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मीडिया का आत्मावलोकन…

Archive for the category “विचार-संग्रह”

पत्रकारिता के प्रकाशपुंज बाबूराव विष्णु पराड़कर

भारत में पत्रकारिता का उद्भव पुनर्जागरण और समाज कल्याण के उद्देश्य से हुआ था। महात्मा गांधी, बाबूराव विष्णु पराड़कर, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, महर्षि अरविंद आदि युगपुरूष पत्रकारिता की इसी परंपरा के प्रस्थापक थे, जिसने पत्रकारिता को देशहित में कार्य करने के लिए लक्ष्य और प्रेरणा दी। पत्रकारिता में उनके आदर्श ही पत्रकारों की वर्तमान पीढ़ी के लिए दिशा-निर्देश के समान हैं, जिन पर चलकर पत्रकारों की वर्तमान पीढ़ी अपनी इस अमूल्य विधा के साथ न्याय कर सकती है। पत्रकारिता की अमूल्य विधा वर्तमान समय में अपने संक्रमण काल के दौर से गुजर रही है। दरअसल पत्रकारिता में यह संक्रमण उन आशंकाओं का अवतरण है, जिसकी आशंका पत्रकारिता के युगपुरूषों ने बहुत पहले ही व्यक्त की थी। संपादकाचार्य बाबूराव विष्णुराव पराड़कर ने भविष्य में पत्रकारिता में बाजारवाद, नैतिकता के अभाव और पत्रकारों की स्वतंत्रता के बारे में कहा था-

पत्र निकालकर सफलतापूर्वक चलाना बड़े-बड़े धनियों अथवा सुसंगठित कंपनियों के लिए ही संभव होगा। पत्र सर्वांग सुंदर होंगे। आकार बड़े होंगे, छपाई अच्छी होगी, मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्द्धक चित्रों से सुसज्जित होंगे, लेखों में विविधता होगी, कल्पकता होगी, गंभीर गवेषणा की झलक होगी, ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जाएगी। यह सब कुछ होगा पर पत्र प्राणहीन होंगे। पत्रों की नीति देशभक्त, धर्मभक्त अथवा मानवता के उपासक महाप्राण संपादकों की नीति न होगी- इन गुणों से सम्पन्न लेखक विकृत मस्तिष्क समझे जाएंगे, संपादक की कुर्सी तक उनकी पहुंच भी न होगी। वेतनभोगी संपादक मालिक का काम करेंगे और बड़ी खूबी के साथ करेंगे। वे हम लोगों से अच्छे होंगे। पर आज भी हमें जो स्वतंत्रता प्राप्त है वह उन्हें न होगी। वस्तुतः पत्रों के जीवन में यही समय बहुमूल्य है। (संपादक पराड़कर में उद्धृत)

पराड़कर जी का यह कथन वर्तमान दौर की पत्रकारिता में चरितार्थ होने लगा हैं, जब पत्रकारों की कलम की स्याही फीकी पड़ने लगी है और समाज हित जैसी बातें बेमानी होने लगी हैं। इसका कारण पत्रकार नहीं बल्कि वे मीडिया मुगल हैं जो मीडिया के कारोबारी होते हैं। पत्रकारिता पर पूंजीपतियों के दखल और उसके दुष्प्रभावों के बारे में पराड़कर जी ने कहा था-

पत्र निकालने का व्यय इतना बढ़ गया है कि लेखक केवल अपने ही भरोसे इसमें सेवा प्राप्त नहीं कर सकता। धनियों का सहयोग अनिवार्य हो गया है। दस जगह से धन संग्रह कर आप कंपनी बनाएं अथवा एक ही पूंजीपति पत्र निकाल दे, संपादक की स्वतंत्रता पर दोनों का परिणाम प्रायः एक सा ही होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि पत्रों की उन्नति के साथ-साथ पत्रों पर धनियों का प्रभाव अधिकाधिक परिमाण में अवश्य पड़ेगा।‘(इतिहास निर्माता पत्रकार, डा. अर्जुन तिवारी)

