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मीडिया का आत्मावलोकन…

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आपातकाल की हिन्दी पत्रकारिता का अनुशीलन

25 जून 1975 भारत के इतिहास में एक ऐसा काला दिवस रहा है जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर भय, आतंक और दहशत का माहौल बना दिया। 19 महीनों तक चले आपातकाल के काले बादल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी छाए और इंदिरा गांधी ने प्रेस पर भी सेंसरशिप थोप दी। आपातकाल के चलते पत्रिका के स्वरूप में बड़ा बदलाव देखा गया और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया तानाशाही का शिकार हुआ।

वर्ष 1974 तक पत्रकारिता के माध्यम से सत्ता और सरकार की सर्वत्र आलोचना हो रही थी। देश में भ्रष्टाचार, शैक्षणिक अराजकता, महंगाई और कुव्यवस्था के विरोध में समाचार-पत्रों में बढ़-चढ़ कर लिखा जा रहा था। गुजरात और बिहार में छात्र-आंदोलन ने जनांदोलन का रूप ले लिया था जिसके नेतृत्व का भार लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने अपने कंधों पर ले लिया। उन्होंने पूरे देश में संपूर्ण क्रांति आंदोलन का आह्वान कर दिया था। दूसरी ओर लंबे समय तक सत्ता में बने रहने, सत्ता का केंद्रीयकरण करने, अपने विरोधियो को मात देने और बांग्लादेश बनाने में अपनी अहम भूमिका के कारण इंदिरा गांधी में अधिनायकवादी प्रवृत्तियां बढ़ती चली गईं और जब इलाहबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद अपने-आपको सत्ता से बेदखल होते पाया तो उन्होंने अपने कुछ चापलूसों के परामर्श से आपातकाल की घोषणा का निर्णय ले लिया। 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्षी नेताओं की जनसभा से श्रीमती गांधी घबरा गईं और उन्होंने आपातकाल की घोषणा कर दी।

आपातकाल के दौरान एक ओर जहां सत्ता और सरकार की चापलूसी करने वाले पत्रकार थे, वहीं दूसरी ओर प्रेस की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले पत्रकारों की भी कमी नहीं थी। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर, देवेंद्र स्वरूप, श्याम खोसला, सूर्यकांत बाली, के.आर. मलकानी जैसे पत्रकारों ने तो जेल की यातनाएं भी भोगीं। इसके विपरीत ऐसे पत्रकारों की भी कमी नहीं थी, जिन्होंने सेंसरशिप को स्वीकार किया और रोजी-रोटी के लिए नौकरी को प्राथमिकता दी। यही स्थिति साहित्यकारों के साथ भी थी।

स्वतंत्र भारत में वर्ष 1975 में आपातकाल की घोषणा के साथ ही पत्र-पत्रिकाओं पर सेंसरशिप लगा दी गई, किंतु तमाम प्रतिबंधों के बावजूद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पूरी तरह ग्रहण नहीं लग सका। पत्र-पत्रिकाओं पर सेंसर लगा तो भूमिगत बुलेटिनों ने कुछ हद तक इसकी क्षतिपूर्ति की। कुछ संपादकों ने संपादकीय का स्थान खाली छोड़कर तो कुछ ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में महापुरूषों की उक्तियों को छापकर सरकार का विरोध किया।

सेंसरशिप और अन्य प्रतिबंधों के कारण सरकार और समाज के बीच सूचनाओं का प्रसारण इकतरफा हो रहा था। सरकार की घोषणाओं और तानाशाही रवैये की खबर तो किसी न किसी रूप में जनता तक पहुंच जाती थी, किंतु जनता द्वारा आपातकाल के विरोध और सरकारी नीतियों की आलोचना की खबर सरकार तक नहीं पहुंच पाती थी। सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों के सहारे ही अखबारों में अधिकतर समाचार छप रहे थे। इकतरफा पक्ष की बार-बार प्रस्तुति से पत्र-पत्रिकाओं की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया था। इसलिए इकतरफा संचार के कारण आपातकाल के 19 महीनों तक सरकार गलतफहमी में रही, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा।

