संवादसेतु

मीडिया का आत्मावलोकन…

Archive for the category “आवरण कथा”

वाद, विवाद, अनुवाद की छाया से मुक्त हो हिन्दी पत्रकारिता

हिन्दी के सर्वप्रथम दैनिक उदन्त मार्तण्ड के प्रथम और अंतिम संपादक पंडित युगल किशोर शुक्ल ने लिखा था-

इस उदन्त मार्तण्ड, के नांव पढ़ने के पहिले पछाहियों के चित का इस कागज न होने से हमारे मनोर्थ सफल होने का बड़ा उतसा था। इसलिए लोग हमारे बिन कहे भी इस कागज की सही की बही पर सही करते गये पै हमें पूछिए तो इनकी मायावी दया से सरकार अंगरेज कम्पनी महाप्रतापी की कृपा कटाक्ष जैसे औरों पर पड़ी, वैसे पड़ जाने की बड़ी आशा थी और मैंने इस विषय में यथोचित उपाय किया पै करम की रेख कौन मेटै। तिस पर भी सही की बही देख जो सुखी होता रहा अन्त में नटों कैसे आम आदमी दिखाई दिए इस हेत स्वारथ अकारथ जान निरे परमारथ को कहां तक बनजिए अब अपने व्यवसायी भाइयों से मन की बात बताय बिदा होते हैं। हमारे कुछ कहे सुने का मन में ना लाइयो जो देव और भूधर मेरी अंतर व्यथा और इस गुण को विचार सुधि करेंगे तो ये गुण मेरे ही हैं। शुभमिति।

यह उद्धरण उस समय का है जब उदन्त मार्तण्ड लगभग अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था। आज इस घटना को लगभग 183 वर्ष होने को हैं लेकिन हालात बहुत कुछ नहीं बदले हैं। बस इतना सा अंतर आया है कि तब पंडित युगल किशोर शुक्ल व्यापारियों से आगे आने को कह रहे थे और आज व्यापारी वर्ग आगे तो आ चुका है मगर आगे आने का उसका एकमात्र उद्देश्य मुनाफा कमाना है। उसे हिन्दी, हिन्दी भाषियों और हिन्दी की पत्रकारिता से कोई भावनात्मक लगाव नहीं है।

यही वजह है कि हर साल हिन्दी दिवस के मौके पर इस भाषा के बढ़ते बाजार, हिन्दीभाषियों की संख्या, इसकी तकनीकी क्षमता के विस्तार और इस प्रकार के तमाम आंकड़ों के सुर्खियों में आने के बावजूद हिन्दी पत्रकारिता अपने स्वतंत्र अस्तित्व के लिए जूझती दिखती है। कहने को हिन्दी पत्रकारिता के बाजार का विस्तार हो रहा है, इसमें निवेश बढ़ रहा है लेकिन साथ ही यह भी कटु सत्य है कि अपनी शुरुआत के 185वें वर्ष में प्रवेश करने के बाद भी हिन्दी पत्रकारिता वाद, विवाद और अनुवाद की छाया से मुक्त नहीं हो पा रही है जिसके कारण सार्थक परिणाम भी नहीं दे पा रही है।

वाद और विवाद सिर्फ हिन्दी की समस्याएं नहीं है बल्कि ये अनुवाद के रास्ते ही हिन्दी जगत में आयी हैं। दरअसल, अनुवाद पर आश्रित होने की वजह से ही हिन्दी पत्रकारिता अंग्रेजी की ही तरह भ्रामक वादों और तुच्छ विवादों में घिरकर अपने मूल उद्देश्य को लगभग भुला चुकी है। इसलिए आज सबसे बड़ी जरूरत उसे अनुवाद की इस छाया से मुक्त करने की है ताकि हिन्दी की पत्रकारिता अपना मौलिक ढांचा विकसित कर सके और हिन्दी के अनुकूल व्यवस्थाएं तैयार हो सकें।

