संवादसेतु

मीडिया का आत्मावलोकन…

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मदारी से मुद्दई बनता मीडिया

कांस्टीट्यूशन क्लब में मीडिया पर आयोजित एक संगोष्ठी में उपस्थित श्रोताओं की आलोचना से खीझकर आजतक के सम्पादक कमर वाहिद नकवी ने खुले मंच से कहा था कि-

मीडिया अब मदारी बन गया है। एक ऐसा मदारी जो तरह-तरह के तमाशे दिखाकर लोगों का मनोरंजन करता है, लेकिन व्यक्ति और समाज के अस्तित्व को चुनौती देने वाली मूल समस्याओं पर ध्यान देने की फुर्सत उसके पास नहीं है और न ही इन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने में उसकी कोई सहभागिता है।

कमर वाहिद नकवी का यह कथन प्रसिद्ध मीडिया विश्लेषक नोम चोमस्की की मीडिया को बाजारु खिलौना बनने के संदर्भ में की गयी टिप्पणी से मेल खाता है। चोमस्की कहते हैं कि –

अपने दर्शकों को बाजार के हाथों उपभोक्ता के रूप में बेचना अब मीडिया का प्राथमिक कार्य हो गया है।

इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक में भारतीय मीडिया विशेषकर इलेक्ट्रानिक मीडिया जिस दिशा में अग्रसर होने की कोशिश कर रहा था, खबरों के चयन और प्रस्तुतीकरण के जिस तरीके को अपनाया जा रहा था, उस पर दृष्टिपात करें तो उपरोक्त दोनों टिप्पणियां एक हद तक सही प्रतीत होती हैं। श्मशान पर किए जाने वाले विभिन्न तांत्रिक प्रयोगों और कापालिक क्रियाओं का प्रसारण एक्सक्लूसिव खबर के रूप में हमारे खबरिया चैनल कर रहे थे। कोई बकरा शराब क्यों पी रहा है, स्वर्ग के लिए सीढि़यां कहां से निकलती हैं, जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों को लेकर हमारे खबरिया चैनल कई दिनों तक माथापच्ची करते रहे।

राजू श्रीवास्तव के भद्दे चुटकुले और राहुल महाजन की अश्लील हरकतें मुख्य समाचार हुआ करते थे। किसी विशेष धारावाहिक के अगले एपीसोड में सास-बहू का रिश्ता किस मोड़ पर पहुंचेगा, इसका कयास भी खबरिया चैनल लगाते थे। समलैंगिकता जैसे गम्भीर मुद्दों पर विशेषज्ञों की राय जानने के लिए समाजशास्त्रियों की बजाय सेलिना जेटली जैसे सेलेब्रिटीज को आमंत्रित किया जाता था। इन महत्वपूर्ण खबरों के बीच यदि कोई रामसेतु आंदोलन हो जाता, तो पूरे देश में चक्काजाम होने तक उसके कवरेज की जरूरत नहीं समझी जाती थी। विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा जैसी छोटी-मोटी घटनाएं सामाजिक मुद्दों पर गहरी नजर और पैनी दृष्टि रखने का दावा करने वाले पत्रकारों की पकड़ में नहीं आती थीं, जबकि इस यात्रा के जरिए साढे़ आठ करोड़ भारतीयों ने हस्ताक्षर कर गोसंरक्षण और गोसंवर्धन के लिए राष्ट्रपति से गुहार लगायी थी। गो ग्राम यात्रा को मिला जनसमर्थन उस मतसंख्या के लगभग बराबर है, जिसको प्राप्त कर कोई राजनीतिक दल केन्द्र में सत्तारुढ़ हो सकता है। मीडिया के तृणमूल तथ्यों के प्रति अज्ञानता के अध्ययन के लिए विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा को केस स्टडी, के लिए चुना जा सकता है। वास्तव में इस दौर का मीडिया मदारी नहीं मदारी का बंदर बन गया था ।

यह सब कुछ अनवरत रूप से चल रहा था। इसी बीच कालेधन के मुद्दे को लेकर योगऋषि स्वामी रामदेव और जनलोकपाल बनाने को लेकर अन्ना हजारे मीडिया में अवतरित होते हैं। सम्पूर्ण मीडिया में इन दोनों व्यक्तियों और इनके द्वारा उठाए गए मुद्दों के प्रति दीवानगी देखने को मिलती है। प्रोटोजोआ प्रजाति के भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्डेटा प्रजाति के स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे के मैदान में उतरने की घटना न केवल भारतीय जनता को प्रेरित करती है बल्कि जनता को सम्मोहित करने वाली मीडिया को भी सम्मोहित करती है। मीडिया में आम आदमी से जुडे़ इन मुद्दों और इन मुद्दों को उठाने वाली आवाजों को पर्याप्त समय और स्थान मिलता है। साथ ही, इस मुद्दे के सतत कवरेज को लेकर मीडिया में एक सर्वसम्मति भी दिखाई दी।