बाजार के बढ़ते प्रभाव के कारण समाचारपत्र के स्वरूप और समाचारों के प्रस्तुतिकरण में आ रहे बदलावों के बारे में पराड़कर जी ने कहा था-

पत्र बेचने के लाभ से अश्लील समाचारों को महत्व देकर तथा दुराचरण मूलक अपराधों का चित्ताकर्षक वर्णन कर हम परमात्मा की दृष्टि में अपराधियों से भी बड़े अपराधी ठहर रहे हैं, इस बात को कभी न भूलना चाहिए। अपराधी एकाध अत्याचार करके दण्ड पाता है और हम सारे समाज की रूचि बिगाड़ कर आदर पाना चाहते हैं। (प्रथम संपादक सम्मेलन 1925 के वृंदावन हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्षीय वक्तव्य से)

पराड़कर जी का यह कथन वर्तमान समय में और भी प्रासंगिक लगता है, जब खबर के बाजार में मीडिया मुगल अश्लील खबरों के माध्यम से बाजार पर हावी होने के प्रयास में रहते हैं। पत्रकार को देश के समसामयिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक और विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों के बारे में जानकारी अवश्य होनी चाहिए। तभी वह अपने उद्देश्य में सफल हो सकता है। इसका वर्णन करते हुए पराड़कर जी ने कहा था –

मेरे मत से संपादक में साहित्य और भाषा ज्ञान के अतिरिक्त भारत के इतिहास का सूक्ष्म और संसार के इतिहास का साधारण ज्ञान तथा समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र और अंतर्राष्ट्रीय विधानों का साधारण ज्ञान होना आवश्यक है। अर्थशास्त्र का वह पण्डित न हो पर कम से कम भारतीय और प्रान्तीय बजट समझने की योग्यता उसमें अवश्य होनी चाहिए।‘(इतिहास निर्माता पत्रकार, अर्जुन तिवारी)

अभी हाल ही में प्रधानमंत्री ने टिप्पणी की थी कि मीडिया अब जज की भूमिका अदा करने लगा है,‘यह कुछ अर्थों में सही भी है। पत्रकारों पर राजनीति का कलेवर हावी होने लगा है, पत्रकारिता के राजनीतिकरण पर टिप्पणी करते हुए पराड़कर जी ने कहा था-

आज का पत्रकार राजनीति और राजसत्ता का अनुकूल्य उपलब्ध करने के लिए उनके मुहावरे में बोलने लगा है। उपभोक्ता संस्कृति के अभिशाप को लक्ष्य कर राजनेताओं की तरह आवाज टेरने वाले पत्रकार स्वयं व्यावसायिक चाकचिक्य के प्रति सतृष्ण हो गए हैं और उपभोक्ता संस्कृति ही इनकी संस्कृति बनती जा रही है।  (पत्रकारिता इतिहास और प्रश्न, कृष्णबिहारी मिश्र)

संपादकाचार्य पराड़कर जी की पत्रकारिता का लक्ष्य पूर्णतः स्वतंत्रता प्राप्ति के ध्येय को समर्पित था। पराड़कर जी ने अपने उद्देश्य की घोषणा इन शब्दों में की थी-

शब्दों में सामर्थ्य का भरें नया अंदाज।

बहरे कानों को छुए अब अपनी आवाज।

5 सितंबर, 1920 को आज की संपादकीय टिप्पणी में अपनी नीतियों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा था-

हमारा उद्देश्य अपने देश के लिए सर्व प्रकार से स्वातंत्र्य उपार्जन है। हम हर बात में स्वतंत्र होना चाहते हैं। हमारा लक्ष्य है कि हम अपने देश के गौरव को बढ़ावें, अपने देशवासियों में स्वाभिमान संचार करें।

