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मीडिया का आत्मावलोकन…

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सौदेबाजी की राह पर पत्रकारिता: अशोक टंडन

भारत में पत्रकारिता ने अपनी शुरूआत मिशन के तौर पर  की थी जो धीरे-धीरे पहले प्रोफेशन और फिर कामर्शियलाइजेशन में तब्दील हो गई। आज पत्रकारिता कमर्शियलाइजेशन के दौर से भी आगे निकल चुकी है जिसके संदर्भ में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विशवविद्यालय के पूर्व निदेशक अशोक टंडन से बातचीत के कुछ अंश यहां प्रस्तुत है।  

पत्रकारिता के क्षेत्र में आपका आगमन कैसे हुआ इस दौरान आपके क्या अनुभव रहें ?

दिल्ली विश्वविद्यालय से जब मैं राजनीति शास्त्र में एम.ए. कर रहा था तो उस समय कुछ पत्रकारों को देखकर इस क्षेत्र की ओर आकर्षण बढ़ा। एम.ए. पूरी करने के बाद वर्ष 1970 में मुझे हिन्दुस्थान समाचार से विश्वविद्यालय बीट कवर करने का मौका मिला। वर्ष 1972 में मैंने पीटीआई में रिपोर्टिंग शुरू की और वहां विश्वविद्यालय, पुलिस, दिल्ली प्रशासन, संसद, विदेश मंत्रालय समेत लगभग सभी बीट कवर की। 28 वर्षों के दौरान मैंने लगभग 28 देशों की यात्राएं की। पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करना चुनौतीपूर्ण होता है।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारिता के आपके क्या अनुभव रहें?

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की पत्रकारिता के लिए पहले अपने देश को समझना होता है। भारत में जब वर्ष 1980 के दशक की शुरूआत में नान अलाइनमेंट समिट और कामनवेल्थ गेम्स समिट हुई तो उसमें रिपोर्टिंग का अवसर मिला। वर्ष 1985 में मुझे विदेश मंत्रालय की बीट सौंपी गई। इस दौरान भारत के प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति के साथ विदेश जाने का मौका मिला। वर्ष 1988 में मुझे पीटीआई लंदन का संवाददाता नियुक्त कर दिया गया। जब कोई पत्रकार विदेश में रहकर पत्रकारिता करता है तो उसका फोकस अपने देश पर ही रहता है।

आप पूर्व प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार के रूप में कार्य कर चुके हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय में आपका क्या अनुभव रहा?

वर्ष 1998 में लंदन से जब वापिस आया तो प्रधानमंत्री कार्यालय में काम करने का मौका मिला। इस दौरान अपने साथी पत्रकारों से सहयोग करने का कार्य किया। आमतौर पर पत्रकार मेज के एक तरफ और अधिकारी दूसरी तरफ होता है। यहां मैंने मेज के दूसरी तरफ का भी अनुभव किया। प्रधानमंत्री कार्यालय में रहते हुए देशभर के पत्रकारों व विश्व के कुछ पत्रकारों के साथ सरकार की ओर से वार्तालाप किया जो एक अलग अनुभव रहा।

मीडिया में कमर्शियलाइजेशन का दौर कब से आया?

वर्ष 1947 से पहले पत्रकारिता को मिशन माना जाता था, वर्ष 1947-75 तक मीडिया में प्रोफेशन का दौर था। आपातकाल के खत्म होने के बाद पत्रकारिता में गिरावट आनी शुरू हो गई थी और वर्ष 1991 से उदारीकरण के कारण मीडिया में कमर्शियलाइजेशन का दौर आया। लेकिन पेड न्यूज के दौर में पत्रकारिता के लिए कमर्शियल शब्द भी छोटा पड़ रहा है।

वर्तमान समय में पत्रकारिता जगत में आप क्या बदलाव देखते हैं?

वर्तमान दौर में सौदेबाजी की पत्रकारिता हो रही है। यदि किसी को मीडिया द्वारा कवरेज करवानी है तो उसका मूल्य पहले से ही निर्धारित होता है। कमर्शियल में समाचार पेड नहीं होता, विज्ञापन के जरिए पैसा कमाया जाता है लेकिन अब पत्रकारिता में डील हो रही है। जो लोग इसको कर रहे है वह इसे व्यावसायिक पत्रकारिता मानते हैं। पत्रकारिता में 10 साल पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। हालांकि पूरा पत्रकारिता जगत ही खराब है, मैं ऐसा नहीं मानता। पत्रकारिता में कुछ असामाजिक तत्वों के कारण पूरे पत्रकारिता जगत पर आक्षेप लगाना सही नहीं है।

वर्तमान समय में जहां चौथे स्तम्भ की भूमिका पर सवालिया निशान खड़े किए जा रहें हैं, ऐसी दशा में क्या आपको लगता है कि इसमें कोई सुधार हो सकता है?