आम आदमी से जुडे़ किसी मुद्दे पर सर्वसम्मति बनना भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया के इतिहास की एक दुर्लभतम घटना है। कभी किसी मुद्दे पर बनी भी तो वह दो चार दिनों में बिखर गयी। भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया का व्यवस्था विरोध भी एक दायरे में होता रहा है। मुद्दों के आधार पर व्यवस्था को खुली चुनौती देने की प्रवृति भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया में अभी तक नदारद रही है। व्यवस्था द्वारा निर्धारित दायरे में ही व्यवस्था का विरोध यह माध्यम करता रहा है।

दूसरे शब्दों में कहें तो इलेक्ट्रानिक मीडिया में मुद्दों को लेकर की जाने वाली मुद्दई पत्रकारिता नहीं की जाती थी। इस पड़ाव पर मुद्दई शब्द के संदर्भ में एक तथ्य स्मरण कराते चलें कि जब कोई व्यक्ति अथवा संस्था मुद्दों के आधार पर जीवनयापन की कोशिश करता है तो शोषणकारी व्यवस्था और व्यक्तियों से उसका टकराव स्वाभाविक हो जाता है। शायद इसीलिए न्यायालय में चलने वाले मुकदमों में प्रतिपक्ष को मुद्दई और समाज में अपने दुश्मन को भी मुद्दई कहा जाता है।

स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे के संदर्भ मे पहली बार इलेक्ट्रानिक मीडिया में न केवल एक सर्वसम्मति बनी बल्कि यह लम्बे समय तक चली भी। विशेषकर अन्ना हजारे के 16 अगस्त से प्रारम्भ होने वाले अनशन के संदर्भ में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने जिस अभूतपूर्व एकजुटता का परिचय दिया और जिस तरह व्यवस्था विरोध की व्यवस्था द्वारा निर्धारित पारंपरिक चैखटों को धराशायी किया, उससे इलेक्ट्रानिक मीडिया के बेहतर भविष्य से एक आस बंधी है।

हम जानते हैं कि भारतीय पत्रकारिता आनुवांशिक रूप से व्यवस्था विरोधी रही है। स्वतंत्रता पूर्व की पत्रकारिता अपने तेवरदार और व्यवस्था विरोधी रवैये के लिए जानी जाती है। स्वतंत्रता के पश्चात भी ऐसे कई मौके आए जब प्रिंट मीडिया ने अद्भुत एकजुटता का प्रदर्षन किया और व्यवस्था के खिलाफ जाकर मुद्दों को उभारने का प्रयास किया। प्रिंट मीडिया के इस मुद्दई रवैये के कारण ही व्यवस्था को कई बार शीर्षासन करना पड़ा। अन्ना के अनशन को लेकर भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया पहली बार उस मोड में दिखी जिसकी उससे अपेक्षा की जाती रही है।

इलेक्ट्रानिक मीडिया का यह व्यवस्था विरोधी न्यू मोड न केवल आम जनता के लिए बल्कि खुद उसके स्वास्थ्य के लिए भी लाभप्रद है। ऊल-जलूल कार्यक्रमों के प्रसारण से पैदा हुए विश्वसनीयता के संकट ने खुद मीडिया की प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर दिया था। शायद इसी कारण नेता-अभिनेता भी बीच बहस में रुककर मीडिया को आईना दिखा देते थे। आजतक पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम सीधी बात में एक बार अभिनेता शाहरुख खान ने प्रभु चावला को लगभग डांटते हुए कहा था कि-

आप लोग जिस तरह अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए ऊल-जलूल कार्यक्रम दिखाते हैं, ठीक उसी तरह हम भी फिल्म को सफल बनाने के लिए कई स्टंट करते हैं। हम और आप दोनों पैसा कमाने के लिए यह सब करते हैं। फिर आपको नैतिक प्रश्न पूछने का क्या अधिकार है।

