संवादसेतु

मीडिया का आत्मावलोकन…

Archive for the category “संस्मरण”

साहित्यिक पत्रकारिता के ‘अमृत‘ विद्यानिवास मिश्र

                                                                                                    viya nivas mishra
हिंदी पत्रकारिता को शिखर तक पहुंचाने में हिंदी साहित्य और साहित्यकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारतीयता, भारतीय संस्कृति और सनातन संस्कृति के प्रवाह को जीवंत बनाए रखने में हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता ने अपना अथक योगदान दिया है। आज के दौर में हिंदी पत्रकारिता जिस प्रकार साहित्य से विलग दिखाई पड़ती है, ऐसी पहले न थी बल्कि एक वक्त तो ऐसा भी था, जब साहित्य और पत्रकारिता एक-दूसरे का सहारा बन आगे बढ़ रहे थे। हिंदी पत्रकारिता को उसका ध्येय पथ दिखलाने का कार्य समय-समय पर ऐसे पत्रकारों ने किया, जो साहित्य की विधा में भी सिद्धहस्त थे। भारतेंदु हरीशचंद्र, माखनलाल चतुर्वेदी, हनुमान प्रसाद पोद्दार, महावीर प्रसाद, हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि इसी कड़ी के नाम हैं, जिन्होंने हिंदी की लड़ाई लड़ी। साहित्य और पत्रकारिता की इस विरासत को बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में प्रवाहमय बनाए रखने का कार्य किया विद्यानिवास मिश्र ने। मिश्र जी हिंदी साहित्य, परंपरा, संस्कृति के मर्मज्ञ थे।
हिंदी पत्रकारिता और साहित्य के बेहतरीन और कारगर सम्मिश्रण की मिसाल पेश करने वाले विद्यानिवास मिश्र ने पत्रकारिता के माध्यम से भारतीयता को मुखरता प्रदान की। सन 1926 में गोरखपुर के पकड़डीहा गांव में जन्मे विद्यानिवास मिश्र अपनी बोली और संस्कृति के प्रति सदैव आग्रही रहे। सन 1945 में प्रयाग विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर एवं डाक्टरेट की उपाधि लेने के बाद उन्होंने अनेकों वर्षों तक आगरा, गोरखपुर, कैलिफोर्निया और वाशिंगटन विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया। विद्यानिवास मिश्र देश के प्रतिष्ठित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय एवं काशी विद्यापीठ के कुलपति भी रहे। इसके बाद अनेकों वर्षों तक वे आकाशवाणी और उत्तर प्रदेश के सूचना विभाग में कार्यरत रहे। हिंदी साहित्य के सर्जक विद्यानिवास मिश्र ने साहित्य की ललित निबंध की विधा को नए आयाम दिए। हिंदी में ललित निबंध की विधा की शुरूआत प्रतापनारायण मिश्र और बालकष्ण भटट ने की थी, किंतु इसे ललित निबंधों का पूर्वाभास कहना ही उचित होगा। ललित निबंध की विधा के लोकप्रिय नामों की बात करें तो हजारी प्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र एवं कुबेरनाथ राय आदि चर्चित नाम रहे हैं। लेकिन यदि लालित्य और शैली की प्रभाविता और परिमाण की विपुलता की बात की जाए तोविद्यानिवास मिश्र इन सभी से कहीं अग्रणी रहे हैं। विद्यानिवास मिश्र के साहित्य का सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्सा ललित निबंध ही हैं। उनके ललित निबंधों के संग्रहों की संख्या भी 25 से अधिक होगी।
लोक संस्कृति और लोक मानस उनके ललित निबंधों के अभिन्न अंग थे, उस पर भी पौराणिक कथाओं और उपदेशों की फुहार उनके ललित निबंधों को और अधिक प्रवाहमय बना देते थे। उनके प्रमुख ललित निबंध संग्रह हैं- राधा माधव रंग रंगी, मेरे राम का मुकुट भीग रहा है, शैफाली झर रही है, चितवन की छांह, बंजारा मन, तुम चंदन हम पानी, महाभारत का काव्यार्थ, भ्रमरानंद के पत्र, वसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं और साहित्य का खुला आकाश आदि आदि। वसंत ऋतु से विद्यानिवास मिश्र को विशेष लगाव था, उनके ललित निबंधों में ऋतुचर्य का वर्णन उनके निबंधों को जीवंतता प्रदान करता था। वसंत ऋतु पर लिखे अपने निबंध संकलन फागुन दुइ रे दिना में वसंत के पर्वों को व्याख्यायित करते हुए, अपना अहंकार इसमें डाल दो शीर्षक से लिखे निबंध में वे शिवरात्रि पर लिखते हैं-

‘‘शिव हमारी गाथाओं में बड़े यायावर हैं। बस जब मन में आया, बैल पर बोझा लादा और पार्वती संग निकल पड़े, बौराह वेश में। लोग ऐसे शिव को पहचान नहीं पाते। ऐसे यायावर विरूपिए को कौन शिव मानेगा ? वह भी कभी-कभी हाथ में खप्पर लिए। ऐसा भिखमंगा क्या शिव है ?”