पराड़कर जी की पत्रकारिता पूर्णतः ध्येय समर्पित पत्रकारिता थी, जिसका वर्तमान पत्रकार पीढ़ी में सर्वथा अभाव दिखता है। बाबूराव विष्णु पराड़कर पत्रकारिता जगत के लिए सदैव स्मरणीय आदर्श पत्रकार हैं। पत्रकारिता के सही मूल्यों को चरितार्थ करने वाले बाबूराव विष्णु पराड़कर जी की पत्रकारिता के पदचिन्ह वर्तमान पत्रकार पीढ़ी के लिए पथप्रदर्शक के समान हैं।

सूर्यप्रकाश, सितम्बर अंक २०११

पूंजीपतियों के चरणों में अर्पित पत्रकारिता- माखनलाल चतुर्वेदी

वर्तमान समय में पत्रकारिता के कर्तव्य, दायित्व और उसकी भूमिका को लोग संदेह से परे नहीं मान रहे हैं। इस संदेह को वैश्विक पत्रकारिता जगत में न्यूज आफ द वर्ल्ड और राष्ट्रीय स्तर पर राडिया प्रकरण ने बल प्रदान किया है। पत्रकारिता जगत में यह घटनाएं उन आशंकाओं का प्रादुर्भाव हैं जो पत्रकारिता के पुरोधाओं ने बहुत पहले ही जताई थीं। पत्रकारिता में पूंजीपतियों के बढ़ते प्रभाव के बारे में पत्रकारिता के महान आदर्श माखनलाल चतुर्वेदी ने कहा था-

दुख है कि सारे प्रगतिवाद, क्रांतिवाद के न जाने किन-किन वादों के रहते हुए हमने अपनी इस महान कला को पूंजीपतियों के चरणों में अर्पित कर दिया है। (पत्रकारिता: इतिहास और प्रश्न – कृष्ण बिहारी मिश्र)

भारत की पत्रकारिता की कल्पना हिंदी से अलग हटकर नहीं की जा सकती है, परंतु हिंदी पत्रकारिता जगत में भी अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। भाषा के मानकीकरण की दृष्टि से यह उचित नहीं कहा जा सकता। माखनलाल चतुर्वेदी भाषा के इस संक्रमण से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने कहा कि-

राष्ट्रभाषा हिंदी और तरूणाई से भरी हुई कलमों का सम्मान ही मेरा सम्मान है।‘(राजकीय सम्मान के अवसर पर)

राष्ट्रभाषा हिंदी के विषय में माखनलाल जी ने कहा था-

जो लोग देश में एक राष्ट्रभाषा चाहते हैं, वे प्रांतों की भाषाओं का नाश नहीं चाहते। केवल विचार समझने और समझाने के लिए राष्ट्रभाषा का अध्ययन होगा, बाकि सब काम मातृभाषाओं में होंगे। ऐसे दुरात्माओं की देश को जरूरत नहीं, जो मातृभाषाओं को छोड़ दें। (पत्रकारिता के युग निर्माता- माखनलाल चतुर्वेदी, शिवकुमार अवस्थी)

पत्रकारिता पर सरकारी नियंत्रण एक ऐसा मुद्दा है, जो हमेशा जीवंत रहा है। सरकारी नियंत्रण के बारे में भी माखनलाल चतुर्वेदी ने अपने विचारों को स्पष्ट करते हुए अपने जीवनी लेखक से कहा था-

जिला मजिस्ट्रेट मिओ मिथाइस से मिलने पर जब मुझसे पूछा गया कि एक अंग्रेजी वीकली के होते हुए भी मैं एक हिंदी साप्ताहिक क्यों निकालना चाहता हूं तब मैंने उनसे निवेदन किया कि आपका अंग्रेजी साप्ताहिक तो दब्बू है। मैं वैसा समाचार पत्र नहीं निकालना चाहता हूं। मैं एक ऐसा पत्र निकालना चाहूंगा कि ब्रिटिश शासन चलता-चलता रूक जाए। (पत्रकारिताः इतिहास और प्रश्न – कृष्ण बिहारी मिश्र)