सेंसरशिप के कड़े प्रतिबंधों और भय के वातावरण के कारण अनेक पत्र-पत्रिकाओं को अपने प्रकाशन बंद करने पड़े। इनमें सेमिनार और ओपिनियन के नाम उल्लेखनीय हैं। आपातकाल के दौरान 3801 समाचार-पत्रों के डिक्लेरेशन जब्त कर लिए गए। 327 पत्रकारों को मीसा में बंद कर दिया गया। 290 अखबारों के विज्ञापन बंद कर दिए गए। विदेशी पत्रकारों को भी पीडि़त-प्रताडि़त किया गया। ब्रिटेन के टाइम और गार्जियन के समाचार-प्रतिनिधियों को भारत से निकाल दिया गया। रायटर सहित अन्य एजेंसियों के टेलेक्स और टेलीफोन काट दिए गए। आपातकाल के दौरान 51 पत्रकारों के अधिस्वीकरण रद्द कर दिए गए। इनमें 43 संवाददाता 2 कार्टूनिस्ट तथा 6 कैमरामैन थे। 7 विदेशी संवाददाताओं को भी देश से बाहर जाने को कहा गया।

प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश डालने के लिए समाचार-समितियों का विलय किया गया। आपातकाल के पूर्व देश में चार समाचार-समितियां थीं – पी.टी.आई., यू.एन.आई., हिंदुस्थान समाचार और समाचार भारती जिन्हें मिलाकर एक समिति समाचार का गठन किया गया था जिससे यह पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में रहे। आपातकाल के दौरान आकाशवाणी और दूरदर्शन पर से जनता का विश्वास उठ चुका था। भारत के लोगों ने उस समय बी.बी.सी. और वायस आफ अमेरिका सुनना शुरू कर दिया था।

आपातकाल की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री के द्वारा ली गई पहली ही बैठक में प्रस्ताव आया कि प्रेस-परिषद् को खत्म किया जाए। 18 दिसंबर, 1975 को अध्यादेश द्वारा प्रेस-परिषद् समाप्त कर दी गई। आपातकाल के दौरान भूमिगत पत्रकारों ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया था। भूमिगत संचार-व्यवस्था के द्वारा एक समानांतर प्रचार-तंत्र खड़ा किया गया था। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो जन-जीवन को एकपक्षीय समाचार ही मिल पाता और सच्ची खबरों से वह वंचित रह जाते। आपातकाल में संचार अवरोध का खामियाजा जनता पर नहीं पड़ सका, किंतु सत्ता और सरकार आपातकाल विरोधियों की मनोदशा को नहीं समझ पाए। संचार अवरोध का कितना बड़ा खामियाजा सत्ता को उठाना पड़ सकता है, यह वर्ष 1977 के चुनाव परिणाम से सामने आया।

संपादकों का एक समूह चापलूसी की हद किस तरह पार कर रहा था, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दिल्ली के 47 संपादकों ने 9 जुलाई 1975 को श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा उठाए गए सभी कदमों में अपनी आस्था व्यक्त की, जिसमें समाचार-पत्रों पर लगाया गया सेंसर भी शामिल है। सेंसरशिप के कारण दिनमान एकपक्षीय खबर छापने को बाध्य हुई। दिनमान ने सेंसरशिप लगाए जाने का विरोध भले ही न किया हो, किंतु सेंसरशिप हटाए जाने पर संपादकीय अवश्य लिखा है।

आपातकाल की लोकप्रिय पत्रिका साप्ताहिक हिन्दुस्तान भी सेंसरषिप लागू होते ही सरकार की पक्षधर हो गई। यह पत्रिका सरकार की कितनी तरफदारी कर रही थी इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि चुनाव की घोषणा के बाद 6 फरवरी, 1977 के अंक में राजनीतिक शतरंज के पुराने खिलाड़ी और नए मोहरे, शीर्षक से प्रकाशित आलेख में कांग्रेस का पलड़ा भारी होना सुनिश्चित किया गया है, जबकि वास्तविकता यह है कि वर्ष 1977 के चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह से हार हुई थी।