इसी तरह उदयन शर्मा की पुण्यतिथि पर आयोजित एक कार्यक्रम में कपिल सिब्बल ने मीडिया की क्षमताओं पर कई सवाल खडे़ कर दिए थे। यह बात 2009 के चुनावों के तुरंत बाद की है। ऐसा नहीं था कि इलेक्ट्रानिक मीडिया का प्रभाव क्षीण हो गया था बल्कि वह इतना विखंडित था कि अनेक सटीक मुद्दों पर भी उसका स्वर मास मोबलाईजेशन की परिघटना को जन्म नहीं दे पाता था। जब सभी चैनलों ने एक स्वर में अन्ना के अनशन से जुड़े मुद्दों को उठाया और लगभग 12 दिनों तक उसकी सतत कवरेज की, तब जाकर सत्ताधारियों को इलेक्ट्रानिक मीडिया की ताकत का अंदाजा लगा। सूचना एवं प्रसारण मंत्री ने चैनलों से सभी पक्षों को दिखलाने का आग्रह किया तो दूसरी तरफ कुछ सरकारी प्रवक्ताओं ने अन्ना की आंधी को मीडिया मैनेज्ड, कहकर मीडिया की ताकत को अनिच्छापूर्वक स्वीकार किया।

इस पूरे प्रकरण से यह भी स्पष्ट हुआ है कि मीडिया की असली ताकत आम जनता ही है। आम जनता की आवाज को प्रतिध्वनित कर इलेक्ट्रानिक मीडिया अपने व्यावसायिक हितों और सामाजिक प्रतिबद्धता को एक साथ साध सकती है। आवश्चकता केवल इस बात की है कि अन्ना के अनशन के समय उभरी मुद्दई प्रवृति समय-समय पर मुखरित होती रहे। मुद्दई प्रवृत्ति को अपवाद की बजाय स्थायी भाव बनाकर ही मीडिया भारत की पहचान और अपनी भूमिका को  बेहतर ढंग से परिभाषित और पोषित कर सकती है।

जयप्रकाश सिंह, सितम्बर अंक, २०११

 

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प्रेस पर अंकुश की मानसिकता

जनमत निर्माण एवं समाज को दिशा-निर्देश देने का महत्वपूर्ण दायित्व प्रेस पर है। जहां तक क्रांतिकारी आंदोलन का सम्बन्ध है भारत का क्रांतिकारी आंदोलन बन्दूक और बम के साथ नहीं समाचार पत्रों से शुरू हुआ, उक्त बातें जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी ने युगान्तर में कही है, किन्तु जनचेतना की शुरूआत करने वाले इस चतुर्थ स्तम्भ की स्वतंत्रता पर आजादी के पूर्व से ही अंकुश लगाए जाते रहें हैं।

29 जनवरी 1780 को जेम्स अगस्टस हिक्की द्वारा प्रारम्भ किए गए साप्ताहिक कलकत्ता जनरल एडवरटाईजर एवं हिक्की गजट से भारत में पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत मानी जाती है। इसका आदर्श वाक्य था- सभी के लिए खुला फिर भी किसी से प्रभावित नहीं। हेस्टिंग्स की शासन शैली की कटु आलोचना का पुरस्कार हिक्की को जेल यातना के रूप में मिला।

सत्ता के दमन के विरूद्ध संघर्ष के कारण गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने हिक्की के पत्र प्रकाशन के अधिकार को समाप्त कर दिया। इस समाचार पत्र का संपादन मात्र दो वर्षों (1780–82 तक ही रहा। कालान्तर में भारतीय पत्रकारिता ने इसी साहसपूर्ण मार्ग का अनुसरण करते हुए सत्य एवं न्याय के पक्ष में संघर्ष का बिगुल बजाया। ऐसे में सत्ता से टकराव स्वाभाविक ही था। पराधीन भारत के इतिहास के अनेक पृष्ठ अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य के प्रति समाचार पत्रों की आस्था के उदाहरणों से भरे पड़े हैं। अंग्रेजी सरकार राष्ट्रीय और सामाजिक हितों एवं दायित्वों की आड़ में अपने स्वार्थों के पोषण के लिए प्रेस पर किसी न किसी प्रकार का नियंत्रण बनाये रखना चाहती थी।

लार्ड वेलजली द्वारा सेंसर आदेश, 1799 में) लागू कर दिया गया। समाचार पत्रों के अंत में मुद्रक का नाम व पता प्रकाशित करना अनिवार्य कर दिया गया। संपादक व संचालन के नाम, पते की सूचना सरकार के सचिव को देनी भी अनिवार्य कर दी गई। किसी भी समाचार के प्रकाशन से पूर्व सचिव द्वारा जांच के आदेश के प्रावधान बनाए गए। रविवार को समाचार पत्र के प्रकाशन पर पाबंदी लगा दी गई। इस सेंसरशिप को लार्ड हेस्टिंग्स ने सन् 1813 में समाप्त कर दिया।