पत्रकारिता के स्तर में गिरावट जरूर आई है। यदि कोई बहुराष्ट्रीय कम्पनी अगर अपना उत्पाद बाजार में लेकर आती है तो उसे मीडिया के माध्यम से समाचार के रूप में प्रस्तुत करवाती है। राजनैतिक दलों द्वारा भी चुनाव के समय मीडिया से डील किया जाता है और संवाददाता के जरिए उम्मीदवार का प्रचार कराया जाता है। पत्रकारिता को बचाने वाले अब कम ही लोग रह गए हैं और अन्य धक्का देकर निकल रहे हैं, लेकिन मीडिया में अब भी कई लोग ईमानदारी से काम कर रहे हैं। पत्रकारिता में अभी स्थिति वहां तक नहीं पहुंची कि कुछ सुधार नहीं किया जा सकता। अच्छी पत्रकारिता आवाज बनकर उठेगी। भारतीय समाज की खूबी है कि यहां कोई भी विकृति अपनी चरम सीमा पर नहीं पहुंचती, उसे रास्ते में ही सुधार दिया जाता है। पत्रकारिता में अब तक जो भी निराशाजनक स्थिति सामने आई है वह अवश्य चिंता की बात है। लेकिन जब सीमा पार होने लगती है तो कोई न कोई उसे अवश्य रोकता है। भारत में पत्रकारिता का भविष्य उज्जवल है।

हाल ही में हुए जन आन्दोलन पर मीडिया कवरेज का क्या रूख रहा?

इलेक्ट्रानिक मीडिया घटना आधारित मीडिया है। घटना यदि होगी तो लोग उसे देखेंगे और इससे चैनल की टीआरपी बढ़ेगी। कुछ लोगों का आरोप है कि मीडिया खुद घटना बनाता है जो काफी हद तक ठीक भी है। प्रिंस जब गड्ढे में गिरा तो उसे तीन दिन तक दिखाया गया जिसके कारण अन्य महत्वपूर्ण खबरें छूट गई। वहीं अन्ना के आंदोलन को भी मीडिया ने पूरे-पूरे दिन की कवरेज दी जो कुछ हद तक सही था क्योंकि आम जनता टेलीविजन के माध्यम से ही इस आन्दोलन से जुड़ी। मीडिया के प्रभाव के कारण यह आन्दोलन सफल हो पाया। हालांकि सरकार ने इस दौरान मीडिया की आलोचना की क्योंकि यह कवरेज उनके पक्ष में नहीं था। मीडिया की कवरेज का ही नतीजा था कि लोगों ने इस आन्दोलन के जरिए अपनी भड़ास निकाली। यदि ऐसा नहीं होता तो इसका परिणाम हानिकारक होता। मीडिया के माध्यम से ही विदेशों में भी लोगों ने इस आन्दोलन को देखा। चीन ने तो चिंता भी व्यक्त की कि भारत का मीडिया चीन के मीडिया को बिगाड़ रहा है। भारत का मीडिया स्वतन्त्र रूप से कार्य करता है। जब मैं प्रधानमंत्री कार्यालय में कार्यरत था तो गर्व महसूस किया कि विदेशों में भारतीय लोकतन्त्र की सराहना की जाती है। वह भारत की न्यायिक स्वतन्त्रता और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के कारण भारत के मीडिया को जीवन्त मीडिया की संज्ञा देते हैं।

विश्व की चार सबसे बड़ी समाचार समितियां विदेशी ही है। क्या आपको लगता है कि उनका प्रभाव भारतीय मीडिया पर भी है?

