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मीडिया का आत्मावलोकन…

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खलनायक नहीं, नायक है तू

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समरथ को नही दोष गोसाईं की पंक्तियां व्यवस्था में मत्स्य न्याय जैसी स्थिति की तरफ संकेत करने के लिए उपयोग में लाई जाती हैं। जब कानून व्यक्तियों का भार देखकर काम करने लगता है, व्यक्ति की प्रतिष्ठा और प्रभावित करने की क्षमता से संविधान के अनुच्छेद घुटन सी महसूस करने लगते हैं, तब गोस्वामी तुलसीदास की यह पंक्तियां बरबस याद आ जाती हैं। अभी तक इस पंक्ति का उपयोग राजनीतिक-आर्थिक संदर्भों में होता रहा है। शायद, यह मान लिया गया था कि सामथ्र्य इन दोनों क्षेत्रों तक सीमित रहती है। व्यवस्था के पारंपरिक ढांचे का विश्लेषण एक हद तक इस मान्यता पर मुहर भी लगाता है कि रसूख का स्वरूप या तो राजनीतिक होता है अथवा आर्थिक। लेकिन हाल-फिलहाल की कुछ घटनाएं इस बात की तरफ इशारा करती हैं कि रसूखदारी अब राजनीति अथवा आर्थिकी की बपौती नहीं रह गई है।
 सामर्थ्य में हिस्सेदारी रखने वाले कुछ नवघटक व्यवस्था में जुड़ चुके हैं। संजय दत्त की सजा के बाद जिस तरह का गुबार और अंधड़ पैदा करने की कोशिश की गई, वह इस बात की तस्दीक करते हैं। सजा के बाद व्यवस्था की विसंगतियों पर जैसे गंभीर सवाल उठाए गए और जिस तरह से दूर-दराज के अपरिचित हमदर्द मदद के लिए सामने आए, उससे तो ऐसा लगा कि मानो गलती संजय दत्त की नहीं, माननीय उच्चतम न्यायालय की है। संजय दत्त के खिलाफ हुई कथित ज्यादती को दूर करने के लिए कुछ लोगों ने व्यवस्था परिवर्तन की बात की तो कुछ अन्य ने व्यवस्था के गैर-पारंपरिक विधानों का उपयोग कर उच्चतम न्यायालय द्वारा हो गई गलती को सुधारने का अभियान चलाया। इस अभियान के मुखिया बने प्रेस परिषद् के अध्यक्ष – मार्कंडेय काटजू और इस गंभीर वैधानिक विमर्श को आगे बढ़ाया मीडिया ने।
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मार्कंडेय काटजू ने बहस की शुरूआत करते हुए कहा कि क्योंकि संजय दत्त एक अच्छे आदमी हैं, उनके पास परिवार है और उनका ताल्लुक एक समाजसेवी परिवार से है, इसलिए मानवीय आधार पर उनको सजा से मुक्ति मिलनी चाहिए। इसके बाद तो संजय दत्त के पक्ष में जिरह करने वालों की भीड़ लग गई। कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने कहा अपराध के समय उनकी उम्र मात्र 33 वर्ष थी। उन्होंने बचपने में एक गलती कर दी थी, इसलिए उनको क्षमादान मिलना चाहिए। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मानना था कि संजय दत्त पहले ही काफी कुछ भुगत चुके हैं और अधिक सजा की जरूरत नहीं है। अभिनेत्री राखी सावंत तो इतनी भावविह्वल थीं कि उन्होंने खुद को संजय की जगह जेल जाने के लिए प्रस्तुत कर दिया। आंध्र के पूर्व अभिनेता और वर्तमान में नेता चिरंजीवी ने कहा कि संजय ने काफी सजा पहले ही काट ली है, अब उनको दया के आधार पर सजा से मुक्त कर दिया जाना चाहिए। धर्मेंद्र ने फरमाया कि मेरा हृदय संजय के लिए रोता है। बीमार अमर सिंह यकायक सक्रिय हो गए और वह अभिनेत्री जयाप्रदा को लेकर महाराष्ट्र के राज्यपाल के.शंकरनारायणन के पास जा पहुंचे तथा दरबार में माफी की गुहार लगाई। इन सारे लोगों के पास कोई ठोस तर्क नहीं थे। अपने को हमेशा क्रांतिकारी मुद्रा और नई सोच की पैरोकार के रूप में प्रस्तुत करने वाली तवलीन सिंह ने भी अपनी धारदार कलम संजय के पक्ष में चलाई। सभी माननीय, बेचारे संजय के हक की लड़ाई मानवीय मूल्यों के आधार पर लड़ रहे थे।