इसके बाद इन पंक्तियों को विवेचित करते हुए विद्यानिवास मिश्र लिखते हैं-

‘‘हां, यह जो भीख मांग रहा है, वह अहंकार की भीख है। लाओ, अपना अहंकार इसमें डाल दो। उसे सब जगह भीख नहीं मिलती। कभी-कभी वह बहुत ऐश्वर्य देता है और पार्वती बिगड़ती हैं। क्या आप अपात्र को देते हैं ? शिव हंसते हैं, कहते हैं, इस ऐश्वर्य की गति जानती हो, क्या है ? मद है। और मद की गति तो कागभुसुंडि से पूछो, रावण से पूछो, बाणासुर से पूछो।”

इन पंक्तियों का औचित्य समझाते हुए मिश्र जी लिखते हैं-

‘‘पार्वती छेड़ती हैं कि देवताओं को सताने वालों को आप इतना प्रतापी क्यों बनाते हैं ? शिव अट्टाहास कर उठते हैं, उन्हें प्रतापी न बनाएं तो देवता आलसी हो जाएं, उन्हें झकझोरने के लिए कुछ कौतुक करना पड़ता है।”


यह मिश्र जी की अपनी उद्भावना है, प्रसंग पौराणिक हैं, किंतु वर्तमान पर लागू होते हैं। पुराण कथाओं का संदर्भ देते हुए विद्यानिवास मिश्र ने साहित्य के पाठकों को भारतीय संस्कति का मर्म समझाने का प्रयास किया है। उनके ललित निबंधों में जीवन दर्शन, संस्कृति, परंपरा और प्रकति के अनुपम सौंदर्य का तालमेल मिलता है। इस सबके बीच वसंत ऋतु का वर्णन उनके ललित निबंधों को और अधिक रसमय बना देता है। ललित निबंधों के माध्यम से साहित्य को अपना योगदान देने वाले विद्यानिवास हिंदी की प्रतिष्ठा हेतु सदैव संघर्षरत रहे, मारीशस से सूरीनाम तक अनेकों हिंदी सम्मेलनों में मिश्र जी की उपस्थिति ने हिंदी के संघर्ष को मजबूती प्रदान की। हिंदी की शब्द संपदा, हिंदी और हम, हिंदीमय जीवन और प्रौढ़ों का शब्द संसार जैसी उनकी पुस्तकों ने हिंदी की सम्प्रेषणीयता  के दायरे को विस्तृत किया। तुलसी और सूर समेत भारतेंदु, अज्ञेय, कबीर, रसखान, रैदास, रहीम और राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं को संपादित कर उन्होंने हिंदी के साहित्य को विपुलता प्रदान की।

         विद्यानिवास जी कला एवं भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ थे। खजुराहो की चित्रकला का सूक्ष्मता और तार्किकता से अध्ययन कर उसकी नई अवधारणा प्रस्तुत करने वाले विद्यानिवास मिश्र ही थे। अकसर भारतीय चिंतक विदेशी विद्वानों से बात करते हुए खजुराहो की कलाकृतियों को लेकर कोई ठोस तार्किक जवाब नहीं दे पाते थे। विद्यानिवास जी ने अपने विवेचन के माध्यम से खजुराहो की कलाकृतियों की अवधारणा स्पष्ट करते हुए लिखा है-

‘‘यहां के मिथुन अंकन साधन हैं, साध्य नहीं। साधक की अर्चना का केंद्रबिंदु तो अकेली प्रतिमा के गर्भग्रह में है। यहां अभिव्यक्ति कला रस से भरपूर है। जिसकी अंतिम परिणति ब्रहम रूप है। हमारे दर्शन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की जो मान्यताएं हैं, उनमें मोक्ष प्राप्ति से पूर्व का अंतिम सोपान है काम।”