सन् 1823 में एडम गवर्नर जनरल ने एडम अधिनियम जारी किया जिसमें प्रेस के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया गया। सर चाल्र्स मेट्काफ प्रेस की स्वतंत्रता के प्रति उदार थे। उनके द्वारा सन् 1835 में मेट्काफ एक्ट पारित किया गया। इसके साथ-साथ सन् 1823 के एडम एक्ट में भी परिवर्तन किया गया। भारतीय पत्रकारिता को एक बार फिर प्रभावित करने के लिए अंग्रेजी शासन व्यवस्था द्वारा सन् 1857 में गैगिंग एक्ट लागू किया गया और सन् 1823 के एडम एक्ट का प्रत्यारोपण किया गया और पुनः लाइसेंस लेने का अधिनियम लागू कर दिया गया। 1864 में वायसराय लार्ड डफरिंग के कार्यकाल में शासकीय गोपनीयता कानून था, जिसका उद्देश्य उन समाचार पत्रों के खिलाफ कार्यवाही करना था जो गुप्त सरकारी दस्तावेज प्रकाशित करते थे।

सन् 1835 के मेट्काफ एक्ट से मुक्ति दिलाने के लिए लार्ड लारेंस ने सन् 1867 में समाचार पत्र अधिनियम लागू किया। इस अधिनियम के अनुसार प्रेस के मालिकों को मजिस्ट्रेट के सम्मुख घोषणा पत्र देना आवश्यक था। सन् 1867 का अधिनियम कुछ संषोधनों के साथ आज भी चला आ रहा है। इसका उद्देष्य छापेखानों को नियंत्रित करना है।

भारतीय समाचारपत्रों को कुचलने के लिए सन् 1878 में वर्नाक्यूलर एक्ट लगाया गया। इस कानून के तहत सरकार ने बिना न्यायालय के आदेश के भारतीय भाषाओं के प्रेस के मुद्रकों और प्रकाशकों को जमानत जमा करने तथा प्रतिज्ञा पत्र देने के आदेश दिए, ताकि वह ऐसी बातों का प्रकाशन नहीं करेंगे जिससे सरकार के प्रति घृणा उत्पन्न हो या समाज में वैमनस्य फैले। इसके साथ ही अवांछनीय सामग्री को जब्त करने के आदेश भी दिए गए। इस कानून की भारतीयों ने कड़ी निन्दा की। आंग्ल समाचार पत्रों को इस अधिनियम से मुक्त रखा गया जिससे भारतीयों में रोष और बढ़ गया। सन् 1878 के वर्नाक्यूलर एक्टको 1881 में समाप्त किया गया।

ब्रिटिश सरकार ने सन् 1910 में भारतीय प्रेस अधिनियम लगाया और भारतीय पत्रकारिता पर अपना अंकुश और भी सख्त कर दिया। इस अधिनियम के अंतर्गत मुद्रकों को 7 हजार से लेकर 10 हजार रूपए तक जमानत देने को कहा गया। किसी भी आपत्तिजनक खबर के छपने पर धनराशि जब्त करने का अधिकार मजिस्ट्रेट को दिया गया। यह कानून 12 वर्षों तक प्रभाव में रहा और सन् 1922 में इसे रद्द कर दिया गया।

सन् 1930 में वायसराय इरविन ने देषव्यापी आंदोलन को देखते हुए प्रेस एंड अनआथराइज्ड न्यूज पेपर्सअध्यादेश को मई-जून से लागू कर दिया । इस अध्यादेश द्वारा सन् 1910 की सम्पूर्ण पाबंदियों को पुनः लागू कर जमानत की राशि 500 रूपए से और अधिक बढ़ा दिया गया। इसके अतिरिक्त सरकार ने हैंडबिल व पर्चों पर भी प्रतिबंध लगा दिया।

सन् 1931 में जब पूरा देश एवं राजनेता गोलमेज सम्मेलन में व्यस्त थे तो ब्रिटिश सरकार ने ऐसे समय का पूरा लाभ उठाते हुए प्रेस बिल 1931, के अध्यादेश को कानून के रूप में पारित करा लिया। इसके अंतर्गत सरकार ने समाचारपत्रों के शीर्षक, संपादकीय टिप्पणियों को बदलने का अधिकार भी अपने पास सुरक्षित रख लिया। इसके पश्चात सन् 1935 में भारतीय प्रशासन कांग्रेस के हाथ में आ गया और फलतः समाचार पत्रों को स्वतंत्रता प्राप्त हुई।

सन् 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारम्भ होते ही कांग्रेस सरकार को पदत्याग करना पड़ा और पत्रों की स्वतंत्रता पुनः नष्ट हो गई, जो सन् 1947 तक चली। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सन् 1950 में नया कानून बना जिसके द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता को पुनः स्थापित किया गया।