 संजय दत्त की असली पैरवी तो आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में से एक शांतिभूषण ने की। उन्होंने 26 मार्च को द हिंदू में एक लेख लिखकर कानूनी जिरह की और उच्चतम न्यायायलय से संजय दत्त को सजा देने की अपनी गलती सुधारने की अपील की। इस लेख में उन्होंने लिखा कि संजय दत्त ने सांप्रदायिक हिंसा से उपजी हुई स्थितियों को ध्यान में रखते हुए अपने पास एके-56 जैसे हथियार रखे थे। उस समय उग्र भीड़ कुछ भी कर सकती थी, इसलिए उन्होंने उग्र भीड़ से अपनी रक्षा के लिए सुरक्षा के घातक हथियार रखे थे। किसी भी व्यक्ति को अपनी सुरक्षा के लिए ऐसा करने का हक है। अब चूंकि भारतीय कानून घातक हथियारों का लाइसेंस नहीं देते, इसलिए संजय दत्त के पास डी कंपनी की शरण में जाने के सिवाय कोई विकल्प ही नहीं बचा था।
पहली श्रेणी के तर्क तो इतने सतही और भोथरे हैं कि उनके खंडन की जरूरत ही नहीं पड़ती। अब यदि किसी अपराधी के लिए इस आधार पर क्षमा मांगी जाए कि उसके पास बीवी-बच्चे हैं, तब तो भारत के 99 प्रतिशत अपराधियों को छोडना पड़ेगा। वैसे भी पिछले कुछ समय में काटजू द्वारा दिए गए बयानों का विश्लेषण करने से यह स्पष्ट होता है कि वह मानते हैं कि सारी विद्वता उनके पास है और निर्णय सुनाने का तो वह एकाधिकार रखते हैं। शायद, इसी कारण अधिकांश पत्रकार उनको मूर्ख लगते हैं। संजय दत्त के प्रकरण में भी वह अपने से असहमति रखने वाले लोगों को खुलेआम मूर्ख और बेवकूफ बता रहे थे। उनको याद रखना चाहिए कि वह माननीय न्यायालय की परिधि से बाहर आ चुके हैं। अब उनके निर्णयों और कथनों से सैकड़ों लोग असहमत होंगे। इस स्थिति में गुर्राने की बजाय सलीके से और तथ्यों और तर्कों के आधार पर बातचीत करना ही अधिक प्रभावी होता है।
 मीडियाई क्षेत्र तो वैसे भी बाल की खाल निकालने के लिए प्रसिद्ध है और जब खाल ही उधड़ी हुई हो तो मीडिया को खिंचाई करने से कौन रोक सकता है ?  अन्य लोग तो हमदर्दी दिखाने के बहाने यह सिद्ध करना चाह रहे थे कि बालीवुड की पैरोकारी का दमखम उन्हीं के पास है और जब उच्चतम न्यायालय ने अन्याय किया है तो सभी लोग, सभी दिशाएं देख लें कि वह हक की लड़ाई लडने में सबसे आगे हैं। दिग्विजय सिंह तो बयान ही खंडन करने के लिए देते हैं। हेमंत करकरे के बारे मे दिग्विजय के बयान का खंडन कुछ ही मिनटों में खुद करकरे की पत्नी ने कर दिया था। अब यदि मान लिया जाए कि संजय 33 साल की उम्र में एके-56 जैसे खिलौने का महत्व नहीं जानते थे, फिर भी उनको पाक-साफ नहीं बताया जा सकता। एबीपी न्यूज सन् 2000 में उनके दाउद के दाहिने हाथ माने जाने वाले गुर्गे से बातचीत के टेप का प्रसारण कर चुका है। अब प्रश्र यह उठता है कि संजय दत्त से अनजाने में गलती हुई थी तो 7 सालों बाद वह क्यों पाकिस्तानी आकाओं को याद कर रहे थे और कुछ फरियादें भी कर रहे थे।