 उन्होंने कहा कि यह हमारी नैतिक दुर्बलता ही है कि खजुराहो की कलाकृतियों में हम विकृत कामुकता की छवि पाते हैं। स्त्री पुरूष अनादि हैं, जिनके सहयोग से ही सृष्टि जनमती है।सन 1990 के दशक में मिश्र जी ने नवभारत टाइम्स के संपादक के रूप में जिम्मेदारी संभाली। उदारीकरण के दौर में खांटी हिंदी पत्रकारिता को आगे बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण पत्रकारों में से एक मिश्र जी ने नवभारत टाइम्स को हिंदी के प्रतिष्ठित समाचार पत्र के रूप में नई पहचान दिलाई। पत्रकारीय धर्म और उसकी सीमाओं को लेकर वे सदैव सचेत रहते थे। वे अकसर कहा करते थे कि-

‘‘मीडिया का काम नायकों का बखान करना अवश्य है, लेकिन नायक बनाना मीडिया का काम नहीं है।” 

अपने पत्रकारीय जीवन में भी विद्यानिवास मिश्र हिंदी के प्रति आग्रही बने रहे। वे अंग्रेजी के विद्वान थे, लेकिन हिंदी लिखते समय अंग्रेजी के शब्दों का घालमेल उन्हें पसंद नहीं था। उन्होंने नवभारत टाइम्स के संपादक की जिम्मेदारी ऐसे वक्त में संभाली, जब हिंदी पत्रों के मालिक उदारीकरण के बाद बाजारू दबाव में हिंदी में अंग्रेजी के घालमेल का प्रयास कर रहे थे। अखबार मालिकों की मान्यता थी कि युवा पाठकों को यदि लंबे समय तक पत्र से जोड़े रखना है, तो हिंदी में अंग्रेजी शब्दों को जबरदस्ती ही सही घुसाना ही होगा। नवभारत टाइम्स के मालिक समीर जैन की भी यही मान्यता थी कि हिंदी समाचार पत्रों में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग होना वक्त की जरूरत है।  इन्हीं वाद-विवादों के बीच उन्होंने नवभारत टाइम्स के संपादक की जिम्मेदारी से स्वयं को मुक्त कर लिया, किंतु हिंदी में घालमेल को लेकर वे  कभी राजी नहीं हुए। हालांकि विद्यानिवास जी केनवभारत टाइम्स छोड़ने के बाद यह पत्र उसी राह पर आगे बढ़ा, जिस पर इसके मालिक समीर जैन ले जाना चाहते थे। विद्यानिवास जी ने नवभारत टाइम्स से अलग होने के बाद साहित्य अमृत पत्रिका का संपादन किया। व्यावसायिकता के बाजारू दौर में साहित्य अमृत पत्रिका ने विद्यानिवास जी के संपादकत्व में बतौर साहित्यिक पत्रिका नए मानक स्थापित किए। साहित्य अमृत का सौवां अंक भी विद्यानिवास जी के समय ही निकला था। पत्रिका के सौवें अंक के संपादकीय में संकल्पपूर्ण शब्दों में लिखा था-
‘‘हमें इतना परितोष है कि हम साहित्य अमृत पत्रिका को साहित्य की निरंतरता का मानदंड बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं।” 
                                                                                          sahitya-amrit
साहित्य अमृत पत्रिका ऐसे वक्त में जब पत्रकारीय मूल्य अन्य स्तंभों की भांति ही ढलान पर हों, बाजार के दबाव में आए बिना भारतीय संस्कृति के महत्व को उद्घाटित करती रही है। सौवें अंक के संपादकीय में भारतीयता का उद्घोष करते हुए विद्यानिवास मिश्र ने जयशंकर प्रसाद की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए लिखा-
‘‘किसी का हमने छीना नहीं, प्रकति का रहा पालना यही, हमारी जन्मभूमि थी यही, कहीं से हम आए थे नहीं।”

मिश्र जी साहित्य अमृत पत्रिका का संपादन अंतिम समय तक करते रहे। साहित्य अकादमी पुरस्कार, कालिदास पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्म विभूषण, पद्मश्री और अनेकों उपाधियों से सम्मानित विद्यानिवास मिश्र का 14 फरवरी, 2005 का सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया। उस वर्ष उनका प्रिय पर्व वसंत पंचमी 13 फरवरी को था। वसंत ऋतु में ही वे अपना शरीर त्यागकर इहलोक की यात्रा पर निकल पड़े। पं. विद्यानिवास मिश्र के इस दुनिया से जाने के बाद भी उनकी पत्रकारिता और साहित्य की सौरभ इस रचनाशील जगत को महकाती रहेगी।

 