आपातकाल के पूर्व सरिता में चुटीले बेबाक और धारदार लेख तथा संपादकीय छपा करते थे। सत्ता की मनमानी पर कड़ा प्रहार किया जाता रहा, किंतु आपातकाल लगने के बाद सेंसरशिप के कारण यह सिलसिला टूट गया। सेंसरशिप थोपे जाने और सत्ता के तानाशाही रवैये के कारण सरिता ने 6 महीनों मे संपादकीय कालम लिखना छोड़ दिया।

सारिका का जुलाई 1975 का अंक सेंसरशिप का पालन कड़ाई से किए जाने का जीवंत दस्तावेज बन गया है। सेंसर अधिकारी द्वारा सारिका के पन्नों पर काला किए गए वाक्यों और शब्दों को संपादक ने विरोध-स्वरूप वैसे ही प्रकाशित कर दिया था। इस अंक के पृष्ठ संख्या 27-28 को तो लगभग पूरी तरह काला कर दिया गया था। इसके बाद के अंकों में संपादकीय विभाग इतना संभल गया कि सेंसर अधिकारी को पृष्ठ काला करने की नौबत ही नहीं आई। लोकराज के 5 जुलाई 1975 के अंक में आपातघोषणा शीर्षक से संपादकीय छपा है। इस संपादकीय में कहा गया है कि कुछ लोगों के अपराध के लिए संपूर्ण प्रेस-जगत् को सेंसरशिप क्यों झेलना पड़े\ लोकराज के 12 जुलाई, 1975 के अंक में अनुशासन-पर्व शीर्षक से एक संपादकीय छपा जिसमें आपातकाल की घोषणा का स्वागत किया गया था।

इस प्रकार हम देखते हैं कि सेंसरशिप की कैंची ने पत्रकारिता के स्वरूप को ही बिगाड़ दिया था। दहशत और आतंक के माहौल में अधिकतर पत्र-पत्रिकाओं ने सेंसरशिप को स्वीकार कर लिया था। संपादकीय खाली छोड़ने और पृष्ठों के काले अंश को हू-ब-हू छापने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बच गया था।

आपातकाल की यह अवधि पत्रकारिता की दृष्टि से ऐसी रही कि यह अलग पहचान लिए है। आपातकालीन हिंदी पत्रकारिता के संबंध में आज अधिक सामग्री उपलब्ध नहीं है। ऐसे में डा. अरूण कुमार भगत द्वारा आपातकाल की हिंदी पत्रकारिता का अनुशीलन विषय पर किया गया शोध कार्य महत्वपूर्ण है।

डा. अरूण भगत, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, पीएचडी (सन्-2009)

सितम्बर अंक २०११

 

दिल्ली की साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं: स्वाधीनता के बाद

साहित्य और पत्रकारिता दोनों ही समाज के संवेदनशील सदस्य होने के नाते इसके प्रतिरूप को बिम्बित करने का प्रयास करते हैं। वस्तुतः दोनों ही समाज के दर्पण है- अन्तर है तो केवल शैली का। पत्रकार और साहित्यकार दोनों ही समाज के महत्वपूर्ण प्रश्नों एवं विषयों पर अपनी लेखनी चलाते हैं। इस दृष्टि से साहित्य तथा पत्रकारिता दोनों एक-दूसरे के सहयोगी अथवा पूरक माने जा सकते हैं। पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण कार्य तथ्यों एवं विचारों को प्रकाशित करना है और साहित्य का भावों तथा विचारों को अभिव्यक्ति देना। साहित्य को विस्तार देने का कार्य भी पत्रकारिता द्वारा किया जाता है और साहित्यिक पत्रकारिता, पत्रकारिता का ही एक रूप है।

साहित्यिक पत्रकारिता की शुरूआत भारत में 19वीं सदी में हो चुकी थी। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को साहित्यिक पत्रकारिता का प्रवर्तक माना जाता है। उन्होंने वर्ष 1868 में साहित्यिक पत्रिका कवि वचन सुधा का प्रकाशन किया। भारतेन्दु जी के जन्मस्थल बनारस से उस समय छः पत्रिकाएं प्रकाशित होती थी- कविवचन सुधा, हरिश्चन्द्र-मैगजीन, बालबोधिनी, काशी समाचार व आर्यमित्र।