अब कानूनी पक्ष की बात करते हैं। कानून की बारीकियों में जाने से पहले यह आवश्यक हो जाता है कि हम संजय दत्त के अपराधों की पड़ताल कर लें।
 टाडा कोर्ट में सीबीआई ने संजय दत्त के ऊपर जो आरोप लगाए हैं उसके अनुसार 16 जनवरी 1993 को अबू सलेम ने 3 एके-56 रायफलें, 25 हैंडग्रेनेड और 7 एमएम की पिस्टल रखने के लिए दी। इनमें से एक एके-56 रायफल को अपने पास रखकर, शेष सारे हथियार उन्होंने हनीफ लाकड़ावला और समीर हिंगोरा को सौंप दिए। मॉरीशस में शूटिंग के दौरान संजय दत्त को इस बात का पता चला कि सीबीआई मुंबई बम विस्फोटों में उनकी संलिप्तता की भी जांच कर रही है। उन्होंने युसूफ नलावाला, अजय मारवा और रसी मुल्लावाला को इन हथियारों को नष्ट करने की जिम्मेदारी दी। शुरूआत में, संजय दत्त पर टाडा के तहत मुकदमा चलाया गया, बाद में पता नहीं किन कारणों से उन पर से टाडा हटा लिया गया और केवल आम्र्स एक्ट के तहत मुकदमा चलाया जाने लगा। संजय ने न्यायालय में इन तथ्यों की स्वीकारोक्ति भी की।
 अब प्रश्र यह उठता है कि क्या दया का अधिकार केवल सबल को मिलना चाहिए या सबल ही दया मांगने की क्षमता रखता है ? जिस आधार पर संजय के लिए,क्षमादान मांगा जा रहा है , क्या इसी आधार पर अन्य लोगों के लिए भी पैरोकारी करने के लिए लोग सामने आएंगे ? नेशलन क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरों के 2011 के आंकड़ों के अनुसार पूरे भारत में लगभग 2 हजार लोग आम्र्स एक्ट के तहत सजा भुगत रहे हैं, जबकि 10 हजार से अधिक लोगों पर आम्र्स एक्ट के तहत मुकदमे चल रहे हैं। इनमें अधिकांश बहुत ही साधारण हथियार रखने के दोषी पाए गए हैं। इसी साल के आंकड़ों के अनुसार 1 लाख 28 हजार सजायाफ्ता कैदियों में से 73 प्रतिशत दसवीं फेल हैं इनमें 30 प्रतिशत तो निरक्षर है। इसी तरह 2 लाख 41 हजार विचाराधीन कैदियों में निरक्षर कैदियों की संख्या 29.5 प्रतिशत और दसवीं फेल कैदियों की संख्या 42.4 प्रतिशत है। इन निरक्षरों और गरीबों के लिए देश में कोई काटजू अपनी आवाज नहीं उठाता। दया का थोड़ा-बहुत हक तो इनका भी है।
 दया, निर्बलों और असहायों के लिए मांगी जाती है। जब व्यक्ति संसाधनों के अभाव में अपनी लड़ाई नहीं लड़ पाता अथवा बिना किसी गुनाह के किसी को सजा दे दी जाती है, तब दया मांगी जाती है। यहां तो उल्टी गंगा बहाने की कोशिश की जा रही है। अभियुक्त अपने गुनाहों को स्वीकार कर चुका है और सार्वजनिक रूप से यह घोषणा भी कर चुका है कि वह क्षमादान नहीं मांगेगा। फिर भी, उसके  नाम पर कुछ लोग कटोरा लिए हुए घूम रहे हैं। यह अजीब स्थिति है। खलनायक और खलनायकी को वैध ठहराने के प्रयास किसी स्वस्थ व्यवस्था में तो नहीं होते। संजय दत्त का क्षमादान प्रकरण, पूंजी के अबाध प्रवाह के कारण पैदा हुए नवधनाढ्यों की अनियंत्रित मनःस्थिति का संकेतक है। यह अनियंत्रित मनोवृत्ति व्यवस्था को अपने ठेंगे पर नचाना चाहती है और सही-गलत को अपने ढंग से परिभाषित करने की कोशिश करती है। व्यवस्था में ऐसी मनोवृत्ति के शिकार लोगों का प्रचार पाना किसी भी दृष्टि से शुभ नहीं कहा जा सकता।
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हिन्दी हूं मैं…