यह चारों समाचार समितियां बहुराष्ट्रीय हैं और इनका मानना है कि यह स्वतन्त्र पत्रकारिता कर रही हैं लेकिन यह समाचार समिति भी किसी देश की ही है और इनके लिए देश का हित सर्वोपरि होता है। यहां राष्ट्रहित व निजी हित विरोधाभासी है। ए.पी. अमेरिका की प्रतिष्ठित समाचार समिति है। इसे सबसे पहले प्रिंट के लिए शुरू किया गया और 180 देशों में फैलाया गया। इसके पीछे उद्देश्य था कि पूरी दुनिया सूचना के तंत्र को अमेरिका के नजरिए से देखे। चीन भी आर्थिक महाशक्ति बनने के साथ अपनी समाचार समिति शिन्हुआ को विश्व में फैला रहा है। वहीं दूसरी ओर भारत आर्थिक महाशक्ति के रूप में तो उभर रहा है लेकिन दुर्भाग्यवश सूचना के क्षेत्र में हम काफी पीछे हैं। सूचना के क्षेत्र में हम पहले की अपेक्षा सिकुड़ रहे हैं। प्रसार भारती, आकाशवाणी व दूरदर्शन पहले से सिकुड़ गए हैं। भारतीय समाचार समितियों की भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। हमारे देश में न तो सरकारी मीडिया का विकास हुआ और न ही समाचार समितियों को विस्तृत होने दिया गया। भारत में स्थित शिन्हुआ के ब्यूरो में 60 व्यक्ति रायटर्स के ब्यूरो में 250 व्यक्ति व एपी के ब्यूरो में 350 व्यक्ति कार्यरत है। यह समाचार समितियां भारत को विश्व में अपने चश्मे से प्रस्तुत कर रही हैं। जिस तरह भारत के फिल्म उद्योग ने विश्व में अपनी पहचान बनाई है, उसी तरह हमें सूचना के क्षेत्र में भी आगे बढ़ना चाहिए था लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो सका।

पाशचात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण आज अंग्रेजी भाषा का जो प्रचलन बढ़ा है, ऐसे में हिन्दी पत्रकारिता को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?

हिन्दी पत्रकारिता की हम जब भी चर्चा करते हैं तो हम उसको अंग्रेजी के सामने लाकर खड़ा कर देते हैं जो गलत है। हिन्दी अंग्रेजी की प्रतिस्पर्धी भाषा नहीं है। भारतीय पत्रकारिता ने अंग्रेजी भाषा को कभी भी अपना प्रतिस्पर्धी नहीं माना लेकिन जब भी हिन्दी पत्रकारिता को बढ़ाने की बात की गई तो हमने कह दिया कि अंग्रेजी के कारण ऐसा नहीं हो रहा। पिछले 10 सालों में हिन्दी पत्रकारिता का विस्तार हुआ है। मैं नहीं मानता कि अंग्रेजी के कारण हिन्दी पत्रकारिता को नुकसान पहुंचा है। शिक्षा में बढ़ोतरी के साथ हिन्दी के स्तर में भी वृद्धि हुई है। आज हिन्दी भाषी समाचार चैनलों की संख्या अंग्रेजी भाषी चैनलों से कहीं अधिक है। भारत में अंग्रेजी भाषा वर्ष 1947 से पहले ब्रिटिष शासन की देन है। अमेरिका के महाशक्ति बनने के कारण आज अंग्रेजी वैश्विक भाषा बन गई है। जिन देशों को अंग्रेजी नहीं आती थी, वह अंग्रेजी सीख रहे हैं। भारत को अंग्रेजी का लाभ वर्तमान समय में मिल रहा है।

नेहा जैन, सितम्बर अंक २०११

मीडिया समाज हित से कट गया है- जवाहर लाल कौल

पत्रकारिता के बदलते स्वरूप और उसमें आई विसंगतियों के कारण आज पत्रकारिता एवं पत्रकारों पर कई तरह के लांछन लगाए जा रहे हैं। आज पत्रकारों एवं समाचार-पत्रों द्वारा व्यक्तिगत एवं संस्थागत लाभ के लिए सामाजिक एवं राष्ट्रीय हित के साथ-साथ सामुदायिक कल्याण की भावना के साथ भी खिलवाड़ किया जा रहा है। क्या ऐसे में पत्रकारिता को जनचेतना एवं परिवर्तन का औजार बनाने वाले क्रांतिकारी पत्रकारों द्वारा स्थापित परंपरा के प्रति न्याय हो रहा है, स्वाधीनता दिवस की 64वीं वर्षगांठ पर जाने माने पत्रकार जवाहर लाल कौल जी से इस विषय पर उनकी राय जानने का हम प्रयास कर रहे हैं।

प्रश्न 1 60 के दशक में पत्रकारिता में ऐसा क्या आकर्षण रहा जो आप इस क्षेत्र में आए, इस क्षेत्र में आपका कैसा अनुभव रहा ?