माखनलाल चतुर्वेदी ने पत्रकारिता के ऊंचे मानदंड स्थापित किए थे। उनकी पत्रकारिता में राष्ट्र विरोधी किसी भी बात को स्थान नहीं दिया जाता था। यहां तक कि माखनलाल जी महात्मा गांधी के उन वक्तव्यों को भी स्थान नहीं देते थे जो क्रांतिकारी गतिविधियों के विरूद्ध होते थे। सरकारी दबाव में कार्य करने वाली पत्रकारिता के विषय में उन्होंने अपनी नाराजगी इन शब्दों में व्यक्त की थी-

मैंने तो जर्नलिज्म में साहित्य को स्थान दिया था। बुद्धि के ऐरावत पर म्यूनिसिपल का कूड़ा ढोने का जो अभ्यास किया जा रहा है अथवा ऐसे प्रयोग से जो सफलता प्राप्त की जा रही है उसे मैं पत्रकारिता नहीं मानता।‘‘ (पत्रकारिताः इतिहास और प्रश्न- कृष्ण बिहारी मिश्र)

 

वर्तमान समय में हिंदी समाचारपत्रों को पत्र का मूल्य कम रखने के लिए और अपनी आय प्राप्त करने के लिए विज्ञापनों पर निर्भर रहना पड़ता है, क्योंकि पाठक न्यूनतम मूल्य में ही पत्र को लेना चाहते हैं। हिंदी पाठकों की इस प्रवृत्ति से क्षुब्ध होकर माखनलाल जी ने कहा-

मुफ्त में पढ़ने की पद्धति हिंदी से अधिक किसी भाषा में नहीं। रोटी, कपड़ा, शराब का मूल्य तो वह देता है पर ज्ञान और ज्ञान प्रसाधन का मूल्य चुकाने को वह तैयार नहीं। हिंदी का सबसे बड़ा शत्रु यही है। (पत्रकारिता के युग निर्माता- माखनलाल चतुर्वेदी, शिवकुमार अवस्थी)

माखनलाल चतुर्वेदी पत्र-पत्रिकाओं की बढ़ती संख्या और गिरते स्तर से भी चिंतित थे। पत्र-पत्रिकाओं के गिरते स्तर के लिए उन्होंने पत्रों की कोई नीति और आदर्श न होने को कारण बताया। उन्होंने लिखा था-

हिंदी भाषा का मासिक साहित्य एक बेढंगे और गए बीते जमाने की चाल चल रहा है। यहां बरसाती कीड़ों की तरह पत्र पैदा होते हैं। फिर यह आश्चर्य नहीं कि वे शीघ्र ही क्यों मर जाते हैं। यूरोप में हर एक पत्र अपनी एक निश्चित नीति रखता है। हिंदी वालों को इस मार्ग में नीति की गंध नहीं लगी। यहां वाले जी में आते ही, हमारे समान चार पन्ने निकाल बैठने वाले हुआ करते हैं। उनका न कोई आदर्श और उद्देश्य होता है, न दायित्व। (इतिहास- निर्माता पत्रकार, डा. अर्जुन तिवारी)

पत्रकारिता को किसी भी राष्ट्र या समाज का आईना माना गया है, जो उसकी समसामयिक परिस्थिति का निष्पक्ष विश्लेषण करता है। पत्रकारिता की उपादेयता और महत्ता के बारे में माखनलाल चतुर्वेदी जी ने कर्मवीर के संपादकीय में लिखा था-

किसी भी देश या समाज की दषा का वर्तमान इतिहास जानना हो तो वहां के किसी सामयिक पत्र को उठाकर पढ़ लीजिए, वह आपसे स्पष्ट कर देगा। राष्ट्र के संगठन में पत्र जो कार्य करते हैं वह अन्य किसी उपकरण से होना कठिन है। (माखनलाल चतुर्वेदी, ऋषि जैमिनी बरूआ)