शुक्ल जी ने ही उदन्त मार्तण्ड के प्रथम अंक में लिखा था-

यह उदन्त मार्तण्ड अब पहिले पहल हिन्दुस्तानियों के हित हेतु जो आज तक किसी ने नहीं चलाया पर अंग्रेजी ओ फारसी ओ बंगले में जो समाचार का कागज छपता है उसका सुख उन् बोलियों के जान्ने ओ पढ़ने वालों को ही होता है। ……… देश के सत्य समाचार हिन्दुस्तानी लोग देखकर आप पढ़ ओ समझ लेंय ओपराई अपेक्षा जो अपने भावों के उपज न छोड़े, इसलिए बड़े दयावान करुणा ओ गुणनि के निधान सबके विषय श्रीमान् गवरनर जेनेरल बहादुर की आयस से अैसे चाहत में चित्त लगाय के एक प्रकार से यह नया ठाट ठांटा ………

आज हिन्दी को जान्ने ओ पढ़ने वालों’ के लिए उनकी बोली में काम करने वाले संस्थानों की कमी नहीं है। परंपरागत अखबारों, पत्रिकाओं से लेकर टीवी और इंटरनेट तक सब जगह इनकी मौजूदगी है और संख्यात्मक रूप से कहें तो दमदार मौजूदगी है। देश के सर्वाधिक बिकने वाले अखबारों की सूची में अपना दबदबा होता है लेकिन बस इसलिए कि हिन्दी जानने-समझने वालों के लिए इसे समझना आसान है। मौलिकता की खोज में पाठकों/दर्शकों को एक बार फिर से अंग्रेजी का ही रूख करना पड़ता है। आखिर इसकी वजह क्या है, इसकी सबसे बड़ी वजह अनुवाद पर निर्भर रहने की विवशता है।

आय और लाभांश के मामले में हिन्दी मीडिया संस्थानों की हालत जो भी हो, ढांचागत हालत यही है कि उनके पास उतनी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं जितनी अंग्रेजी के पास हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि हिन्दी में भी अव्वल रहने वाले ज्यादातर संस्थान सिर्फ हिन्दी के नहीं हैं। ये द्विभाषिक या बहुभाषी संस्थान हैं और अंग्रेजी को ही इन्होंने अपना चेहरा बना रखा है। सारी मौलिक व्यवस्थाएं और सुविधाएं अंग्रेजी को प्राप्त हैं और शेष भाषाओं की शाखाएं उनके अनुवाद तक सीमित हैं।

प्रिंट से इलेक्ट्रानिक तक हिन्दी की स्थिति यही है। अखबारों, संवाद समितियों और चैनलों तक में जोर अंग्रेजी पर है। संस्थान अपनी ऊर्जा का अधिकतम हिस्सा अंग्रेजी पर खर्च कर रहा है और हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं से उनका वास्ता काम चलाने भर का है। देश में बड़े स्तर के कार्यक्रम हों, विदेश दौरों का मामला हो या फिर कोई अन्य खर्चीला काम, कवरेज के लिए प्राथमिकता अंग्रेजी के पत्रकारों को दी जाएगी या फिर अगर आप हिन्दी के हैं तो आप इसी शर्त पर भेजे जाएंगे कि अंग्रेजी को भी आप पर्याप्त सेवाएं दें। अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद नियति है लेकिन हिन्दी से अंग्रेजी अनुवाद की जहमत नहीं उठायी जाएगी। यही स्थिति बुनियादी सुविधाओं और कई जगह तो वेतन ढांचों के मामले में भी देखने को मिलती है। कई बार देखा जाता है कि एक ही संस्थान में हिन्दी के पत्रकारों का औसत वेतन उसी संस्थान के अंग्रेजी के पत्रकारों के मुकाबले आधे से भी कम है।