Advertisements

भाषायी पत्रकारिता के संस्थापक राजा राममोहन राय

राजा राममोहन राय! यह नाम एक प्रखर एवं प्रगतिशील व्यक्तित्व का नाम है, जिन्होंने भारत में भाषायी प्रेस की स्थापना का ऐतिहासिक कार्य किया। राजा राममोहन राय को भारतीय पुनर्जागरण एवं सामाजिक आंदोलनों का प्रणेता भी कहा जाता है। उन्होंने तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरूद्ध जनजागरण का कार्य किया, जो तत्कालीन समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता थी। राजा राममोहन राय ने सामाजिक और राष्ट्रव्यापी जनजागरण कार्य पत्रकारिता के माध्यम से ही किया था। उन्होंने पत्रकारिता को जनजागरण के सशक्त माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया था। उनके द्वारा चलाए गए सामाजिक आंदोलन और पत्रकारिता एक-दूसरे के पूरक थे। उनकी पत्रकारिता सामाजिक आंदोलन को मजबूती प्रदान करती थी।

राजा राममोहन राय का जन्म राधानगर, बंगाल में 22 मई, 1772 को कुलीन ब्राहमण परिवार में हुआ था। उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जो धार्मिक विविधताओं से परिपूर्ण था। उनकी माता शैव मत में विश्वास करती थीं एवं पिता वैष्णव मत में, जिसका उनके जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा। सामाजिक परिवर्तनों के प्रणेता और आधुनिक भारत के स्वप्नदृष्टा राजा राममोहन राय ने संवाद कौमुदी, ब्रह्मैनिकल मैगजीन, मिरात-उल-अखबार, बंगदूत जैसे सुप्रसिद्ध पत्रों का प्रकाशन किया। राजा राममोहन राय ने सन 1821 में बंगाली पत्र संवाद कौमुदी का कलकत्ता से प्रकाशन प्रारंभ किया। इसके बाद सन 1822 में उन्होंने फारसी भाषा के पत्र मिरात-उल-अखबार और ब्रह्मैनिकल मैगजीन का प्रकाशन किया। यह पत्र तत्कालीन समय में राष्ट्रवादी एवं जनतांत्रिक विचारों के शुरूआती समाचार पत्रों में से थे। इन समाचार पत्रों का उद्देश्य राष्ट्रीय पुनर्जागरण और सामाजिक चेतना ही था। इन समाचार पत्रों के अलावा राजा राममोहन राय ने अंग्रेजी में बंगला हेराल्ड और बंगदूत का भी प्रकाशन किया।

राजा राममोहन राय ने भारत में उद्देश्यपूर्ण पत्रकारिता की नींव डाली थी। उन्होंने अपने द्वारा प्रकाशित किए गए समाचार पत्रों का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहा था कि-

मेरा उद्देश्य मात्र इतना है कि जनता के सामने ऐसे बौद्धिक निबंध उपस्थित करूं जो उनके अनुभव को बढ़ावें और सामाजिक प्रगति में सहायक सिद्ध हों। मैं अपनी शक्ति भर शासकों को उनकी प्रजा की परिस्थितियों का सही परिचय देना चाहता हूं और प्रजा को उनके शासकों द्वारा स्थापित विधि व्यवस्था से परिचित कराना चाहता हूं, ताकि जनता को शासक अधिकाधिक सुविधा दे सकें। जनता उन उपायों से अवगत हो सके जिनके द्वारा शासकों से सुरक्षा पायी जा सके और अपनी उचित मांगें पूरी कराई जा सकें।

राजा राममोहन राय ने भारत की पत्रकारिता की नींव उस समय डाली थी, जब भारत को पत्रकारिता के महत्वपूर्ण अस्त्र की आवश्यकता थी। वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कोलकाता प्रेस क्लब में अपने संबोधन में कहा था-

प्रधानमंत्री ने प्रेस की स्वतंत्रता के संबंध में राजा राममोहन राय के शब्दों को ही उद्धृत करते हुए कहा-

प्रेस की आजादी के बिना दुनिया के किसी भी हिस्से में क्रांति नहीं हो सकती है।

प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर मौजूदा दौर में आवाजें उठती रहती हैं। प्रेस की स्वतंत्रता की लड़ाई का आरंभ राजा राममोहन राय ने 19वीं सदी में ब्रिटिश शासन से टकराव लेकर किया था। उनका मानना था कि समाचारपत्रों पर सरकार का नियंत्रण नहीं होना चाहिए और सच्चाई सिर्फ इसलिए नहीं दबा देनी चाहिए कि वह सरकार को पसंद नहीं है। प्रेस की स्वतंत्रता के मुद्दे पर ही इतिहास पर दृष्टि डालते हुए मनमोहन सिंह ने कहा-