किसी भी समाचार पत्र की सफलता उसके संपादक और उसके सहयोगियों पर निर्भर करती है, जिसमें पाठकों का सहयोग प्रतिक्रिया की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। समाचारपत्रों की घटती लोकप्रियता के लिए माखनलाल जी ने संपादकों और पाठकों को जिम्मेदार ठहराते हुए लिखा था-

इनके दोषी वे लोग ही नहीं हैं जो पत्र खरीदकर नहीं पढ़ते। अधिक अंशों में वे लोग भी हैं जो पत्र संपादित और प्रकाशित करते हैं। उनमें अपने लोकमत की आत्मा में पहुंचने का सामर्थ्य नहीं। वे अपनी परिस्थिति को इतनी गंदी और निकम्मी बनाए रखते हैं, जिससे उनके आदर करने वालों का समूह नहीं बढ़ता है।‘(पत्रकारिता के युग निर्माता- माखनलाल चतुर्वेदी, शिवकुमार अवस्थी)

भारतीय पत्रकारिता अपने प्रवर्तक काल से ही राष्ट्र और समाज चेतना के नैतिक उद्देश्य को लेकर ही यहां तक पहुंची है। वर्तमान समय में जब पत्रकार को पत्रकारिता के नैतिक कर्तव्यों से हटकर व्यावसायिक हितों के लिए कार्य करने में ही कैरियर दिखने लगा है। ऐसे समय में पत्रकारिता के प्रकाशपुंज माखनलाल चतुर्वेदी के आदर्षों से प्रेरणा ले अपने कर्तव्य पथ पर बढ़ने की आवश्यकता है।

सूर्यप्रकाश

सत्ता नहीं, पाठक करें मीडिया की समीक्षा: महात्मा गांधी

पत्रकारों की वर्तमान पीढ़ी को ऐसा लगता है जैसे पत्रकारिता जगत वर्तमान समय में संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है पत्रकारिता के बारे में उस समय भी कुछ बातों पर पत्रकार चिंतित थे जिस समय को भारतीय पत्रकारिता का उत्कृष्ट समय कहा जाता है। भारतीय पत्रकारिता का आरंभिक दौर राष्ट्रवाद के जनजागरण को समर्पित था। यह समय भारत के स्वाधीनता आन्दोलन का समय था। भारत की स्वाधीनता को प्राप्त करने की दिशा में तत्कालीन पत्रकारिता और पत्रकारों की महती भूमिका रही थी। उस समय में पत्रकारों का एक ऐसा वर्ग तैयार हुआ जिनके लिए राष्ट्र की स्वाधीनता ही परम ध्येय था. लेकिन उस समय में भी पत्रकारिता में विज्ञापन, पत्रकार का कर्तव्य और पत्रकारिता पर सरकारी नियंत्रण आदि समस्याएं थीं, जिनके बारे में महात्मा गाँधी जैसे अग्रणी नेता और पत्रकार ने भी बहुत कुछ लिखा था। महात्मा गाँधी ने तत्कालीन समाचार पत्रों में विज्ञापन के बढ़ते दुष्प्रभाव पर लिखा था-

मैं समझता हूं कि समाचारपत्रों में विज्ञापन का प्रकाशन बंद कर देना चाहिए। मेरा विश्वास है कि विज्ञापन उपयोगी अवश्य है लेकिन विज्ञापन के माध्यम से कोई उद्देश्य सफल नहीं हो सकता है। विज्ञापनों का प्रकाशन करवाने वाले वे लोग हैं जिन्हें अमीर बनने की तीव्र इच्छा है। विज्ञापन की दौड़ में हर तरह के विज्ञापन प्रकाशित होने लगे हैं जिनसे आय भी प्राप्त होती है। आधुनिक नागरिकता का यह सबसे नकारात्मक पहलू है जिससे हमें छुटकारा पाना ही होगा। हमें गैर आर्थिक विज्ञापनों को प्रकाशित करना होगा जिससे सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति हो सके। लेकिन इन विज्ञापनों को भी कुछ राशि लेकर प्रकाशित करना चाहिए। इसके अलावा अन्य विज्ञापनों का प्रकाशन तत्काल बंद कर देना चाहिए। (इंडियन ओपिनियन, ४ सितम्बर, १९१२)