द्विवेदी युग (1900-1918 ई.) में कई साहित्यिक पत्रिकाएं प्रकाशित हुई। वर्ष 1900 में इलाहबाद से मासिक पत्रिका सरस्वती का प्रकाशन शुरू  हुआ। वर्ष 1903 में महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के संपादन में इस पत्रिका ने नई ऊंचाइयों को छुआ। साहित्य के क्षेत्र में द्विवेदी जी ने व्याकरण एवं खड़ी बोली को एक नई दिशा प्रदान की। इस समय की अन्य पत्रिकाएं सुदर्शन, देवनागर, मनोरंजन, इन्दु समालोचक आदि थी।

छायावाद काल में चांद, माधुरी, प्रभा साहित्य, संदेश, विशाल भारत, सुधा, कल्याण, हंस, आदर्श, मौजी, समन्वय, सरोज आदि साहित्यिक पत्रिकाएं सामने आई। वर्तमान में सारिका, संचेतना, निहारिका, वीणा, प्रगतिशील समाज, युगदाह, कथासागर, सन्देश, आलोचना, सरस्वती संवाद, नया ज्ञानोदय, हंस आदि साहित्यिक पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं।

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में डा. अवधेश कुमार द्वारा दिल्ली की साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं: स्वाधीनता के बाद विषय पर वर्ष 2000 में शोध प्रस्तुत किया गया है। स्वाधीनता के पश्चात दिल्ली से आजकल, अनुवाद, अकविता, आलोचना, इन्द्रप्रस्थ भारती, समकालीन भारतीय साहित्य, गगलाचल, कृति, भाषा, साहित्य अमृत, नटरंग, संचेतना, नंदन, बाल भारती, सार-संसार, साप्ताहिक हिन्दोस्थान, हंस, कथादेश, नया प्रतीक, समीक्षा आदि.

साहित्यिक पत्रिकाएं प्रकाशित हो रहीं हैं, जिनका संक्षिप्त परिचय शोध में दिया है। शोध में उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं को संकलित करके हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता का इतिहास लिखने का विनम्र प्रयास किया है और इन पत्रिकाओं का मूल्यांकन प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही लेखक ने पत्रकारिता के विभिन्न पक्षों तथा तत्वों का भी अध्ययन-विश्लेषण शोध में करने का प्रयास किया है जो अब पुस्तक के रूप में बाजार में उपलब्ध है। साहित्य के क्षेत्र में उनके द्वारा किया गया यह कार्य बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में साहित्यिक पत्रकारिता के लेखन की आवश्यकता है।

पत्रकारिता की विधा को साहित्य का ही अंग माना जाता है, जिसके माध्यम से हमें तात्कालिक तौर पर साहित्य उपलब्ध होता है। पत्रकारिता और साहित्य का सम्मिश्रण होने पर पत्रकारिता जनसूचना ही नहीं जनशिक्षण के उद्देश्य को भी पूर्ण कर पाती है। साहित्यिक पत्रिकाओं ने भारत के राष्ट्रीय पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, यह क्रम आजादी के पश्चात 90 के दशक तक अनवरत चलता रहा। सन् 1991 में उदारीकरण की नीतियों के लागू होने के पश्चात साहित्यिक पत्रिकाएं बाजारीकरण की दौर में पिछड़ती चली गईं।

साहित्यिक पत्रिकाओं का स्थान अब उन पत्रिकाओं ने ले लिया है, जो किसी विषय पर आधारित होती हैं। इनमें प्रमुख हैं आर्थिक और राजनीतिक पत्रिकाएं। यह पत्रिकाएं बाजारीकरण की दृष्टि से ही कार्य करती हैं, लेकिन समाज का वैचारिक पोषण नहीं कर पाती। भारत में साहित्यिक पत्रिकाओं ने हिन्दी भाषा और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को नई ऊंचाईयां प्रदान की है। वर्तमान समय में जब पत्रकारिता अपने नैतिक मूल्यों और उद्देष्यों से अलग हट रही है, ऐसे में साहित्यिक पत्रिकाओं की आवश्यकता जान पड़ती है।