जब कोलकाता में प्रेस पर नियंत्रण करने का प्रयास किया गया, तब राजा राममोहन राय ने सरकार के निर्णय की आलोचना करते हुए ब्रिटिश सरकार को ज्ञापन सौंपा।

पत्रकारिता की स्वतंत्रता की ओर ब्रिटिश सरकार का ध्यान आकर्षित करते हुए राजा राममोहन राय ने ब्रिटिश सरकार से कहा-

कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले अधिकतर समाचारपत्र यहां के मूल निवासियों के बीच लोकप्रिय हैं, जो उनमें एक स्वतंत्र चिंतन और ज्ञान की व्याख्या करते हैं। यह समाचार पत्र उनके ज्ञान को बढ़ाने और स्थिति को सुधारने का प्रयत्न कर रहे हैं।

उन्होंने ब्रिटिश सरकार से कहा-

इन समाचारपत्रों के प्रकाशन पर रोक लगाया जाना उचित नहीं है।‘राजा राममोहन राय ने हमेशा ही पत्रकारिता की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया था। उन्होंने सन 1815 से 1830 के कम अंतराल में ही तीस पुस्तकें लिखी थीं। सौमेन्द्र नाथ ठाकुर के अनुसार- बंगाली काव्य जगत ने बंकिम चंद्र चटर्जी और रविन्द्र नाथ टैगोर की कविताओं के माध्यम से जो ऊंचाई प्राप्त की है, उसकी आधारशिला राजा राममोहन राय ने ही रखी थी।

राजा राममोहन राय को आधुनिक भारत का जनक माना जाता है। महान क्रांतिकारी सुभाष चंद्र बोस ने राजा राममोहन के बारे में कहा कि-

राजा राममोहन राय भारतीय पुनर्जागरण के अगुआ थे जिन्होंने भारत में एक मसीहा के रूप में नए युग का सूत्रपात किया।

राजा राममोहन राय की अंग्रेजी शासन और अंग्रेजी भाषा के प्रशंसक होने के कारण आलोचना की जाती रही है। उनकी तमाम आलोचनाओं के बाद भी भारत में भाषायी प्रेस की स्थापना और स्वतंत्रता के लिए किए गए उनके योगदान को भाषायी पत्रकारिता के इतिहास में भुलाया नहीं जा सकता है। राजा राममोहन राय अपनी मृत्यु से कुछ वर्ष पूर्व ब्रिटेन में जा बसे थे जहां 27 सितंबर, 1833 को ब्रिस्टल (इंग्लैण्ड) में उनका निधन हो गया।

सूर्यप्रकाश, सितम्बर, अंक २०११

 

वैचारिक क्रांति के अग्रदूत: महर्षि अरविंद

महर्षि अरविंद महान योगी, क्रान्तिकारी, राष्ट्रवाद के अग्रदूत, प्रखर वक्ता एवं पत्रकार के रूप में जाने जाते हैं। महर्षि अरविंद की पत्रकारिता के बारे में देशवासियों को बहुत अधिक जानकारी नहीं रही है, जिसके बारे में जानना नवोदित पत्रकार पीढ़ी के लिए आवश्यक है। महर्षि अरविंद उन पत्रकारों में से एक थे, जिन्होंने समाचार पत्रों के माध्यम से तत्कालीन जनमानस को स्वाधीनता संग्राम के लिए तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। उनका जन्म 15 अगस्त, 1872 में कलकत्ता के एक बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता कृष्णधन घोष कलकत्ता के ख्याति प्राप्त वकील थे, जो पूरी तरह से पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव में थे। महर्षि अरविंद की माता का नाम स्वर्णलता देवी था, पिता के दबाव में माता को भी पश्चिम की सभ्यता के अनुसार ही रहना पड़ता था।

महर्षि अरविंद की शिक्षा-दीक्षा भी अंग्रेजी वातावरण में ही हुई थी। उनके पिता ने उन्हें पांच वर्ष की अवस्था में दार्जिलिंग के लोरेटो कान्वेंट स्कूल में दाखिल करवा दिया, जिसका प्रबंध यूरोपीय लोग करते थे। अरविंद अपने बाल्यकाल के सात वर्षों तक ही भारत में रहे, जिसके पश्चात उनके पिताजी ने उन्हें उनके भाइयों के साथ इंग्लैण्ड भेज दिया जहां मैनचेस्टर के एक अंग्रेज परिवार में उनका पालन-पोषण हुआ।