महात्मा गाँधी ने पत्रकारिता के सिद्धांत और पत्रकार के कर्तव्यों के बारे में भी लिखा था। महात्मा गाँधी ने पत्रकारिता और पत्रकार के कर्तव्यों के बारे में सविस्तार उल्लेख करते हुए लिखा था कि –

मैं महसूस करता हूं कि पत्रकारिता का केवल एक ही ध्येय होता है और वह है सेवा। समाचार पत्र की पत्रकारिता बहुत क्षमतावान है, लेकिन यह उस पानी के समान है जो बांध के टूटने पर समस्त देश को अपनी चपेट में ले लेता है और समस्त फसल को नष्ट कर देता है। (सत्य के साथ प्रयोग अथवा आत्मकथा)

समाचारपत्र लोकतंत्र के स्थायीकरण में किस प्रकार से सहायक हो सकते हैं इसकी व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा –

वास्तव में आदर्श लोकतंत्र की आवश्यकता क्या है, तथ्यों की जानकारी या सही शिक्षा निश्चित तौर पर सही शिक्षा। पत्रकारिता का कार्य लोगों को शिक्षित करना है न कि आवश्यक-अनावश्यक तथ्यों एवं समाचारों से उनके विवेक को सीमित कर देना। एक पत्रकार को हमेशा इस बारे में स्वतंत्र रहना चाहिए कि उसे कब और कौन सी रिपोर्ट करनी है। इसी प्रकार से एक पत्रकार को केवल तथ्य जुटाने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। बल्कि आगे होने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान होना भी पत्रकार के लिए आवश्यक है।(महात्मा गाँधी- तेंदुलकरः महात्मा १९५३, पेज २४७)

महात्मा गाँधी ने समाचार में प्रकाशित समस्त जानकारियों को पूर्णतः सच मानने से भी इनकार किया है। वे समाचार पत्रों के माध्यम से राय बनाने के भी सख्त विरोधी थे। उन्होंने कहा समाचारपत्रों को केवल तथ्यों की जानकारी के लिए पढ़ा जाना चाहिए, लेकिन समाचारपत्रों को यह आज्ञा नहीं दी जा सकती है कि वे स्वतंत्र चिंतन को समाप्त कर दें। उन्होंने समाचारपत्रों को पूर्णतः विश्वसनीय न मानते हुए कहा-

पश्चिमी देशों की तरह पूरब में भी समाचार पत्र को गीता, बाईबल और कुरान की तरह से माना जा रहा है। ऐसा माना जा रहा है जैसे समाचार पत्रों में ईश्वरीय सत्य ही लिखा हो। मैं समाचारपत्र के माध्यम से राय बनाने का विरोधी हूं। समाचारपत्रों को केवल तथ्यों की जानकारी के लिए ही पढ़ा जाना चाहिए, लेकिन समाचारपत्रों को यह आज्ञा नहीं दी जा सकती है कि वे स्वतंत्र चिंतन को समाप्त कर दें। मैं पत्रकार मित्रों से केवल यही कहूंगा कि वे समाचारपत्रों में केवल सत्य ही प्रकाशित करें, कुछ और नहीं।

जनसंचार माध्यमों की स्वायत्ता और सरकारी नियंत्रण एक ऐसा मुद्दा है जो हमेशा ही जीवंत रहा है। यह उस समय में भी था जब भारत में पत्रकारिता अपने शैशव काल में थी। महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश लोगों पर समाचारपत्रों के व्यापक प्रभाव का अध्ययन किया। उन्होंने यह भी अनुभव किया कि ब्रिटिश सरकार किस प्रकार से समाचार पत्रों को अपने पक्ष में माहौल तैयार करने के लिए अपने प्रभाव में लेती थी। ब्रिटिश लोगों को ध्यान में रखते हुए महात्मा गाँधी ने भारतीय पत्रकारिता जगत को चेताया कि-