इस परिप्रेक्ष्य में यह बात स्पष्ट तौर पर कही जा सकती है कि हिन्दी इन संस्थानों के लिए दुधारू गाय जरूर मालूम पड़ती है लेकिन उसे चारा देने में सबको परहेज है। हाल के वर्षों तक ऐसा होता था कि बड़े पत्र समूहों में किसी एक संस्करण से प्राप्त होने वाली अच्छी आय का उपयोग नये संस्करण प्रकाशित करने या अखबारों की गुणवत्ता सुधारने में होता था लेकिन अब ऐसी प्रवृति पनप रही है कि हिन्दी का उपयोग केवल राजस्व प्राप्ति के लिए हो और उस राजस्व का इस्तेमाल अन्य खर्चों की पूर्ति के लिए किया जाए। ताज्जुब होता है यह सुनकर कि हिन्दी का एक प्रसिद्ध और काफी पुराना दैनिक इन दिनों अपने विज्ञापन कारोबार से मिलने वाली रकम का भी जायदादी कारोबार में निवेष कर रहा है। बिल्डरों के मीडिया में आने की प्रवृति कुछ वर्ष पहले तक देखी जा रही थी लेकिन मीडिया वालों की बिल्डर बनने या अन्य कारोबार में घुसने की कोशिश कहीं से भी शुभ संकेत नहीं है, खासकर, हिन्दीभाषी मीडिया के मामले में उसकी ढांचागत कमजोरियों के मद्देनजर यह बात ज्यादा प्रभावी दिखती है।

यह तो बात थी अनुवाद की। पत्रकारिता के मूलतः बौद्धिक कार्य होने के कारण इसके पेशेवरों के बीच वैचारिक वादों के प्रति विशेष अनुराग की संभावना हमेशा बनी रहती है। हिन्दी पत्रकारिता के साथ भी ऐसा हो रहा है और वादों के प्रति अनुराग के अतिरेक में इसके पत्रकार कई बार सूचक की अपनी भूमिका से उठकर प्रवक्ता की भूमिका में आने को विकल मालूम पड़ते हैं। इस वजह से बारंबार उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। मार्क्सवाद से उग्र राष्ट्रवाद तक और यथास्थितिवाद से आधुनिकतावाद तक वैचारिक मंथन के मोर्चों पर कई बार पत्रकारों की तटस्थता संदिग्ध होती रही है। इस स्थिति का खामियाजा कहीं न कहीं पत्रकारिता को ही उठाना पड़ेगा। हिन्दी के साथ विडम्बना यह है कि उसके अधिकतर पत्रकार या तो इन वादों के मोहपाश में हैं या तात्कालिक लाभों के अनुकूल अलग-अलग वादों का चोला बदलते रहते हैं और जो लोग बौद्धिकता के इस ज्वर से पीडि़त नहीं हैं उनके लिए विवाद ही खबर है।

जैसा कि पहले कहा गया कि वाद और विवाद की समस्या भी हिन्दी में आयातित है। भारतीय मीडिया का मौलिक चरित्र अंग्रेजी का मीडिया ही तय करता है और इस वजह से अंग्रेजी की ही तरह हिन्दी में भी तुच्छ विवादों को खबर बनाने की कोशिश होती है। अंग्रेजी का टीवी मीडिया तो इस बीमारी से उबरने की बहुत हद तक कोशिश कर रहा है लेकिन अब तक अबोधपन से गुजर रही हिन्दी मीडिया के लिए यह समस्या विकराल ही होती जा रही है। ग्लैमर की दुनिया के बेसिरपैर विवाद प्रिंट से इलेक्ट्रानिक तक में कई बार मुख्य खबर बनकर महत्वपूर्ण खबरों को धकिया रहे हैं। सीएमएस मीडिया लैब समेत कई शोध संस्थान अपनी रिपोर्टों में इस बात की पुष्टि कर चुके हैं। ऐसी सतही खबरों में उलझकर रहने की हिन्दी मीडिया की अनावश्यक विवशता भी कहीं न कहीं उसकी दुर्गति का कारण है। इसलिए अब हिन्दी मीडिया को अपने बेहतर भविष्य से उबरने के लिए वाद, विवाद और अनुवाद की छाया से मुक्त होकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व स्थापित करने के लिए पहल करनी होगी।

ऋतेष पाठक, अगस्त अंक, २०११

Advertisements

मिशन, प्रोफेशन और कामर्शियलाइजेशन…

एक समय आएगाजब हिंदी पत्र रोटरी पर छपेंगेसंपादकों को ऊंची तनख्वाहें मिलेंगीसब कुछ होगा किन्तु उनकी आत्मा मर जाएगीसम्पादकसम्पादक न होकर मालिक का नौकर होगा।