एक रात जब मैं सोया तो मैंने एक सपना देखा, जिसका जिक्र मैं आपसे करने पर विवश हो गया हूं। सपने में मैं हिन्दी दिवस मनाने जा रहा था। तभी कहीं से आवाज आई…रुको! मैंने मुड़कर देखा तो वहां कोई नही था। मैं फिर चल पड़ा..फिर आवाज आयी…रुको! मेरी बात सुनो। मैंने गौर से सुना तो लगा कि कोई महिला जैसे वेदना भरे स्वर में मुझे पुकार रही हो। मैंने पूछा आप कौन हो जवाब आया…मैं हिन्दी हूं। मैंने कहा कौन हिन्दी\ मैं तो किसी हिन्दी नाम की महिला को नहीं जानता। दोबारा आवाज आई…तुम अपनी मातृभाषा को भूल गए, मेरे तो जैसे रोंगटे खडे़ हो गए…मैंने कहा मातृभाषा आप! मैं आपको कैसे भूल सकता हूं। फिर आवाज आयी…जब तुम सब मुझे बोलने में शर्म महसूस करते हो, तो भूलना न भूलना बराबर ही है।

फिर हिन्दी ने बोलना शुरू किया – तुम मेरी शोक सभा में जा रहे हो न,  मैंने कहा ऐसा नहीं है ये दिवस आपके सम्मान में मनाया जाता है। हिन्दी ने कहा – नहीं चाहिए ऐसा सम्मान… मेरा इससे बड़ा अपमान क्या होगा कि हिन्दुस्तानियों को हिन्दी दिवस मनाना पड़ रहा है।

उसके बाद हिन्दी ने जो भी कहा वो इन पंक्तियों के माध्यम से प्रस्तुत है…

 हिन्दी हूं मैं! हिन्दी हूं मैं..

भारत माता के माथे की बिन्दी हूं मैं

देवों का दिया ज्ञान हूं मैं,

हिन्दुस्तानियों का ईमान हूं मैं,

इस देश की भाषा थी मैं,

करोड़ों लोगों की आशा थी मैं,

हिन्दी हूं, मैं! हिन्दी हूं मैं..