महर्षि अरविंद ने ब्रिटेन में अपनी शिक्षा सैंट पाल स्कूल और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के किंग्स कालेज में प्राप्त की। पश्चिमी सभ्यता में पले-बढ़े महर्षि अरविंद एक दिन भारतीय संस्कृति के व्याख्याता होंगे, ऐसा शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा। फरवरी 1893 में महर्षि अरविंद भारत लौटे, ब्रिटेन से लौटने के पश्चात उन्होंने बड़ौदा कालेज में अध्यापन कार्य किया। यही वह समय था, जब बंगाल विभाजन के परिणामस्वरूप देश में 1857 के पश्चात क्रांति की ज्वाला एक बार फिर से प्रखर हो रही थी, जिसका केन्द्र कलकत्ता ही था। महर्षि अरविंद बड़ौदा से कलकत्ता भी आते-जाते रहते थे जहां वे क्रांतिकारी गतिविधियों में सहयोग करने लगे।

सन 1907 में अरविंद ने कांग्रेस के क्रांतिकारी संगठन नेशनलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन की अध्यक्षता की। इसी वर्ष अरविंद घोष ने विपिनचंद्र पाल के अंग्रेजी दैनिक वन्दे मातरम में काम करना शुरू कर दिया। महर्षि अरविंद का पत्रकारिता के क्षेत्र में इससे पूर्व ही पदार्पण हो चुका था। उन्होंने पत्रकारिता की शुरूआत सन 1893 में मराठी साप्ताहिक इन्दु प्रकाश से की थी जिसमें उनके नौ लेख प्रकाशित हुए थे। इनमें शुरूआती दो लेख उन्होंने भारत और ब्रिटिश संसद शीर्षक के साथ लिखे थे। इसके बाद 16 जुलाई से 27 अगस्त, 1894 के दौरान उनकी सात लेखों की एक श्रृंखला प्रकाशित हुई थी। वे लेख उन्होंने वन्दे मातरम के रचयिता एवं बांग्ला के महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चटर्जी को श्रद्धांजलि देते हुए लिखे थे। इसके बाद अरविंद की लेखन प्रतिभा के दर्शन बंगाली दैनिक युगांतर में हुए जिसकी शुरूआत मार्च, 1906 में उनके भाई बरिन्द्र और अन्य साथियों ने की। इस पत्र के प्रकाशन पर मई, 1908 में ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया।

इसके बाद महर्षि अरविंद ने अंग्रेजी दैनिक वन्दे मातरम में कार्य किया। इस पत्र में प्रकाशित उनके लेखों ने क्रांति के ज्वार में एक नया तूफान ला दिया। वन्दे मातरम में उनके लेखों के बारे में कहा जाता है कि भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में इतने प्रखर राष्ट्रवादी लेख कभी नहीं लिखे गए। ब्रिटिश सरकार की नीतियों के विरोध में लिखने पर वन्दे मातरम पर राजद्रोह का मुकदमा दायर कर दिया गया। अरविंद को संपादक के रूप में अभियुक्त बनाया गया। इस अवसर पर विपिन चंद्र पाल ने उनका बहुत सहयोग किया। उन्होंने अरविंद को पत्र का संपादक मानने से ही इंकार कर दिया जिसके लिए उन्हें छह माह का कारावास भुगतना पड़ा, परंतु सरकार अरविंद को दोषी नहीं सिद्ध कर पाई। अदालत के द्वारा अरविंद को दोषमुक्त करार दिए जाने पर देशभर में जश्न मनाया गया एवं स्थान-स्थान पर संगोष्ठियां आयोजित हुईं। उनके पक्ष में संपादकीय लिखे गए तथा उन्हें सम्मानित किया गया। अरविंद की पत्रकारिता की लोकप्रियता का ही कारण था कि कलकत्ता के लालबाजार की पुलिस अदालत के बाहर हजारों युवा एकत्र होकर वन्दे मातरम के नारे लगाते थे जहां अरविंद के मामले की सुनवाई चल रही थी। सितंबर 1908 में वन्दे मातरम का प्रकाशन बंद हो गया। इसके बाद उन्होंने 15 जून 1909 को कलकत्ता से ही अंग्रेजी साप्ताहिक कर्मयोगी और 23 अगस्त, 1909 को बंगाली साप्ताहिक धर्म की शुरूआत की जिनका मूल स्वर राष्ट्रवाद ही था। महर्षि अरविंद ने इन दोनों पत्रों में राष्ट्रवाद के अलावा सामाजिक समस्याओं पर भी लिखा। उनके इन पत्रों से विचलित होकर तत्कालीन वायसराय के सचिव ने लिखा था-

सारी क्रांतिकारी हलचल का दिल और दिमाग यही व्यक्ति है, जो ऊपर से कोई गैर कानूनी कार्य नहीं करता और किसी तरह कानून की पकड़ में नहीं आता।