सरकार की छत्रछाया में विकसित होती भारतीय प्रेस की गति को अवरूद्ध करने के प्रयास भी लगभग दो शताब्दी पूर्व प्रारम्भ हो गये थे जो सन् 1947 तक किसी न किसी प्रकार जारी रहे। इन बाधाओं के बावजूद भारतीय प्रेस ने संघर्ष का मार्ग नहीं छोड़ा।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात देश में सन् 1867 में अंग्रेजों द्वारा बनाया गया प्रेस कानून ही कार्य पद्धति में लागू था, जिसमें सर्वप्रथम बड़ा संशोधन सन् 1955 में पहले प्रेस आयोग की सिफारिशों के आधार पर किया गया। इसके साल भर बाद सन् 1956 में रजिस्ट्रार आफ न्यूज पेपर्स आफ इंडिया (आरएनआई) के कार्यालय ने काम शुरू किया। इसके पश्चात आजाद भारत में स्वतंत्र पत्रकारिता पर दमन का आरम्भ आपातकाल 1974-75 से शुरू हुआ।

चर्चित पत्रकार और मानवाधिकार विशेषज्ञ कुलदीप नैयर ने कहा है कि-

इमरजेंसी भारतीय इतिहास का एक दुखद काल था, जब हमारी आजादी लगभग छिन सी गई थी और आपातकाल आज भी अनौपचारिक रूप से देश में अलग-अलग रूपों में मौजूद है, क्योंकि शासक वर्ग, नौकरशाही, पुलिस और अन्य वर्गों के पूर्ण सहयोग से अधिनायकवादी और लोकतंत्र विरोधी गतिविधियों में लिप्त है।

आपातकाल के समय भारतीय पत्रकारिता जगत में इलेक्ट्रानिक मीडिया के नाम पर केवल सरकारी रेडियो और सरकारी चैनल अर्थात दूरदर्शन मात्र था, जिनसे वैसे भी तात्कालिक सरकार को कोई खतरा नहीं था, लेकिन देश भर के अखबारों पर लगी सेंसरशिप ने तो जैसे आम जनता की आवाज का गला ही घोंट दिया था। तात्कालिक समय में अखबारों में जो कुछ भी छपना होता था, वो संपादक की कलम से नहीं बल्कि सेंसर की कैंची से कांट-छाट करके छपती थी।

आपातकाल के समय अखबार मालिक अपने दफ्तरों में जाकर खबरों को उलटते पलटते थे और उन्हें जिन खबरों में सरकार की आलोचना व खिलाफत का अंदेशा होता, वे उस खबर को छपने से रोक देते थे। देश में लगभग 19 माह तक ऐसी स्थिति व्याप्त थी। जनता सरकार द्वारा सन् 1978 में द्वितीय प्रेस आयोग का गठन किया गया, इसके गठन का मुख्य उद्देश्य आपातकाल के परिप्रेक्ष्य में प्रेस की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना था। मोरारजी देसाई काल में गठित इस आयोग ने अपनी रिर्पोट सन् 1982 में तैयार की, लेकिन इस चार वर्ष की अवधि में देश का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह से बदल चुका था। यहां हमें यह याद रखने की आवश्यक्ता है कि प्रथम आयोग और द्वितीय आयोग के गठन के बीच 26 वर्ष का अंतराल था। इस अंतराल के बाद भारतीय प्रेस में कई परिवर्तन आ चुके थे। इसी क्रम में वर्तमान पत्रकारिता के स्तर में सुधार हेतु तृतीय प्रेस आयोग के गठन का प्रस्ताव रखा गया है।

इन सब प्रतिबंधों के बाद भी वर्तमान समय में चतुर्श स्तंभ की भूमिका नीचे दी गई पंक्तियों से स्पष्ट है-

जमीं बेच देंगे, गगन बेच देंगे

चमन बेच देंगे, सुमन बेच देंगे

कलम के सिपाही अगर सो गए तो,

वतन के मसीहा वतन बेच देंगे।।

 

अमल कुमार श्रीवास्तव, अगस्त अंक, २०११

अन्ना, रामदेव, सरकार और मीडिया…

लोकतंत्र का चैथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया के लिए पिछले कुछ महीनों में आमरण अनशन व धरना प्रदर्शन जैसी खबरों का भरमार रहा। कभी अन्ना हजारे द्वारा जन लोकपाल विधेयक को लेकर जंतर-मंतर पर किया गया प्रदर्शन, तो कभी बाबा रामदेव द्वारा देश से भ्रष्टाचार को खत्म करने और विदेशी बैंकों में जमा ४ सौ लाख करोड़ रुपये देश में वापस लाकर उसे राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने के लिए दिल्ली के रामलीला मैदान में किया गया आमरण अनशन। अन्ना हजारे व बाबा रामदेव दोनों ने ही राष्ट्रीय हित के मुद्दे को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर अपना आन्दोलन किया, जिसे मीडिया ने भी अपने-अपने तरीके से प्रस्तुत किया। एक तरफ जहां हिंदी मीडिया ने खबरों को विस्तृत रूप में दिखाया वहीं अंग्रेजी मीडिया ने कुछ इसे आशंकाओं के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया और जनता को जवाबदेह बना दिया ।