डा. अवधेश कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय, पीएचडी, सन्-2000

अगस्त अंक, २०११

 

सोशल नेटवर्किंग साइट्स का युवा पीढ़ी पर प्रभाव

जब से समाज की स्थापना हुई है तब से मनुष्य समाज में रहने वाले अन्य लोगों के साथ निरंतर संपर्क साधता रहता है। इसी संपर्क साधने की प्रक्रिया में विकास के चलते नई खोज हुई और सोशल नेटवर्किग साइट्स अस्तित्व में आई। इन साइट्स के जरिए लोग एक दूसरे से संपर्क स्थापित करते हैं। युवा पीढ़ी के लिए यह जानकारी प्राप्त करने, मनोरंजन तनाव से मुक्त रहने, नए लोगों से पहचान बनाने का साधन बन गया है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर वह अपनी बात अपने संपर्क के लोगों के साथ सांझा करते हैं।

अपने शुरूआती दौर में सोशल नेटवर्किंग साइट एक सामान्य सी दिखने वाली साइट होती थी और इसके जरिए उपयोगकर्ता एक-दूसरे से चैटरूम के जरिए बात करते थे और अपनी निजी जानकारी व विचार एक-दूसरे के साथ बांटते थे। इन साइट्स में द वेल, (1985, ‘द ग्लोब डाट काम, 1994, ट्राईपोड डाट काम (1995 शामिल थीं। 90 के दशक से इन साइट्स में बदलाव आया और इसमें फोटो, वीडियो, संगीत, शेयरिंग, आनलाइन गेम्स, विज्ञान, कला. ब्लागिंग, चैटिंग, आनलाइन डेटिंग जैसी तमाम सुविधाएं बढ़ीं। भारत में सबसे ज्यादा प्रयोग होने वाली वेबसाइट्स में फेसबुक, ट्विटर व आरकुट शामिल हैं। इसके अलावा हाय फाइव, बेबो, याहू 360, फ्रेंड ज़ोर्पिया आदि कई सोशल नेटवर्किंग साइट उपलब्ध हैं। फेसबुक फरवरी 2004 में लांच हुई थी जिसने बहुत कम समय में युवाओं के बीच पहुंच बनाकर प्रसिद्धि पाई । वहीं आरकुट वर्ष 2004 में बनाई गई थी जिस पर गूगल इंक का स्वामित्व है। ट्विटर वर्ष 2006 में जैक डर्सी द्वारा बनाई गई थी । इसके प्रयोगकर्ता अपने एकाउंट से कोई भी संदेश छोड़ते है जिसे ट्वीटर कहा जाता है।

पत्रकारिता के क्षेत्र में शोध कर रहीं शोधार्थी पंकज द्वारा सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर शोध किया जा रहा है और इस शोध का प्रयोजन यह जानना है कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स निजी एवं सामाजिक समस्याओं पर निर्णय लेने में युवाओं को कैसे प्रभावित करती है\ क्या यह किसी मुद्दे पर युवाओं की सोच में परिवर्तन कर सकती है\ क्या सोशल नेटवर्किंग साइट आज सूचनाओं एवं मनोरंजन का एक तीव्र माध्यम बन गई है, क्या युवा पीढ़ी इन साइट्स की आदी हो चुकी है\

इसमें कोई शक नहीं है कि आज जीवनशैली को इंटरनेट ने बहुत प्रभावित किया है। सूचना एवं प्रौद्योगिकी की इस नई तकनीक ने विष्व की सीमाओं को तोड़ दिया है। मैकलुहन के शब्दों में पूरी दुनिया एक वैश्विक ग्राम में बदल चुकी है।

इंटरनेट ने आज विश्व के लोगों को एक-दूसरे से जोड़ दिया है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए आज कोई भी व्यक्ति एक-दूसरे से कहीं से भी संपर्क साध सकता है। इसका प्रयोग करने वाले युवाओं की संख्या निरंतर बढ़ रही है। न्यू मीडिया के इस साधन पर यह शोध कार्य महत्वपूर्ण है।

शोधार्थी- पंकज, सीडिंग इंस्टीट्यूट फार मीडिया स्टडीज (जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी)

 

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