उत्तर- पत्रकारिता में आने से पहले मैं सामाजिक संस्थाओं में काम करता था। इसलिए मुझे ऐसा लगा कि पत्रकारिता के माध्यम से मैं समाज के प्रति अपने सेवा भाव को पूरा कर सकता हूं। उस समय पत्रकारिता में जितना आज आकर्षण है, जैसे मनोरंजन, शान-ओ-शौकत और जो दूसरी चीजें दिखाई देती हैं, वह नहीं था। फिर भी उस समय यह आकर्षण था कि इसमें व्यक्ति अपने मन की बात दूसरों को सुना सकता है और सामाजिक दायित्व पूरा कर सकता है। इसीलिए मैं इस क्षेत्र में आया।

प्रश्न 2 पत्रकारिता के शुरूआती दौर से लेकर अब तक पत्रकारिता जगत में आप क्या बदलाव देखते हैं ?

उत्तर- जब मैं पत्रकारिता में आया था तो पत्रकारिता में जो मिशन की भावना थी, समाज व उद्देश्य के प्रति काम करने की इच्छा थी वो कुछ-कुछ जीवित थी। पत्रकारिता में वे ही लोग आते थे जो समाज को कुछ देने की इच्छा रखते थे, कठिन परिस्थितियों में भी काम कर सकते थे। पारिवारिक जीवन की असुविधाओं को भी झेल सकते थे। तब तथ्य के साथ खिलवाड़ करना गलत माना जाता था। पत्रकारों का काम सच्चाई को सामने लाना और अपनी ओर से कम से कम प्रतिक्रिया देना होता है, लेकिन धीरे-धीरे पत्रकारिता में व्यापार का तत्व बढ़ने लगा। अखबारों का उत्पादन महंगा हो गया। इसका असर पत्रकारिता पर पड़ा। संचालक व मालिक मानने लगे कि समाचार पत्र उद्योग है और इसका काम पैसा कमाना है। पैसा कमाने के लिए लोगों को आकर्षित करना होता है जिसके चलते पत्रकारिता में एक शब्द आया इन्फोटेन्मेंट या सूचनारंजन। इसमें भी धीरे-धीरे सूचना तत्व कम होता गया और मनोरंजन का तत्व बढ़ता गया। इसीलिए सच्चाई और तथ्य पिछड़ते गए। सामान्य पत्रकार और संपादक भी तथ्यों के साथ खिलवाड़ करने की छूट पाने लगे। एक और महत्वपूर्ण बात इसी बीच हुई-टेलीविजन का प्रसार। किसी जमाने में अखबारी भाषा को दूसरे दर्जे की भाषा कहा जाता था। जर्नलिस्टिक लैंग्वेज को हल्का-फुल्का माना जाता था जिसे टेलीविजन ने और हल्का कर दिया। भाषा तथ्यों पर आधारित न होकर अतिरंजना पर आधारित हो गई। पत्रकारिता ग्लैमर का व्यवसाय बन गई, ऐसे व्यवसाय में पैसे का लोभ होना स्वाभाविक है, इसीलिए पत्रकारिता समाजोन्मुख नहीं रह गई है।

प्रश्न 3 जम्मू-कश्मीर पर आपने गहन अध्ययन किया है। क्या आपको लगता है कि देश के अन्य भागों में रहने वाले नागरिकों को वहां की वास्तविक जानकारी समाचार पत्रों व चैनलों के माध्यम से हो पा रही है, अगर नहीं तो क्या और कैसे होना चाहिए ?

उत्तर- मीडिया व्यापक समाज हित से कट गया है। बड़े अखबार केवल उन्हीं पाठकों तक पहुंचना चाहते है जो पाठक महंगे संसाधनों को खरीद सकते हैं और जिनके कारण बड़े-बड़े विज्ञापन प्राप्त हो सकते हैं। जिन्हें हम राष्ट्रीय समाचार पत्र कहते हैं उनमें इस बात की होड़ होती है कि वह अधिक से अधिक आर्थिक रूप से संपन्न शहरी खरीदारों को ही जुटाएं। स्पष्ट है कि समाचार देते वक्त या घटनाओं पर अपना मत व्यक्त करते समय ऐसे ही पाठकों या वर्गों का हित सर्वोपरि होता है। इस तरह समाचार देने से पूरे देश के संदर्भ में हो रही घटनाओं का सही-सही चित्रण संभव नहीं है। जम्मू-कश्मीर के सिलसिले में समाचार पत्रों में अधिकतर उन ही वर्गों और गुटों के बारे में समाचार आते हैं जो हिंसा का सहारा लेते हैं, जो नकारात्मक गतिविधियों में लिप्त हैं या जो चैंकाने वाले बयान देते हैं। इस तरह जो चित्र बनता है वो न तो पूरा होता है, न सच्चा। जम्मू-कश्मीर के बारे में मीडिया की भूमिका अक्सर उत्तरदायित्वपूर्ण नहीं रही है जिससे देश के अन्य क्षेत्रों के लोगों में अनेक तरह की भ्रांतियां पैदा हो गई हैं।