महर्षि अरविंद का लेखन उनके अंतिम समय तक अनवरत चलता रहा। सन 1910 में वे कर्मयोगी, और धर्म को भगिनी निवेदिता को सौंप कर चन्द्रनगर चले गए। इसके बाद वे अन्तः प्रेरणा से पांडिचेरी पहुंचे। वहां भी उन्होंने आर्य अंग्रेजी मासिक पत्रिका की शुरूआत की जिसमें उन्होंने प्रमुख रूप से धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों पर लिखा। आर्य में उनकी अमर रचनाएं प्रकाशित हुईं, जिनमें प्रमुख हैं लाइफ डिवाइन, सीक्रेट आफ योग एवं गीता पर उनके निबंध। महर्षि अरविंद का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय की पत्रकारिता में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 5 दिसंबर 1950 को महर्षि अरविंद देह त्याग कर अनंत में विलीन हो गए। पत्रकारिता में राष्ट्रवादी स्वर को स्थान देने वालों में अरविंद का नाम सदैव उल्लेखनीय रहेगा।

सूर्यप्रकाश, अगस्त अंक, २०११

क्रान्तिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी

गणेश शंकर विद्यार्थी! यह एक नाम ही नहीं बल्कि अपने आप में एक आदर्श विचार है। वह एक पत्रकार होने के साथ-साथ एक महान क्रांतिकारी और समाज सेवी भी थे। पत्रकारिता के नैतिक कर्तव्य को निभाते हुए गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। उनका समस्त जीवन पत्रकारिता जगत के लिए अनुकरणीय आदर्श है। विद्यार्थी जी का जन्म अश्विन शुक्ल 14, रविवार सं. 1947,1890 ई.) को अपने ननिहाल इलाहाबाद के अतरसुइया मुहल्ले में हुआ था। उनकी माता का नाम गोमती देवी तथा पिता का नाम मुंशी जयनारायण था। गणेश शंकर विद्यार्थी मूलतः फतेहपुर(उत्तर प्रदेश) के निवासी थे। उनके पिता ग्वालियर रियासत में मुंगावली के ऐंग्लो वर्नाक्युलर स्कूल के हेडमास्टर थे। गणेश शंकर विद्यार्थी का बाल्यकाल भी ग्वालियर में ही बीता तथा वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई।

विद्यारंभ उर्दू से हुआ और 1905 ई. में भेलसा से अंग्रेजी मिडिल परीक्षा पास की। 1907 ई. में प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में कानपुर से एंट्रेंस परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने इलाहाबाद के कायस्थ पाठशाला कालेज में प्रवेश लिया। उसी समय से पत्रकारिता की ओर झुकाव हुआ और इलाहाबाद के हिंदी साप्ताहिक कर्मयोगी के संपादन में सहयोग देने लगे। सन १९०८ में गणेश शंकर विद्यार्थी ने कानपुर के करेंसी ऑफिस में ३० रुपये मासिक पर नौकरी की, लेकिन एक अंग्रेज अधिकारी से झगड़ा होने के पश्चात् विद्यार्थी जी ने इस नौकरी को त्याग दिया। नौकरी छोड़ने के पश्चात् सन १९१० तक विद्यार्थी जी ने अध्यापन कार्य किया । यही वह समय था जब विद्यार्थी जी ने सरस्वती, कर्मयोगी, स्वराज्य, हितवार्ता आदि पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखना प्रारंभ किया।

सन १९११ में गणेश शंकर विद्यार्थी को सरस्वती पत्रिका में महावीर प्रसाद द्विवेदी के सहायक के रूप में कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। कुछ समय बाद सरस्वती, छोड़कर वह अभ्युदय में सहायक संपादक हुए जहां विद्यार्थी जी ने सितम्बर १९१३ तक अपनी कलम से राष्ट्रीय चेतना की अलख जगाने का कार्य किया। दो ही महीने बाद 9 नवंबर, 1913 को कानपुर से स्वयं अपना हिंदी साप्ताहिक प्रताप के नाम से निकाला। गणेश शंकर विद्यार्थी ने प्रताप के प्रथम अंक में ही यह स्पष्ट कर दिया था कि राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन, सामाजिक आर्थिक क्रांति, राष्ट्रीय गौरव, साहित्यिक सांस्कृतिक विरासत के लिए ही उनकी पत्रकारिता समर्पित है। प्रताप पत्र में अंग्रजों की दमनपूर्ण नीति की मुखर आलोचना के कारण सरकार ने प्रताप का प्रकाशन बंद करवाकर गणेश शंकर विद्यार्थी पर राजद्रोह का मुकदमा लगाकर जेल भेज दिया।

