी। गो ग्राम यात्रा को मिला जनसमर्थन उस मतसंख्या के लगभग बराबर है, जिसको प्राप्त कर कोई राजनीतिक दल केन्द्र में सत्तारुढ़ हो सकता है। मीडिया के तृणमूल तथ्यों के प्रति अज्ञानता के अध्ययन के लिए विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा को केस स्टडी, के लिए चुना जा सकता है। वास्तव में इस दौर का मीडिया मदारी नहीं मदारी का बंदर बन गया था ।

यह सब कुछ अनवरत रूप से चल रहा था। इसी बीच कालेधन के मुद्दे को लेकर योगऋषि स्वामी रामदेव और जनलोकपाल बनाने को लेकर अन्ना हजारे मीडिया में अवतरित होते हैं। सम्पूर्ण मीडिया में इन दोनों व्यक्तियों और इनके द्वारा उठाए गए मुद्दों के प्रति दीवानगी देखने को मिलती है। प्रोटोजोआ प्रजाति के भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्डेटा प्रजाति के स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे के मैदान में उतरने की घटना न केवल भारतीय जनता को प्रेरित करती है बल्कि जनता को सम्मोहित करने वाली मीडिया को भी सम्मोहित करती है। मीडिया में आम आदमी से जुडे़ इन मुद्दों और इन मुद्दों को उठाने वाली आवाजों को पर्याप्त समय और स्थान मिलता है। साथ ही, इस मुद्दे के सतत कवरेज को लेकर मीडिया में एक सर्वसम्मति भी दिखाई दी।

आम आदमी से जुडे़ किसी मुद्दे पर सर्वसम्मति बनना भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया के इतिहास की एक दुर्लभतम घटना है। कभी किसी मुद्दे पर बनी भी तो वह दो चार दिनों में बिखर गयी। भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया का व्यवस्था विरोध भी एक दायरे में होता रहा है। मुद्दों के आधार पर व्यवस्था को खुली चुनौती देने की प्रवृति भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया में अभी तक नदारद रही है। व्यवस्था द्वारा निर्धारित दायरे में ही व्यवस्था का विरोध यह माध्यम करता रहा है।

दूसरे शब्दों में कहें तो इलेक्ट्रानिक मीडिया में मुद्दों को लेकर की जाने वाली मुद्दई पत्रकारिता नहीं की जाती थी। इस पड़ाव पर मुद्दई शब्द के संदर्भ में एक तथ्य स्मरण कराते चलें कि जब कोई व्यक्ति अथवा संस्था मुद्दों के आधार पर जीवनयापन की कोशिश करता है तो शोषणकारी व्यवस्था और व्यक्तियों से उसका टकराव स्वाभाविक हो जाता है। शायद इसीलिए न्यायालय में चलने वाले मुकदमों में प्रतिपक्ष को मुद्दई और समाज में अपने दुश्मन को भी मुद्दई कहा जाता है।

स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे के संदर्भ मे पहली बार इलेक्ट्रानिक मीडिया में न केवल एक सर्वसम्मति बनी बल्कि यह लम्बे समय तक चली भी। विशेषकर अन्ना हजारे के 16 अगस्त से प्रारम्भ होने वाले अनशन के संदर्भ में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने जिस अभूतपूर्व एकजुटता का परिचय दिया और जिस तरह व्यवस्था विरोध की व्यवस्था द्वारा निर्धारित पारंपरिक चैखटों को धराशायी किया, उससे इलेक्ट्रानिक मीडिया के बेहतर भविष्य से एक आस बंधी है।

हम जानते हैं कि भारतीय पत्रकारिता आनुवांशिक रूप से व्यवस्था विरोधी रही है। स्वतंत्रता पूर्व की पत्रकारिता अपने तेवरदार और व्यवस्था विरोधी रवैये के लिए जानी जाती है। स्वतंत्रता के पश्चात भी ऐसे कई मौके आए जब प्रिंट मीडिया ने अद्भुत एकजुटता का प्रदर्षन किया और व्यवस्था के खिलाफ जाकर मुद्दों को उभारने का प्रयास किया। प्रिंट मीडिया के इस मुद्दई रवैये के कारण ही व्यवस्था को कई बार शीर्षासन करना पड़ा। अन्ना के अनशन को लेकर भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया पहली बार उस मोड में दिखी जिसकी उससे अपेक्षा की जाती रही है।