प्रश्न 4 जम्मू-कश्मीर की ऐसी क्या स्थिति है जो मीडिया द्वारा सामने नहीं लाई जा रही है ?

उत्तर- जम्मू-कश्मीर में कई तरह के लोग रहते हैं। उत्तर-पष्चिमी पहाड़ों में लद्दाख का बहुत बड़ा क्षेत्र है जहां का प्रमुख धर्म बौद्ध धर्म है। दक्षिण में जम्मू का विशाल क्षेत्र है। घाटी और जम्मू की पहाडि़यों में गुजर और बकरवाल रहते हैं। कश्मीर घाटी में भी दो मुस्लिम संप्रदाय के लोग हैं- शिया और सुन्नी। इन सब में केवल सुन्नी संप्रदाय का एक वर्ग भारत विरोधी गतिविधियों में सक्रिय है और कुछ लोग हिंसक राजनीति कर रहे हैं। यानि पूरे राज्य की आबादी के 10 प्रतिशत लोगों की गतिविधियां ही मीडिया की रूचि का विषय है। शेष सभी वर्गों की आवाज अनसुनी कर दी जाती है।

प्रश्न 5 जम्मू-कश्मीर की स्थानीय मीडिया के बारे में आपकी क्या राय हैं ?

उत्तर- जम्मू-कश्मीर की त्रासदी है कि कष्मीरी भाषा की कोई लिपि नहीं है। जो प्राचीन लिपि थी, वह शारदा कहलाती थी। आजादी के बाद वहां के सत्ताधारियों ने उर्दू, फारसी पर आधारित एक लिपि का विकास किया लेकिन यह लिपि अवैधानिक होने के कारण नहीं चल पाई। परिणामतः प्राचीन और संपन्न होने के बावजूद कश्मीरी में लोकप्रिय पत्रकारिता पनप नहीं पा रही। वर्तमान समय में जितने भी समाचार पत्र वहां छप रहे हैं वह उर्दू या अंग्रेजी भाषा में हैं। इसीलिए आम लोगों तक पत्रकारिता नहीं पहुंच पा रही है।

प्रश्न 6 जम्मू-कश्मीर के समाचार पत्रों का क्या दृष्टिकोण हैं ?

उत्तर- वहां भी पत्रकारिता का वही रूप है जो देश में है। अलग-अलग हितों के पत्र-पत्रिकाएं मौजूद हैं। कुछ अलगाववादियों का समर्थन करते हैं, तो कुछ राष्ट्रीय दृष्टिकोण को सामने लाते हैं। इनमें भी क्षेत्रीय विभिन्नता है। कश्मीर की पत्र-पत्रिकाएं अलगाववाद से प्रभावित है जबकि जम्मू में राष्ट्रीय पक्ष को प्रमुखता दी जाती है।

प्रश्न 7 वर्तमान विदेश नीति को आप किस प्रकार देखते हैं ?

उत्तर- वर्तमान विदेश नीति में किसी सकारात्मक पहल का सर्वथा अभाव है। विदेश नीति किसी देश की सुरक्षा नीति का आयाम होती है, लेकिन दुर्भाग्य से इस समय भारत चारों ओर से ऐसे देशों से घिरा हुआ है जो शत्रुवत व्यवहार कर रहे हैं। बड़े देशों की बात तो अलग नेपाल, बांग्लादेश जैसे छोटे देश भी भारत के हितों के विपरीत नीतियां अपना रहे हैं। यह हमारी विदेश नीति की असफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है कि भारत अपने ही आंगन में अकेला पड़ गया है।

प्रश्न 8 पत्रकारिता और बाजार के बीच संबंधों पर आपने गहन अध्ययन किया है। आपकी राय में बाजार किस तरह पत्रकारिता को प्रभावित कर रहा है ?