अंग्रेजों की इस दमनपूर्ण कार्रवाई के बाद भी गणेश शंकर विद्यार्थी की राष्ट्रवादी कलम की प्रखरता कम न हो सकी। जेल से छूटने के बाद आर्थिक संकट से जूझते विद्यार्थी जी ने किसी तरह व्यवस्था जुटाई तो 8 जुलाई 1918 को फिर प्रताप की शुरूआत हो गई। प्रताप के इस अंक में विद्यार्थी जी ने सरकार की दमनपूर्ण नीति की ऐसी जोरदार खिलाफत कर दी कि आम जनता प्रताप को मुक्त हस्त से आर्थिक सहयोग करने लगी। इस का परिणाम यह हुआ कि विद्यार्थी जी ने २३ नवम्बर १९१९ से साप्ताहिक प्रताप का प्रकाशन दैनिक समाचार पत्र के रूप में प्रारंभ कर दिया। विद्यार्थी जी के दैनिक पत्र प्रताप का प्रताप ऐसा था कि तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध व्यापक स्तर पर जन-जागरण हुआ। कहा जाता है कि स्वाधीनता आन्दोलन की अग्नि को प्रखर करने वाले समाचार पत्रों में प्रताप का प्रमुख स्थान था।

लगातार अंग्रेजों के विरोध में लिखने से प्रताप की पहचान सरकार विरोधी बन गई और तत्कालीन मजिस्ट्रेट मि. स्ट्राइफ ने अपने हुक्मनामे में प्रताप को ‘बदनाम पत्र’ की संज्ञा देकर जमानत की राशि जब्त कर ली। अंग्रेजों का कोपभाजन बने विद्यार्थी जी को 23 जुलाई 1921 में भी जेल की सजा दी गई परन्तु उन्होंने सरकार के विरुद्ध कलम की धार को कम नहीं किया। विद्यार्थी जी की कलम ने स्वाधीनता आन्दोलन की क्रांति को ही प्रखर नहीं किया, बल्कि पूंजीवाद और सामन्तवाद की जनविरोधी नीतियों का भी अपनी पत्रकारिता के माध्यम से विरोध किया। विद्यार्थी जी वह पत्रकार थे जिन्होंने अपने प्रताप की प्रेस से काकोरी कांड के नायक रामप्रसाद बिस्मिल की जीवनी का प्रकाशन किया। गणेश शंकर विद्यार्थी का प्रताप ही वह पत्र था जिसमें भगत सिंह ने अपने फरारी के दिनों में छद्म नाम से पत्रकारिता की थी। विद्यार्थी जी का सम्पूर्ण पत्रकार जीवन ही राष्ट्रवाद, भारतीय संस्कृति, साम्प्रदायिक सद्भाव को समर्पित रहा।

पत्रकारिता के पुरोधा गणेश शंकर विद्यार्थी साम्प्रदायिकता के भी स्पष्ट विरोधी थे। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी सुनाये जाने पर देशभर में भड़के साम्प्रदायिक दंगों को रोकने में विद्यार्थी जी ने अपना जीवन भी दांव पर लगा दिया। इन्हीं दंगों के दौरान गणेश शंकर विद्यार्थी निस्सहायों को बचाते हुए शहीद हो गए।

गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या के पश्चात् महात्मा गाँधी ने बड़े ही मार्मिक शब्दों में उनको श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि मुझे यह जानकर अत्यंत शोक हुआ कि गणेश शंकर विद्यार्थी अब हमारे बीच नहीं हैं। उनके जैसे राष्ट्रभक्त और स्वार्थहीन व्यक्ति की मृत्यु पर किस संवेदनशील व्यक्ति को कष्ट नहीं होगा।’’

पं जवाहरलाल नेहरु ने दुःख व्यक्त करते हुए कहा यह जानकर अत्यंत दुःख हुआ कि हमारे प्रिय मित्र और राष्ट्रभक्त गणेश शंकर विद्यार्थी की साम्प्रदायिक दंगे में हत्या कर दी गई है। गणेश शंकर की शहादत एक राष्ट्रवादी भारतीय की शहादत है, जिसने दंगों में निर्दोष लोगों को बचाते हुए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया।

कलम का यह सिपाही असमय ही चला गया लेकिन उनकी प्रेरणाएं पत्रकारिता जगत और समस्त देश को सदैव प्रेरित करती रहेंगी। पत्रकारिता जगत के इस अमर पुरोधा को सादर नमन…..

 

सूर्यप्रकाश, जुलाई अंक, २०१२

 

Post Navigation