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के मामले पर मीडिया कवरेज की चर्चा करने से पूर्व यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि आखिरकार मामला है क्या, अन्ना हजारे द्वारा जनलोकपाल विधेयक लाए जाने का समर्थन करना और उसको राष्ट्रीय स्तर पर लाना कितना सार्थक है यह जानना अतिआवश्यक है। अन्ना ने लोकपाल विधेयक को लेकर आमरण अनशन किया और प्रधानमन्त्री और न्यायाधीशों को कटघरे में लाने की बात की है। लोकपाल का दायित्व इतना मात्र है कि अगर प्रधानमन्त्री के ऊपर भी भ्रष्टाचार को लेकर कोई आरोप लगता है तो वह एक जांच कमेटी बनाकर उसकी रिपोर्ट मुख्य न्यायाधीश को सौप देगा।

हालांकि इसके लिए पूर्व से ही सीबीआई को यह अधिकार प्राप्त है लेकिन अन्ना को लगता है कि सीबीआई केंद्र सरकार के अधीनस्थ है, इसलिए जांच रिपोर्ट सत्य नहीं हो सकती लेकिन अन्ना इस बात से सहमत है कि लोकपाल विधेयक कमेटी में सरकार के भी ५ सदस्य शामिल हो सकते है। इंडिया टीवी पर प्रस्तुत होने वाले कार्यक्रम आप की अदालत, १८ जून २०११) में अन्ना हजारे ने स्पष्ट रूप से यह बातें कहीं। अब अगर बाबा रामदेव के आन्दोलन की चर्चा करें तो बाबा ने मुद्दा उठाया है कि ४ सौ लाख करोड़ रुपये का काला धन, जो विदेशी बैंकों में जमा है, वो देश में वापस लाकर उसे राष्ट्रीय संपत्ति सरकार द्वारा घोषित की जाए। बाबा रामदेव का मानना है कि विदेशी बैंकों में काले धन के रूप में देश की इतनी बड़ी संपत्ति अगर वापस देश में आ जाती है तो स्वाभाविक रूप से देश का विकास होगा।

अब यहां बात यह आती है कि यह कालाधन आखिर है किसका तो यह भी स्पष्ट है कि यह कालाधन हसन अली जैसे लोगों द्वारा ही जमा कराया गया होगा। एक पत्रिका ने अपने एक पुराने अंक में प्रकाशित एक खोजपरक रिपोर्ट में राजीव गांधी का नाम भी शामिल किया था। पत्रिका ने लिखा था कि तीसरी दुनिया के तेरह नेताओं के साथ राजीव गांधी का खाता भी स्विस बैंक में हैं। पत्रिका के अनुसार, वर्तमान समय में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के अरबों रुपये स्विस बैंक के उस खाते में जमा हैं जिसे राजीव गाँधी ने खुलवाया था। जब सत्ता पर आसीन लोगों पर ऐसे आरोप लगाए जा रहें हो तो आम आदमी के हित से जुड़े मुद्दे पर किए जाने वाले आन्दोलन का हश्र क्या होगा\ यह हर बुद्धजीवी भली-भाति समझ सकता है।

अब अगर इन दोनों राष्ट्रीय स्तर की खबरों पर मीडिया कवरेज की बात करें तो अन्ना हजारे के अनशन को इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने २४ घंटों का कवरेज दिया। वहीं प्रिंट मीडिया भी उनसे संबंधित खबरों से सराबोर दिखाई दी।

 अन्ना पर मीडिया कवरेज

अन्ना के आंदोलन के दौरान युवाओं को यह कहते पाया गया कि उन्होंने न तो जेपी को देखा और न ही गांधी को देखा, उनके लिए अन्ना हजारे ही गांधी और जय प्रकाश नारायण हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि अन्ना हजारे ने शहरी युवाओं को जगाया है। आज के संदर्भ में यह एक अनोखी उपलब्धि है।

(चौथी दुनिया दुनिया, २९ अप्रैल २०११)

दिल्ली में अप्रैल में 97 घंटे की भूख हड़ताल पर बैठे 73 वर्षीय अन्ना हजारे के आंदोलन के चलते केंद्र सरकार ने मजबूत लोकपाल विधेयक का प्रारूप तैयार करने के लिए एक संयुक्त समिति गठित की। समिति में 5 केंद्रीय मंत्री व प्रबुद्ध समाज के 5 सदस्य शामिल हैं।

(नवभारत टाइम्स, १२ मई २०११)

कोलकाता में इस बार कांग्रेस के नेता प्रणब मुखर्जी ने बाबा रामदेव के साथ-साथ अन्ना हजारे पर हमला बोला है। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि बाबा के अनशन के पीछे भगवा ब्रिगेड है। उन्होंने कहा है कि बाबा के अनशन को संघ का समर्थन हासिल है और उनके आंदोलन के लिए संघ ने तमाम चीजें मुहैया करवाई। उन्होंने कहा कि देश में जो इस तरह के आंदोलन हो रहे हैं उसके पीछे आरएसएस का हाथ है.