ब्रिटिश जनता के लिए उनका समाचार पत्र ही उनका बाईबल होता है। वे अपनी धारणा समाचारपत्रों के माध्यम से ही बनाते हैं। एक ही तथ्य को विभिन्न समाचार पत्रों में विभिन्न तरीकों से दिया जाता है। समाचार पत्र उस पार्टी के मुताबिक लिखते हैं जिस पार्टी का वे समर्थन करते हैं। हमें ब्रिटिश पाठकों को आदर्श मानते हुए यह देखना चाहिए कि समाचारपत्रों के अनुसार ही इनकी विचारधारा में किस प्रकार से बदलाव आता है। ऐसे लोगों के विचारों में बहुत जल्दी-जल्दी परिवर्तन होते रहते हैं। ब्रिटेन में कहा जाता है कि प्रत्येक सात वर्ष के पश्चात पाठकों की राय में परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार से लोग उनके शिकंजे में आ जाते हैं जो एक अच्छे वक्ता अथवा नेतृत्वकर्ता होते हैं। इसको संसद भी कह सकते हैं। यह लोग अपनी सत्ता को जाते हुए नहीं देख सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति उनके और सत्ता के बीच में आता है तो वे उसकी आँख भी निकाल सकते हैं।

महात्मा गाँधी ने लोकतंत्र के स्थायित्व के लिए लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ पत्रकारिता को व्यापक अधिकार देने की भी पैरोकारी की। महात्मा गाँधी ने कहा-‘

प्रेस की आजादी ऐसा बहुमूल्य विशेषाधिकार है जिसे कोई भी राष्ट्र भूल नहीं सकता है।

महात्मा गाँधी ने कहा कि ऐसी परिस्थिति में जब संपादक ने समाचार पत्र में कुछ ऐसी सामग्री प्रकाशित कर दी हो उसे क्या करना चाहिए, क्या उसे सरकार से माफी मांगनी चाहिए, नहीं, बिल्कुल नहीं। यह सत्य है कि संपादक ऐसी सामग्री प्रकाशित करने के लिए बाध्य नहीं है, लेकिन एक बार प्रकाशन के पश्चात वापस लेना भी उचित नहीं है।

किसी भी समाचारपत्र की सफलता मुख्यत संपादक की कार्यशैली और योग्यता पर ही निर्भर करती है। महात्मा गाँधी ने संपादकों के कार्य के विषय में अपने विचार स्पष्ट करते हुए लिखा-

पत्रकारिता को चैथा स्तम्भ माना जाता है। यह एक प्रकार की शक्ति है, लेकिन इसका गलत प्रयोग एक अपराध है। मैं एक पत्रकार के नाते अपने पत्रकार मित्रों से अपील करता हूं कि वे अपनी जिम्मेदारी को महसूस करें और बिना किसी अन्य विचार के केवल सत्य को ही प्रस्तुत करें।  समाचारपत्रों में लोगों को शक्तिशाली तरीके से प्रभावित करने की क्षमता है। इसलिए संपादकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि कोई गलत रिपोर्ट न चली जाए जो लोगों को उत्तेजित करती हो। संपादक और उसके सहायकों को इस बारे में हमेशा जागरूक रहना चाहिए कि वे किस समाचार को किस तरह से प्रस्तुत करते हैं। किसी स्वतंत्र राष्ट्र में सरकार के लिए प्रेस पर नियंत्रण रख पाना असंभव है। ऐसे में पाठकों का यह उत्तरदायित्व है कि वे प्रेस की समीक्षा करें और उन्हें सही रास्ता दिखाएं। समाज का प्रबुद्ध वर्ग भड़काऊ समाचारपत्रों को नकार देगा।

सूर्यप्रकाश, जुलाई अंक, २०११

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