इलेक्ट्रानिक मीडिया का यह व्यवस्था विरोधी न्यू मोड न केवल आम जनता के लिए बल्कि खुद उसके स्वास्थ्य के लिए भी लाभप्रद है। ऊल-जलूल कार्यक्रमों के प्रसारण से पैदा हुए विश्वसनीयता के संकट ने खुद मीडिया की प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर दिया था। शायद इसी कारण नेता-अभिनेता भी बीच बहस में रुककर मीडिया को आईना दिखा देते थे। आजतक पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम सीधी बात में एक बार अभिनेता शाहरुख खान ने प्रभु चावला को लगभग डांटते हुए कहा था कि-

आप लोग जिस तरह अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए ऊल-जलूल कार्यक्रम दिखाते हैं, ठीक उसी तरह हम भी फिल्म को सफल बनाने के लिए कई स्टंट करते हैं। हम और आप दोनों पैसा कमाने के लिए यह सब करते हैं। फिर आपको नैतिक प्रश्न पूछने का क्या अधिकार है।

इसी तरह उदयन शर्मा की पुण्यतिथि पर आयोजित एक कार्यक्रम में कपिल सिब्बल ने मीडिया की क्षमताओं पर कई सवाल खडे़ कर दिए थे। यह बात 2009 के चुनावों के तुरंत बाद की है। ऐसा नहीं था कि इलेक्ट्रानिक मीडिया का प्रभाव क्षीण हो गया था बल्कि वह इतना विखंडित था कि अनेक सटीक मुद्दों पर भी उसका स्वर मास मोबलाईजेशन की परिघटना को जन्म नहीं दे पाता था। जब सभी चैनलों ने एक स्वर में अन्ना के अनशन से जुड़े मुद्दों को उठाया और लगभग 12 दिनों तक उसकी सतत कवरेज की, तब जाकर सत्ताधारियों को इलेक्ट्रानिक मीडिया की ताकत का अंदाजा लगा। सूचना एवं प्रसारण मंत्री ने चैनलों से सभी पक्षों को दिखलाने का आग्रह किया तो दूसरी तरफ कुछ सरकारी प्रवक्ताओं ने अन्ना की आंधी को मीडिया मैनेज्ड, कहकर मीडिया की ताकत को अनिच्छापूर्वक स्वीकार किया।

इस पूरे प्रकरण से यह भी स्पष्ट हुआ है कि मीडिया की असली ताकत आम जनता ही है। आम जनता की आवाज को प्रतिध्वनित कर इलेक्ट्रानिक मीडिया अपने व्यावसायिक हितों और सामाजिक प्रतिबद्धता को एक साथ साध सकती है। आवश्चकता केवल इस बात की है कि अन्ना के अनशन के समय उभरी मुद्दई प्रवृति समय-समय पर मुखरित होती रहे। मुद्दई प्रवृत्ति को अपवाद की बजाय स्थायी भाव बनाकर ही मीडिया भारत की पहचान और अपनी भूमिका को  बेहतर ढंग से परिभाषित और पोषित कर सकती है।

जयप्रकाश सिंह, सितम्बर अंक, २०११

 

मीडिया समाज हित से कट गया है- जवाहर लाल कौल

पत्रकारिता के बदलते स्वरूप और उसमें आई विसंगतियों के कारण आज पत्रकारिता एवं पत्रकारों पर कई तरह के लांछन लगाए जा रहे हैं। आज पत्रकारों एवं समाचार-पत्रों द्वारा व्यक्तिगत एवं संस्थागत लाभ के लिए सामाजिक एवं राष्ट्रीय हित के साथ-साथ सामुदायिक कल्याण की भावना के साथ भी खिलवाड़ किया जा रहा है। क्या ऐसे में पत्रकारिता को जनचेतना एवं परिवर्तन का औजार बनाने वाले क्रांतिकारी पत्रकारों द्वारा स्थापित परंपरा के प्रति न्याय हो रहा है, स्वाधीनता दिवस की 64वीं वर्षगांठ पर जाने माने पत्रकार जवाहर लाल कौल जी से इस विषय पर उनकी राय जानने का हम प्रयास कर रहे हैं।

प्रश्न 1 60 के दशक में पत्रकारिता में ऐसा क्या आकर्षण रहा जो आप इस क्षेत्र में आए, इस क्षेत्र में आपका कैसा अनुभव रहा ?