उत्तर- पत्रकारिता बाजार का ही हिस्सा है। जिस समय पत्रकारिता एक मिशन थी, उस समय पत्रकार एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हुआ करता था। अब महंगी टेक्नोलाजी और व्यापक प्रसार संख्या के कारण मीडिया पर पूंजीपतियों और व्यापारिक निगमों का वर्चस्व हो गया है। इसलिए आज के उपभोक्ता समाज में मीडिया बाजार पर न केवल आश्रित है बल्कि बाजार के हितों का संरक्षण करती है।

प्रश्न 9 प्रधानमंत्री मनामोहन सिंह ने मीडिया पर आरोप लगाया है कि मीडिया देश की समस्याओं को लेकर जज की भूमिका अदा कर रहा है। क्या सरकार मीडिया पर नियंत्रण करने की कोशिश कर रही है ?

उत्तर- सरकार को मीडिया पर नियंत्रण करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि सरकार जिस उपभोक्तावाद का स्वयं प्रसार कर रही हैं उसी उपभोक्तावाद का माध्यम देश के अखबार भी है। सरकार इस बात को समझती है कि मीडिया को परोक्ष रूप से प्रभावित करना आसान है लेकिन प्रत्यक्ष नियंत्रण सरकार के लिए भी खतरनाक हो सकता है।

प्रश्न 10 व्यवस्था परिवर्तन को लेकर देशभर में चल रही बहस पर मीडिया के नजरिए को आप किस परिप्रेक्ष्य में देखते हैं ?

उत्तर- व्यवस्था परिवर्तन मीडिया के लिए एक खबर है। वर्तमान व्यवस्था को बदलने की न तो मीडिया में इच्छा है और न ही क्षमता।

प्रश्न 11 ‘न्यूज आफ द वर्ल्ड साप्ताहिक पत्र के बंद होने की घटना को मूल्य आधारित पत्रकारिता की समाप्ति की घोषणा मान सकते है ?

उत्तर- ऐसी सारी पत्रिकाओं के बंद होन से ये तो पता लगता ही है कि मुनाफे के इस व्यापार में केवल सामाजिक दायित्व का काम करना कितना कठिन हो गया है।

प्रश्न 12 आपके विचार में भारत की भावी दिषा क्या होनी चाहिए और यह कैसे संभव है ?

उत्तर- जब 1947 में हमारा देश आजाद हुआ तो हमने अपनी दिशा तय नहीं की क्योंकि हमने ऐसी व्यवस्था अपना ली जो पहले से बनी हुई थी। हम लगभग उसी दिशा में चल रहे थे जिसमें आजादी से पहले चलते थे। इसीलिए अगर देश को बदलना है तो यह मानकर चलना होगा कि जिस तरह की व्यवस्था अपनानी है वह यहीं की परिस्थितियों, यहीं की मनीषा और यहीं के सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित हो सकती हैं। दिशाएं स्वयं बनाई जाती हैं, आयातित नहीं होती।

नेहा जैन, अगस्त अंक, २०११

दाम मजदूर से कम, काम मालिक की निगरानी

पत्रकारिता के प्रारम्भिक दौर में इसे अभिव्यक्ति के साथ-साथ जनजागरण का माध्यम माना जाता था। किन्तु वर्तमान परिवेश में बदल रही पत्रकारिता की दिशा और दशा दोनों ही चिन्ता का विषय बनते जा रहें हैं। पत्रकारिता जगत में हो रहे इस परिवर्तन में कौन सी प्रक्रिया उचित है? इसके बारे में हम यहां राष्ट्रदेव पत्रिका के संपादक श्री अजय मित्तल जी से उनके विचार जानने का प्रयास कर रहें हैं-

प्रश्न 1 आपका पत्रकारिता के क्षेत्र में आने का क्या उद्देश्य रहा ?

उत्तर- पत्रकारिता चुनौतिपूर्ण व्यवसाय है। जो सत्ता सारी व्यवस्थाओं की निगरानी करती है, उसकी भी निगरानी करने का दायित्व पत्रकार का है। इसीलिए समाज को कुछ वैचारिक बदल की ओर अग्रसर करने के लिए मैंने पत्रकारिता को चुना जिससे आम लोग समाज में सकारात्मक परिवर्तन के लिए अपना योगदान दे सकें।

 प्रश्न 2 वर्तमान समय में आप पत्रकारिता के क्षेत्र में क्या बदलाव देखते है ?