भारत माता के माथे की बिन्दी हूं मैं।

सोचती हूं शायद बची हूं मैं,

किसी दिल में अभी भी बसी हूं मैं,

पर अंग्रेजी के बीच फंसी हूं मैं,

न मनाओ तुम मेरी बरसी,

मत करो ये शोक सभाएं,

मत याद करो वो कहानी,

जो नहीं किसी की जुबानी

सोचती थी हिन्द देश की भाषा हूं मैं,

अभिव्यक्ति की परिभाषा हूं मैं,

सच्ची अभिलाषा हूं मैं,

लेकिन अब निराशा हूं मैं,

जी हां हिन्दी हूं मैं,

भारत मां के माथे की बिन्दी हूं मैं।।

इस सपने के बाद मैं हिन्दी दिवस के किसी कार्यक्रम में नहीं गया। घर में बैठ कर बस यही सोचता रहा कि क्या आज सच में हिन्दी का तिरस्कार हो रहा है\ क्या हमें अपनी मातृभाषा के सम्मान के लिए किसी दिन की आवश्यकता है? शायद नहीं…

मेरा तो यही मानना है कि आप अपनी मातृभाषा को केवल अपने दिलों-जुबान से सम्मान दो और अगर ऐसा सब करें तो हर दिन हिन्दी दिवस होगा।

जय हिन्द, जय हिन्दी…

हिमांशु डबराल, सितम्बर अंक २०११

 

पूंजी प्रवाह के आगे नतमस्तक पत्रकारिता

लोकतंत्र में पत्रकारिता ही एक ऐसा पेशा है जिसे सामाजिक सरोकारों का सच्चा पहरूआ कह सकते हैं क्योंकि पत्रकारिता का लक्ष्य सच का अन्वेषण है। सामाजिक शुचिता के लिए सच का अन्वेषण जरूरी है। सच भी ऐसा कि जो समाज में बेहतरी की बयार को निर्विरोध बहाये जिसके तले हर मनुष्य खुद को संतुष्ट समझे।

पत्रकारिता का उद्भव ही मदांध व्यवस्था पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से हुआ था लेकिन आज की वर्तमान स्थिति में यह बातें बेमानी ही नजर आ रहीं हैं। खुद को आगे पहुंचाने और लोगों की भीड़ से अलग दिखने की चाह में जो भी अनर्गल चीज छापी या परोसी जा सकती हैं, सभी किया जा रहा है। अगर आज की पत्रकारिता को मिशन का चश्मा उतार कर देखा जाये तो स्पष्ट ह¨ता है कि मीडिया समाचारों के स्थान पर सस्ती लोकप्रियता के लिए चटपटी खबरों को प्राथमिकता दे रही है।

एक दौर हुआ करता था जब पत्रकारिता को निष्पक्ष एवं पत्रकारों को श्रद्धा के रूप में देखा जाता था। जो समाज के बेसहारों का सहारा बन उनकी आवाज को कुम्भकर्णी नींद में सोए हुक्मरानों तक पहुंचाने का माद्दा रखती थी। उस दौर के पत्रकार की कल्पना दीन-ईमान के ताकत पर सत्तामद में चूर प्रतिष्ठानों की चूलें हिलाने वाले क्रांतिकारी फकीर के रूप में होती थी। यह बात अब बीते दौर की कहानी बन कर रह गयी है। आज की पत्रकारिता के सरोकार बदल गये हैं और वह भौतिकवादी समाज में चेरी की भूमिका में तब्दील हो गयी है। जिसका काम लोगों के स्वाद को और मजेदार बनाते हुए उनके मन को तरावट पहुंचाना है। देश के सामाजिक चरित्र के अर्थ प्रधान होने का प्रभाव मीडिया पर भी पड़ा है और आज मीडिया उसी अर्थ लोलुपता की ओर अग्रसर है, या यूं कहिए की द्रुत गति से भाग रही है। इस दौड़ में पत्रकारिता ने अपने चरित्र को इस कदर बदला है कि अब समझ ही नहीं आता कि मीडिया सच की खबरें बनाती है या फिर खबरों में सच का छलावा करती है, लेकिन जो भी हो यह किसी भी दशा में निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं है।