(आईबीएन लाइव)

फिल्म अभिनेता अनुपम खेर का भी अन्ना के आन्दोलन को समर्थन

(पंजाब केसरी, २५ मई २०११)

अन्ना हजारे का कहना है कि लोकपाल विधेयक पर जो जनता की मांग होगी, वह सरकार को माननी ही होगी। लोकपाल के दायरे से प्रधानमंत्री को बाहर रखने के सरकार के रुख पर अन्ना का कहना था कि जनता इसके पक्ष में नहीं है। भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए प्रस्तावित लोकपाल विधेयक का ड्राफ्ट तैयार कर रही ड्राफ्ट समिति में गहरे मतभेद उभरने के बाद समिति में नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) की तरफ से शामिल सदस्यों ने नई मांग रखी है। सिविल सोसाइटी की ओर से समिति में शामिल सदस्यों ने बुधवार को एक चिट्ठी लिखकर केंद्र सरकार को उन मुद्दों पर बहस करने के लिए न्योता भेजा है, जिन पर सरकार से उनकी सहमति नहीं बन पा रही है। सिविल सोसाइटी के सदस्यों का यह भी कहना है कि इस बहस का टीवी पर प्रसारण होगा और इसे देश की जनता भी देखेगी।

(दैनिक राष्ट्रीय उजाला, २ जून २०११ )

बाबा रामदेव पर मीडिया का रूख

दूसरी ओर बाबा रामदेव के आन्दोलन पर मीडिया की कवरेज शुरुआती दौर में कुछ इस प्रकार से थी कि बाबा रामदेव दिल्ली के रामलीला मैदान पर आमरण अनशन के लिए बैठ गये है और उनके समर्थकों का ताता लगा जा रहा है । अर्थात मामले को इस प्रकार से परोसा जा रहा था कि अगर इसे यहीं समाप्त नहीं किया गया तो दिल्ली की शांति व्यवस्था भंग हो जाएगी ।

जबकि इलेक्ट्रोनिक मीडिया के ही एक बड़े चैनल इंडिया टीवी द्वारा ५ जून को सुबह २.१८ बजे रामलीला मैदान में पुलिसियां कार्रवाई के समय बाबा द्वारा अपने समर्थकों को यह कहते हुए दिखाया कि पुलिस चाहे आप पर कितना भी जुल्म करे मेरे कोई भाई उनका जवाब हिंसक रूप में नहीं देंगे।

इसी घटनाक्रम के दौरान जब बाबा रामदेव ६ घंटों के लिए गायब हो जाते हैं तो इलेक्ट्रोनिक मीडिया के कुछ बड़े चैनलों पर खबर को कुछ इस प्रकार से दिखाया जाता है कि – कहीं इस कार्रवाई में बाबा की मृत्य तो नहीं हो गई, कहीं सरकार ने बाबा को किसी गुप्त जगह छुपा तो नही दिया ६ घंटे के बाद भी बाबा का कोई पता नहीं। लेकिन चंद घंटों में जब यह पता चलता है कि बाबा रामदेव हरिद्वार स्थित पतांजलि योगपीठ पहुंच गए हैं तो सारी मीडिया उनके कवरेज के लिए हरिद्वार पहुंच गई। ५ जून की सुबह जिस आईबीएन7 व इंडिया टीवी पर खबरें इस रूप में चल रहीं थी कि मानों पुलिस और सरकार की मिली भगत से बाबा रामदेव पर बर्बरतापूर्वक कहर ढाया गया है, उसी चैनल पर कुछ ही घंटों बाद खबर का रूख बदलता दिखाई दिया। इन चैनलों पर अब दिखाया जा रहा था कि जब बाबा के साथ इतना बड़ा जनसमर्थन था तो बाबा भागे क्यों औरतों के वस्त्र में बाबा भागे बाबा रामदेव के पास कितने की संपत्ति आदि।

प्रिंट मीडिया में खबरें कुछ इस प्रकार से थी-

बाबा रामदेव ने खुद को बताया भगवान राम और महात्मा गांधी

(दैनिक भास्कर, 21 मार्च 2011

हालांकि खबर में रामदेव के हवाले से लिखा गया था कि मैं तो वही कर रहा हूं जो महात्मा गांधी और भगवान राम ने किया था। जब भगवान राम को नहीं बख्शा गया तो वे मुझे कैसे छोड़ सकते हैं.