उत्तर- आज पत्रकारिता अपने मार्ग से भटक रही है। पत्रकारिता के आधार पर प्राप्त शक्तियों का पत्रकार दुरूपयोग कर रहे हैं। पहले पत्रकार देश में हो रहे घपलों, घोटालों व भ्रष्टाचार को उजागर करते थे लेकिन अब वह इसका हिस्सा बन रहे हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में जिस तरह शीर्ष पत्रकारों का नाम आया उससे पत्रकार की गरिमा पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में सभी स्तरों के पत्रकार प्रेस को प्राप्त अधिकारों को अपने विशेषाधिकार समझने लगे हैं और इसका दुरुपयोग कर रहे हैं। स्वयं की सहूलियत के लिए पत्रकार ऐसा करते हैं। उनमें अब समाज के दिशा निर्देशक के बजाए राजनेता के गुण आ रहे हैं।

प्रश्न 3 राष्ट्रीय महत्व के मुददों पर मीडिया की भूमिका और प्रभाव को आप किस प्रकार से देखते हैं?

उत्तर- सामान्य आदमी के पास न तो तथ्यों की जानकारी होती है और न ही विश्लेषण क्षमता। तथ्य और उनका विश्लेषण वह मीडिया से ही प्राप्त करता है। मीडिया ने आम आदमी की इसी कमजोरी का लाभ उठाकर अपनी इच्छानुसार तथ्यों और विश्लेषणों को प्रस्तुत करना और उसके अनुसार समाज को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। मीडिया को अगर भ्रष्टाचार से कुछ प्राप्त होने की उम्मीद होती है तो वह तथ्यों में बदलाव कर देती है या उसे खत्म ही कर देती है। वहीं मीडिया को यदि कुछ निजी लाभ नहीं मिलता तो वह उन्हीं तथ्यों को खोजी पत्रकारिता का नाम दे देती है। ऐसे पत्रकार अपने प्रभाव का दुरुपयोग कर समाज को अधूरे तथ्य, अर्द्ध-सत्य, असत्य बताकर पत्रकारिता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

 प्रश्न 4 आपकी पत्रिका राष्ट्रदेव ग्रामीण क्षेत्रों में जाती है। ग्रामीण पाठकों के बारे में आपका क्या अनुभव रहा है?

उत्तर- ग्रामीण पाठक देश की समस्याओं के बारे में जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। वह अपने स्थानीय परिवेश से बाहर जाकर राष्ट्र स्तर पर विचार करना चाहते हैं, देश के इतिहास, महापुरूषों को जानना चाहते हैं। वह पत्रिका के राष्ट्रीय विचारों का बड़ी संख्या में स्वागत करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के पाठकों के बीच किए गए सर्वे के दौरान पता चला कि वह देश के बारे में सोचने की ललक रखते हैं और इसीलिए वह राष्ट्रीय विचारों को पढ़ना भी पसंद करते हैं।

 प्रश्न 5 आप अपनी पत्रिका के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना जगाने का प्रयास करते रहे हैं। क्या आज का मीडिया राष्ट्रवाद के प्रश्न पर अपनी भूमिका का निर्वाह सही ढंग से कर रहा है?

उत्तर- राष्ट्रीय भाषाओं में प्रकाशित होने वाले पत्रों का स्वर राष्ट्रहित के अनुकूल है। अंग्रेजी मीडिया भारतीय परिवेश व संस्कृति को नहीं समझती। वह देश की समस्याओं और यहां के परिवेश को पश्चिमी चश्मे से निहारती है और विश्लेषण प्रस्तुत करती है। अक्सर यह देखा गया है कि जो अखबार राष्ट्रवाद के समर्थक थे उनकी प्रसार संख्या में अच्छी वृद्धि हुई है और जिन्होंने पंथ-निरपेक्षता के नाम पर राष्ट्रवाद को गिराने का कार्य किया वह ज्यादा नहीं चल पाए।

प्रश्न 6 वर्तमान समय में व्यवस्था परिवर्तन को लेकर चल रहे आंदोलनों के परिप्रेक्ष्य में जनजागरण के विषय पर मीडिया की भूमिका कितनी उपयोगी साबित हुई है?