पत्रकारिता का मूल उद्देश्य है सूचना, ज्ञान और मनोरंजन प्रदान करना। किसी समाचार पत्र को जीवित रखने के लिए उसमें प्राण होना आवश्यक है। पत्र का प्राण होता है समाचार, लेकिन बढ़ते बाजारवाद और आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण विज्ञापन इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि पत्रकारिता का वास्तविक स्वरूप ही बदल गया है। राष्ट्रीय स्तर के समाचारों के लिए सुरक्षित पत्रों के प्रथम पृष्ठ पर भी अर्द्धनग्न चित्र विज्ञापनों के साथ प्रमुखता से प्रकाशित हो रहे हैं। समाचार पत्रों का सम्पादकीय जो समाज के बौद्धिक वर्ग क¨ उद्वेलित करता था, जिनसे जनमानस भी प्रभावित होता था, उसका प्रयोग आज अपने प्रतिद्वन्द्वी को नीचा दिखाने के लिए किया जा रहा है। इससे पत्रकारिता के गिरते स्तर और उसकी दिशा को लेकर अनेक सवाल खडे़ हो गये हैं। फिल्म अभिनेत्रियों की शादी और रोमांस के सम्मुख आम महिलाओं की मौलिक समस्याएं, उनके रोजगार, स्वास्थ्य उनके ऊपर होने वाले अत्याचारों से संबंधित समाचार स्पष्ट रूप से नहीं आ पा रहें हैं। यदि होता भी है तो बेमन, केवल दिखाने के लिए।

पत्रकारिता के इतिहास पर नजर डाले तो समझ आता है कि भारत में पत्रकारिता अमीरों के मनोरंजन के साधन के रूप में विकसित होने की बजाय स्वतंत्रता संग्राम के एक साधन के रूप में विकसित हुई थी। इसलिए जब सन् 1920 के दशक में यूरोप में पत्रकारिता की सामाजिक भूमिका पर बहस शुरू हो रही थी, भारतीय पत्रकारिता ने प्रौढ़ता प्राप्त की। सन् 1827 में राजा राममोहन राय ने पत्रकारिता के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लिखा था- ‘मेरा उद्देश्य मात्र इतना है कि जनता के सामने ऐसे बौद्धिक निबंध उपस्थित करूं जो उनके अनुभव को बढ़ाएं और सामाजिक प्रगति में सहायक सिद्ध हो। मैं अपने शक्तिशाली शासकों को उनकी प्रजा की परिस्थितियों का सही परिचय देना चाहता हूं और प्रजा को उनके शासकों द्वारा स्थापित विधि व्यवस्था से परिचित कराना चाहता हूं ताकि जनता को शासन अधिकाधिक सुविधा दे सके। जनता उन उपायों से अवगत हो सके जिनके द्वारा शासकों से सुरक्षा पाई जा सके और अपनी उचित मांगें पूरी कराई जा सके। वर्तमान में राजा रामम¨हन राय की यह बातें केवल शब्द मात्र हैं जिन पर चलने में किसी भी पत्रकार की कोई रूचि नहीं है। आखिर उसे भी समाज में अपनी ऊंचाईयों को छूना है। आज के समय में मीडिया अर्थात् पत्रकारिता से जुड़े लोगों का लक्ष्य सामाजिक सरोकार न होकर आर्थिक सरोकार हो गया है। वैसे भी व्यवसायिक दौर में सामाजिक सरोकार की बातें अपने आप में ही बेमानी हैं। सरोकार के नाम पर अगर कहीं किसी कोने में पत्रकारिता के अंतर्गत कुछ हो भी रहा है तो वो भी केवल पत्रकारिता के पेशे की रस्म अदायगी भर है।