उत्तर- पत्रकारिता में आने से पहले मैं सामाजिक संस्थाओं में काम करता था। इसलिए मुझे ऐसा लगा कि पत्रकारिता के माध्यम से मैं समाज के प्रति अपने सेवा भाव को पूरा कर सकता हूं। उस समय पत्रकारिता में जितना आज आकर्षण है, जैसे मनोरंजन, शान-ओ-शौकत और जो दूसरी चीजें दिखाई देती हैं, वह नहीं था। फिर भी उस समय यह आकर्षण था कि इसमें व्यक्ति अपने मन की बात दूसरों को सुना सकता है और सामाजिक दायित्व पूरा कर सकता है। इसीलिए मैं इस क्षेत्र में आया।

प्रश्न 2 पत्रकारिता के शुरूआती दौर से लेकर अब तक पत्रकारिता जगत में आप क्या बदलाव देखते हैं ?

उत्तर- जब मैं पत्रकारिता में आया था तो पत्रकारिता में जो मिशन की भावना थी, समाज व उद्देश्य के प्रति काम करने की इच्छा थी वो कुछ-कुछ जीवित थी। पत्रकारिता में वे ही लोग आते थे जो समाज को कुछ देने की इच्छा रखते थे, कठिन परिस्थितियों में भी काम कर सकते थे। पारिवारिक जीवन की असुविधाओं को भी झेल सकते थे। तब तथ्य के साथ खिलवाड़ करना गलत माना जाता था। पत्रकारों का काम सच्चाई को सामने लाना और अपनी ओर से कम से कम प्रतिक्रिया देना होता है, लेकिन धीरे-धीरे पत्रकारिता में व्यापार का तत्व बढ़ने लगा। अखबारों का उत्पादन महंगा हो गया। इसका असर पत्रकारिता पर पड़ा। संचालक व मालिक मानने लगे कि समाचार पत्र उद्योग है और इसका काम पैसा कमाना है। पैसा कमाने के लिए लोगों को आकर्षित करना होता है जिसके चलते पत्रकारिता में एक शब्द आया इन्फोटेन्मेंट या सूचनारंजन। इसमें भी धीरे-धीरे सूचना तत्व कम होता गया और मनोरंजन का तत्व बढ़ता गया। इसीलिए सच्चाई और तथ्य पिछड़ते गए। सामान्य पत्रकार और संपादक भी तथ्यों के साथ खिलवाड़ करने की छूट पाने लगे। एक और महत्वपूर्ण बात इसी बीच हुई-टेलीविजन का प्रसार। किसी जमाने में अखबारी भाषा को दूसरे दर्जे की भाषा कहा जाता था। जर्नलिस्टिक लैंग्वेज को हल्का-फुल्का माना जाता था जिसे टेलीविजन ने और हल्का कर दिया। भाषा तथ्यों पर आधारित न होकर अतिरंजना पर आधारित हो गई। पत्रकारिता ग्लैमर का व्यवसाय बन गई, ऐसे व्यवसाय में पैसे का लोभ होना स्वाभाविक है, इसीलिए पत्रकारिता समाजोन्मुख नहीं रह गई है।

प्रश्न 3 जम्मू-कश्मीर पर आपने गहन अध्ययन किया है। क्या आपको लगता है कि देश के अन्य भागों में रहने वाले नागरिकों को वहां की वास्तविक जानकारी समाचार पत्रों व चैनलों के माध्यम से हो पा रही है, अगर नहीं तो क्या और कैसे होना चाहिए ?