उत्तर- चाहे अन्ना का आंदोलन हो या बाबा रामदेव का सौभाग्य से मीडिया ने अच्छा प्रदर्शन किया। मीडिया ने अच्छे पक्षों को लगभग ठीक प्रकार से प्रस्तुत किया। इसीलिए राजनेताओं ने इन आंदोलनों को बदनाम करने के लिए कार्रवाई की। मीडिया इस समय व्यवस्था परिवर्तन के मुद्दे पर लगभग समान और अनुकूल विचार रख रहा है।

 प्रश्न 7 आप उत्तर प्रदेश पत्रकार एसोसिएशन मेरठ के अध्यक्ष हैं। पत्रकारों की कौन सी प्रमुख समस्याएं हैं, जिनको लेकर पत्रकार को लड़ाई लड़ने की आवश्यकता पड़ती है?

उत्तर- पत्रकारों, विशेषकर जो छोटे और मंझले पत्रों में काम कर रहे हैं, के सामने सबसे बड़ी समस्या वेतन की है। छोटे अखबारों में तो वेतन सरकार द्वारा अकुशल कर्मियों के लिए निर्धारित न्यूनतम मजदूरी दर से भी कम है। छोटे अखबारों में पत्रकारों को मिट्टी ढोनेवाले मजदूरों को मिलने वाले वेतन से भी आधा वेतन मिलता है। जबकि पत्रकारों की बड़ी संख्या इन्हीं छोटे एवं मंझले समाचार पत्रों व चैनलों में कार्यरत हैं। वहीं पत्रकारों के लिए काम के घंटे भी बहुत अधिक है जिसके कारण वह न तो अपना श्रेष्ठतम योगदान दे सकते हैं और न ही उन्हें अध्ययन के लिए समय मिल पाता है। यह स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। इसके अलावा पत्रकारों के बेहतर भविष्य के लिए बीमा जैसी योजनाएं भी होनी चाहिए। आज यह आवश्यक है कि पत्रकार आर्थिक रूप से इस लायक तो हो कि वह वर्तमान और भविष्य की चिंता से मुक्त रह सकें।

 प्रश्न 8 जेडे हत्याकांड से एक बार फिर पत्रकारों की सुरक्षा का मुददा सामने आया है। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए आपके अनुसार क्या कदम उठाए जाने चाहिए?

उत्तर- पत्रकारों के लिए सुरक्षा नीति बनाए जाने की आवश्यकता है। यह संभव नहीं है कि हरेक पत्रकार के साथ एक अंगरक्षक चल सके लेकिन इसके लिए बेहतर कानून होना चाहिए। राज्य स्तर पर कर्मचारियों के काम में बाधा डालने वाले पर कार्रवाई का कानून बना हुआ है, लेकिन पत्रकार को उसके काम के लिए धमकी अथवा रूकावट को इस कानून के दायरे में नहीं लिया जाता। पत्रकारों के विरूद्ध आपराधिक मामले की जांच भी जिले के एसपी स्तर के अधिकारी की देखरेख में होनी चाहिए क्योंकि छोटे स्तर के पुलिस अधिकारियों तक अपराधियों की पहुंच होती है। यह जिला स्तर का पुलिस अधिकारी पत्रकार-संबंधी किसी भी मामले की जांच की जानकारी राज्य शासन को भी नियमित भेजे।

प्रश्न 9 वर्तमान समय में किस पत्रकार की पत्रकारिता आपको आदर्श पत्रकारिता के सबसे निकट दिखाई देती है?

उत्तर- पत्रकारिता क्षेत्र सेवा क्षेत्र है। पांचजन्य समाचार पत्र आज कम वेतन में भी समाज को सर्वोत्कृष्ट दे रहा है। आजादी से पहले बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसे पत्रकारों की पत्रकारिता बड़ी आदर्श थी। उन्होंने अपने समाचार पत्र आज, और रणभेरी में अंग्रजों के खिलाफ जमकर लिखा और किसी भी प्रकार के प्रलोभन में नहीं आए। मेरे विचार में वर्तमान समय में ऐसी ही पत्रकारिता की आवश्यकता है जैसी पराड़कर जी के द्वारा की गई थी। वैसे तो हिन्दी पत्रकारिता की नींव ही त्याग, बलिदान और संघर्ष पर रखी गई थी। आदि संपादक जुगल किशोर शुक्ल ने अपने उदंत मार्तण्ड नामक हिंदी के प्रथम पत्र को सरकारी प्रलोभनों से दूर रखकर आर्थिक कठिनाइयों से ही चलाया। आज के पत्रकार को इन उदाहरणों को भूलना नहीं चाहिए।

नेहा जैन, जुलाई अंक, २०११

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