रामलीला मैदान में मध्य रात्रि में अभियान चलाने का फैसला राजनैतिक था। यह बात रविवार को दिल्ली पुलिस के एक शीर्ष अधिकारी ने कही। पुलिस अधिकारी ने कहा कि यह राजनैतिक फैसला था। अन्यथा हम अभियान नहीं चलाते।

(हिन्दुस्तान ,५ जून २०११)

‘‘रात के अंधेरे में जब रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन कर रहे योग गुरु बाबा रामदेव के समर्थन में ५० हजार से अधिक लोग भूखे सो रहे थे तो दिल्ली पुलिस के हजारों जवानों ने उन पर हमला बोल दिया, आंसू गैस के गोले दागे गए, मंच तोड़ दिया गया, आग लगा दी गई, सो रहे लोगों को घसीटा गया, महिलाओं से दुर्व्यवहार किया गया, बच्चों तक को नहीं बख्शा गया। देश के कोने-कोने से आए लोगों पर ढाए गए बर्बर जुल्म ने आपातकाल की याद ताजा कर दी।

(पंजाब केसरी, ६ जून २०११)

एक लाख मासूम लोगों को रामलीला मैदान में आधी रात को लाठियों और आंसू गैस छोड़कर भगाने की बर्बर कार्रवाई मनमोहन सिंह सरकार द्वारा की गई। ये लोग दिनभर अनशन पर थे। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के कारण इस भीड़ में कोई व्यक्ति हथियार या लाठी तक नहीं ले जा सकता था। हजारों निहत्थों असहाय लोगों पर ऐसे पुलिस कार्रवाई आधुनिक भारत के ६४ वर्षों के इतिहास में कभी नहीं हुई और कभी होनी भी नहीं चाहिए।

(नई दुनिया, ६ जून २०११)

कोई सरकार अपने कर्मों से किस तरह खुद को कलंकित कर सकती है, इसका निकृष्ट उदाहरण है केन्द्रीय सत्ता। चार जून की रात केन्द्रीय सत्ता की नाक के नीचे रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के समर्थकों को, यहां तक कि महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के साथ जो हुआ उसे बर्बरता के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। केंद्र सरकार ने निहत्थे लोगों के साथ पशुवत व्यवहार कर खुद को शर्मसार करने के साथ ही देश को यह अवसर दिया है कि वह उसकी निंदा और भत्सर्ना करने के लिए आगे आए। रामलीला मैदान में सोते हुए लोगों पर पुलिसियन कार्रवाई आपातकाल की याद दिलाने के साथ ही ढुलमुल और दिन-प्रतिदिन आम जनता का विश्वास खोती जा रही मनमोहन सिंह सरकार के अहंकार को भी रेखांकित करती है।

(दैनिक जागरण,६ जून २०११)

यह तो था मीडिया में प्रसारित दोनों राष्ट्रीय मुद्दों के खबरों पर प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया का दृष्टिकोण। अब सत्ता आसीन सरकार की बात करें तो मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह द्वारा दिया गया बयान कुछ इस प्रकार से था-

भोपाल, 25 जून, भाषाः कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने आज फिर कहा कि उन्होंने ऐसा कभी कोई बयान नहीं दिया था. जिसमें अन्ना हजारे के साथ भी बाबा रामदेव जैसा सलूक करने जैसी कोई बात कही गयी हो। कांग्रेस महासचिव ने यह बात भाजपा के राज्यसभा सदस्य अनिल माधव दवे को लिखे एक पत्र के जवाब में लिखी और कहा कि भाजपा सांसद ने अपने पत्र में एक भ्रामक समाचार को आधार बनाकर अपने संघीय संस्कारों के अनुरुप उन पर आरोपों की झड़ी लगा दी थी।

उक्त बयान से यहां सरकार की मंशा तो साफ है कि सरकार किस आन्दोलन को अपने लिए अहितकर समझ रही है लेकिन सवाल चैथे स्तम्भ की भूमिका की करें तो यह स्तम्भ आज आम आदमी के लिए न्याय की गुहार का अंतिम दरवाजा है। जब आम आदमी हर तरफ से हार मान जाता है तो उसके पास सिर्फ एक ही विकल्प बचता है और वो है ‘मीडिया‘। लेकिन अगर घटनाओं पर नजर डाले तो क्या अब ऐसी स्थिति स्पष्ट होती है कि आम आदमी को यहां से भी उचित समर्थन प्राप्त हो सकेगा ।

अमल कुमार श्रीवास्तव, जुलाई अंक, २०११

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