उत्तर- मीडिया व्यापक समाज हित से कट गया है। बड़े अखबार केवल उन्हीं पाठकों तक पहुंचना चाहते है जो पाठक महंगे संसाधनों को खरीद सकते हैं और जिनके कारण बड़े-बड़े विज्ञापन प्राप्त हो सकते हैं। जिन्हें हम राष्ट्रीय समाचार पत्र कहते हैं उनमें इस बात की होड़ होती है कि वह अधिक से अधिक आर्थिक रूप से संपन्न शहरी खरीदारों को ही जुटाएं। स्पष्ट है कि समाचार देते वक्त या घटनाओं पर अपना मत व्यक्त करते समय ऐसे ही पाठकों या वर्गों का हित सर्वोपरि होता है। इस तरह समाचार देने से पूरे देश के संदर्भ में हो रही घटनाओं का सही-सही चित्रण संभव नहीं है। जम्मू-कश्मीर के सिलसिले में समाचार पत्रों में अधिकतर उन ही वर्गों और गुटों के बारे में समाचार आते हैं जो हिंसा का सहारा लेते हैं, जो नकारात्मक गतिविधियों में लिप्त हैं या जो चैंकाने वाले बयान देते हैं। इस तरह जो चित्र बनता है वो न तो पूरा होता है, न सच्चा। जम्मू-कश्मीर के बारे में मीडिया की भूमिका अक्सर उत्तरदायित्वपूर्ण नहीं रही है जिससे देश के अन्य क्षेत्रों के लोगों में अनेक तरह की भ्रांतियां पैदा हो गई हैं।

प्रश्न 4 जम्मू-कश्मीर की ऐसी क्या स्थिति है जो मीडिया द्वारा सामने नहीं लाई जा रही है ?

उत्तर- जम्मू-कश्मीर में कई तरह के लोग रहते हैं। उत्तर-पष्चिमी पहाड़ों में लद्दाख का बहुत बड़ा क्षेत्र है जहां का प्रमुख धर्म बौद्ध धर्म है। दक्षिण में जम्मू का विशाल क्षेत्र है। घाटी और जम्मू की पहाडि़यों में गुजर और बकरवाल रहते हैं। कश्मीर घाटी में भी दो मुस्लिम संप्रदाय के लोग हैं- शिया और सुन्नी। इन सब में केवल सुन्नी संप्रदाय का एक वर्ग भारत विरोधी गतिविधियों में सक्रिय है और कुछ लोग हिंसक राजनीति कर रहे हैं। यानि पूरे राज्य की आबादी के 10 प्रतिशत लोगों की गतिविधियां ही मीडिया की रूचि का विषय है। शेष सभी वर्गों की आवाज अनसुनी कर दी जाती है।

प्रश्न 5 जम्मू-कश्मीर की स्थानीय मीडिया के बारे में आपकी क्या राय हैं ?

उत्तर- जम्मू-कश्मीर की त्रासदी है कि कष्मीरी भाषा की कोई लिपि नहीं है। जो प्राचीन लिपि थी, वह शारदा कहलाती थी। आजादी के बाद वहां के सत्ताधारियों ने उर्दू, फारसी पर आधारित एक लिपि का विकास किया लेकिन यह लिपि अवैधानिक होने के कारण नहीं चल पाई। परिणामतः प्राचीन और संपन्न होने के बावजूद कश्मीरी में लोकप्रिय पत्रकारिता पनप नहीं पा रही। वर्तमान समय में जितने भी समाचार पत्र वहां छप रहे हैं वह उर्दू या अंग्रेजी भाषा में हैं। इसीलिए आम लोगों तक पत्रकारिता नहीं पहुंच पा रही है।

प्रश्न 6 जम्मू-कश्मीर के समाचार पत्रों का क्या दृष्टिकोण हैं ?

उत्तर- वहां भी पत्रकारिता का वही रूप है जो देश में है। अलग-अलग हितों के पत्र-पत्रिकाएं मौजूद हैं। कुछ अलगाववादियों का समर्थन करते हैं, तो कुछ राष्ट्रीय दृष्टिकोण को सामने लाते हैं। इनमें भी क्षेत्रीय विभिन्नता है। कश्मीर की पत्र-पत्रिकाएं अलगाववाद से प्रभावित है जबकि जम्मू में राष्ट्रीय पक्ष को प्रमुखता दी जाती है।

प्रश्न 7 वर्तमान विदेश नीति को आप किस प्रकार देखते हैं ?