पत्रकारिता के पतित पावनी कार्यनिष्ठा से सत्य, सरोकार और निष्पक्षता के विलुप्त होने के पीछे वैश्वीकरण की भूमिका भी कम नहीं है। सभी समाचार-पत्र अन्तर्राष्ट्रीय अर राष्ट्रीय समाचारों के बीच झूलने लगे हैं। विदेशी पत्रकारिता की नकल पर आज अधिकांश पत्र सनसनी तथा उत्तेजना पैदा करने वाले समाचारों को सचित्र छापने की दौड़ में जुटे हैं। इन्टरनेट से संकलित समाचार कच्चे माल के रूप में जहां इन्हें सहजता से उपलब्ध हो रहे हैं, वहीं प्रौद्योगिकी का उपयोग कर अपने पत्रों को क्षेत्रीय रूप दे रहे हैं, जिसके कारण पत्रकारिता का सार्वभौमिक स्वर ही विलीन होने लगा है। ऐसी पत्र-पत्रिकाएं व टेलीविजन चैनल जो गे डे यानी कि समलैंगिकता दिवस मनाते हैं संस्कृति की रक्षा की बातों को मोरल पोलिसिंग कहकर बदनाम करने की कोशिशें करते हैं, भारतीय परंपरराओं और जीवन मूल्यों का मजाक उड़ाते हैं, खुलकर अश्लीलता, वासनायुक्त जीवन और अमर्यादित आचरणों का समर्थन करते हैं और कहते हैं कि यह सब वे पब्लिक डिमांड यानी कि जनता की मांग पर कर रहे हैं। परन्तु वास्तविकता यही है कि बाजारवाद से लाभान्वित होने के प्रयास में दूसरों पर दोषारोपण करके स्वयं को मुक्त नहीं किया जा सकता।

आज यदि महात्मा गांधी, राजा राममोहन राय, बाबू राव विष्णु पराड़कर या माखनलाल चतुर्वेदी जीवित होते तो क्या वे इसे सहन कर पाते, क्या उन जैसे पत्रकारों की विरासत को आज के पत्रकार ठीक से स्मरण भी कर पा रहे हैं\ क्या आज के पत्रकारों में उनकी उस समृद्ध विरासत को संभालने की क्षमता है\ ये प्रश्न ऐसे हैं जिनके उत्तर आज की भारतीय पत्रकारिता को तलाशने की जरूरत है, अन्यथा न तो वह पत्रकारिता ही रह जाएगी और न ही उसमें भारतीय कहलाने लायक कुछ होगा। इसके अलावा पत्रकारिता के लिए बड़ा खतरा गलत दिशा में बढ़ा कदम है, जिसके लिए बाजारवादी आकर्षण से मुक्त होकर पुनः स्थापित परंपरा का अनुसरण करना ही होगा, तभी पत्रकारिता की विश्वसनीयता बढ़ेगी। मीडिया संस्थानों और पत्रकारों को पीत पत्रकारिता एवं सत्ताभोगी नेताओं के प्रशस्ति गान के बजाय जनमानस के दुःख दर्द का निवारण, समाज एवं राष्ट्र के उन्नयन के लिए निःस्वार्थ भाव से कर्तव्य-पालन करना होगा, तभी वह लोकतंत्र में चौथे स्तंभ का अस्तित्व बनाये रखने में सफल हो सकेंगे।

आकाश राय, अगस्त अंक 2011

धुंधले होते सपने, मीडिया संस्थान की देन

पत्रकार शब्द सुनते ही हाथ में कलम, पैरों में हवाई चप्पल व कंधे पर एक झोला टांगे हुए व्यक्ति दिखाई देता है, जो देश की समस्यों पर गहन विचार करता है, लेकिन वास्तविकता में वर्तमान समय में इसका परिदृश्य बदल रहा है। पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र की ओर युवाओं का आकर्षण बढ़ा है जिसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह बदल रहा परिदृश्य ही है। पत्रकारिता के क्षेत्र में अधिकतर युवा मीडिया के ग्लैमर का हिस्सा बनने के सपने संजोए आते है। किंतु धीरे-धीरे उन्हें जब वास्तविकता से चित-परिचित होना पड़ता है तो उनके यह सपने धुंधले होते जाते है कि यहां अपना स्थान प्राप्त करना बड़ा सरल है।