उत्तर- वर्तमान विदेश नीति में किसी सकारात्मक पहल का सर्वथा अभाव है। विदेश नीति किसी देश की सुरक्षा नीति का आयाम होती है, लेकिन दुर्भाग्य से इस समय भारत चारों ओर से ऐसे देशों से घिरा हुआ है जो शत्रुवत व्यवहार कर रहे हैं। बड़े देशों की बात तो अलग नेपाल, बांग्लादेश जैसे छोटे देश भी भारत के हितों के विपरीत नीतियां अपना रहे हैं। यह हमारी विदेश नीति की असफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है कि भारत अपने ही आंगन में अकेला पड़ गया है।

प्रश्न 8 पत्रकारिता और बाजार के बीच संबंधों पर आपने गहन अध्ययन किया है। आपकी राय में बाजार किस तरह पत्रकारिता को प्रभावित कर रहा है ?

उत्तर- पत्रकारिता बाजार का ही हिस्सा है। जिस समय पत्रकारिता एक मिशन थी, उस समय पत्रकार एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हुआ करता था। अब महंगी टेक्नोलाजी और व्यापक प्रसार संख्या के कारण मीडिया पर पूंजीपतियों और व्यापारिक निगमों का वर्चस्व हो गया है। इसलिए आज के उपभोक्ता समाज में मीडिया बाजार पर न केवल आश्रित है बल्कि बाजार के हितों का संरक्षण करती है।

प्रश्न 9 प्रधानमंत्री मनामोहन सिंह ने मीडिया पर आरोप लगाया है कि मीडिया देश की समस्याओं को लेकर जज की भूमिका अदा कर रहा है। क्या सरकार मीडिया पर नियंत्रण करने की कोशिश कर रही है ?

उत्तर- सरकार को मीडिया पर नियंत्रण करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि सरकार जिस उपभोक्तावाद का स्वयं प्रसार कर रही हैं उसी उपभोक्तावाद का माध्यम देश के अखबार भी है। सरकार इस बात को समझती है कि मीडिया को परोक्ष रूप से प्रभावित करना आसान है लेकिन प्रत्यक्ष नियंत्रण सरकार के लिए भी खतरनाक हो सकता है।

प्रश्न 10 व्यवस्था परिवर्तन को लेकर देशभर में चल रही बहस पर मीडिया के नजरिए को आप किस परिप्रेक्ष्य में देखते हैं ?

उत्तर- व्यवस्था परिवर्तन मीडिया के लिए एक खबर है। वर्तमान व्यवस्था को बदलने की न तो मीडिया में इच्छा है और न ही क्षमता।

प्रश्न 11 ‘न्यूज आफ द वर्ल्ड साप्ताहिक पत्र के बंद होने की घटना को मूल्य आधारित पत्रकारिता की समाप्ति की घोषणा मान सकते है ?

उत्तर- ऐसी सारी पत्रिकाओं के बंद होन से ये तो पता लगता ही है कि मुनाफे के इस व्यापार में केवल सामाजिक दायित्व का काम करना कितना कठिन हो गया है।

प्रश्न 12 आपके विचार में भारत की भावी दिषा क्या होनी चाहिए और यह कैसे संभव है ?

उत्तर- जब 1947 में हमारा देश आजाद हुआ तो हमने अपनी दिशा तय नहीं की क्योंकि हमने ऐसी व्यवस्था अपना ली जो पहले से बनी हुई थी। हम लगभग उसी दिशा में चल रहे थे जिसमें आजादी से पहले चलते थे। इसीलिए अगर देश को बदलना है तो यह मानकर चलना होगा कि जिस तरह की व्यवस्था अपनानी है वह यहीं की परिस्थितियों, यहीं की मनीषा और यहीं के सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित हो सकती हैं। दिशाएं स्वयं बनाई जाती हैं, आयातित नहीं होती।

नेहा जैन, अगस्त अंक, २०११

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