इसका एक कारण जगह-जगह पर दुकानों की तरह खुलते मीडिया के शिक्षण संस्थान भी है। यह शिक्षण संस्थान व्यावहारिक ज्ञान की अपेक्षा किताबी ज्ञानों पर अधिक जोर देते हैं। जिसके कारण विद्यार्थी व्यावहारिक ज्ञान के अभाव में मीडिया जगत में स्वयं का स्थान बना पाने में अपने को असहज महसूस करता है।

विश्वविद्यालय तथा अनुदान प्राप्त कालेजों मे चल रहे पत्रकारिता कोर्सों में दी जा रही शिक्षा गुणवत्ता की कसौटी पर खरी नहीं उतर रही है। यहां पिछले डेढ़ दशक से वही घिसा-पिटा कोर्स पढ़ाया जा रहा है। इस तकनीकी युग में जब हर दिन एक नई तकनीक का विस्तार और आविष्कार हो रहा है तो वहां इस कोर्स की क्या अहमियत होगी! एक ओर जहां थ्रीडी, नए कैमरा सेटअप, न्यू मीडिया का प्रचलन बढ़ गया है, तो वहीं दूसरी ओर विश्वविद्यालयों का पाठ्यक्रम ज्यों का त्यों ही है।

इन कॉलेजों या संस्थानों में यह भी ध्यान नहीं दिया जाता कि वह इन छात्रों की प्राथमिक जरूरतें पूरी कर रहे हैं या नहीं। पत्रकारिता के क्षेत्र में अध्ययनरत विद्यार्थी को व्यवहारिक प्रशिक्षण के लिए प्रयोगशाला, उपकरणों व अच्छे पुस्तकालय की आवश्यकता होती है पर अधिकांश संस्थानों द्वारा इस समस्या की ओर ध्यान केन्द्रित नहीं किया जाता है। यह संस्थान मोटी फीस के बाद भी पुराने ढर्रे पर चलने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई देते हैं।

विडम्बना यह है कि विश्वविद्यालय के इन छात्रों ने किसी कैमरे के लेंस से यह झांककर भी नहीं देखा कि इससे देखने पर बाहर की दुनिया कैसी दिखाई देती है़, पत्रकारिता में दाखिला लेने और अपने तीन साल कॉलेज में बिताने के बदले छात्रों को एक डिग्री दे दी जाती है। ये एक ऐसा सर्टिफिकेट होता है जो किसी छात्र को बेरोजगार पत्रकार बना देता है। कुछ डिग्रीधारकों को  चवन्नी पत्रकारिता करने का अवसर मिल जाता है तो उन्हें सफल होने में कई साल लग जाते हैं। इसका कारण यह है कि उसे जो पढ़ाई के समय पर सिखाया जाना चाहिए था. उसे वह धक्के खाने के बाद सीखने को मिलता है। इस कारण कुछ छात्रों में इतनी हताशा घर कर जाती है कि वे पत्रकारिता को प्रणाम कर किसी और व्यवसाय को चुन लेते हैं।

यह कॉलेज तथा संस्थान न केवल उदीयमान पत्रकारों के भविष्य के साथ धोखा और भटकाव की स्थिति उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी हैं, अपितु भविष्य की पत्रकारिता को प्रश्न चिन्हों की ओर धकेल रहे हैं। जल्द ही कुछ उपाय करने होंगे ताकि गुणवत्ता वाले पत्रकार उभर सकें। इसके लिए कम्प्यूटर की बेहतर शिक्षा, लैब और लाइब्रेरी की जरूरतों को पूरा करने के साथ ही देश और दुनिया की सही समझ विकसित करने का काम भी इन संस्थानों को करना होगा।

वंदना शर्मा, जुलाई अंक, २०११

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