स्वतंत्रता आंदोलन को अपनी कलम के माध्यम से तेज करने वाले बाबूराव विष्णु पराड़कर जी ने यह बात कही थी। उस समय उन्होंने शायद पत्रकारिता के भविष्य को भांप लिया था। पत्रकारिता की शुरूआत मिशन से हुई थी जो आजादी के बाद धीरे-धीरे प्रोफेशन बन गया और अब इसमें कामर्शियलाइजेशन का दौर चल रहा है।

स्वतंत्रता आंदोलन को सफल करने में पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उस समय पत्रकारिता को मिशन के तौर पर लिया जाता था और पत्रकारिता के माध्यम से निःस्वार्थ भाव से सेवा की जाती थी। भारत में पत्रकारिता की नींव रखने वाले अंग्रेज ही थे। भारत में सबसे पहला समाचार पत्र जेम्स अगस्टस हिक्की ने वर्ष 1780 में बंगाल गजट निकाला। अंग्रेज होते हुए भी उन्होंने अपने पत्र के माध्यम से अंग्रेजी शासन की आलोचना की, जिससे परेशान गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने उन्हें प्रदत्त डाक सेवाएं बंद कर दी और उनके पत्र प्रकाशन के अधिकार समाप्त कर दिए। उन्हें जेल में डाल दिया गया और जुर्माना लगाया गया। जेल में रहकर भी उन्होंने अपने कलम की पैनी धार को कम नहीं किया और वहीं से लिखते रहे। हिक्की ने अपना उद्देश्य घोषित किया था-

“अपने मन और आत्मा की स्वतंत्रता के लिए अपने शरीर को बंधन में डालने में मुझे मजा आता है।”

हिक्की गजट द्वारा किए गए प्रयास के बाद भारत में कई समाचार पत्र आए जिनमें ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाजें उठने लगी थी। समाचार पत्रों की आवाज दबाने के लिए समय-समय पर प्रेस सेंसरशिप व अधिनियम लगाए गए लेकिन इसके बावजूद भी पत्रकारिता के उद्देश्य में कोई परिवर्तन नहीं आया। भारत में सर्वप्रथम वर्ष 1816 में गंगाधर भट्टाचार्य ने बंगाल गजट का प्रकाशन किया। इसके बाद कई दैनिक, साप्ताहिक व मासिक पत्रों का प्रकाशन प्रारंभ हुआ जिन्होंने ब्रिटिश अत्याचारों की जमकर भत्र्सना की।

राजा राम मोहन राय ने पत्रकारिता द्वारा सामाजिक पुनर्जागरण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। ब्राह्मैनिकल मैगजीन के माध्यम से उन्होंने ईसाई मिशनरियों के साम्प्रदायिक षड्यंत्र का विरोध किया तो संवाद कौमुदी द्वारा उन्होंने महिलाओं की स्थिति में सुधार करने का प्रयास किया। मीरात-उल-अखबार के तेजस्वी होने के कारण इसे अंग्रेज शासकों की कुदृष्टि का शिकार होना पड़ा।

जेम्स बकिंघम ने वर्ष 1818 में कलकत्ता क्रोनिकल का संपादन करते हुए अंग्रेजी शासन की कड़ी आलोचना की, जिससे घबराकर अंग्रेजों ने उन्हें देश निकाला दे दिया। इंग्लैंड जाकर भी उन्होंने आरियेंटल हेराल्ड पत्र में भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों को उजागर किया।

हिन्दी भाषा में प्रथम समाचार पत्र लाने का श्रेय पं. जुगल किशोर को जाता है। उन्होंने 1826 में उदन्त मार्तण्ड पत्र निकाला और अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों की आलोचना की। उन्हें अंग्रेजों ने प्रलोभन देने की भी कोशिश की लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया और आर्थिक समस्याओं से जूझते हुए भी पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्रवाद की मशाल को और तीव्र किया।

1857 की विद्रोह की खबरें दबाने के लिए गैगिंग एक्ट लागू किया। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन के नेता अजीमुल्ला खां ने दिल्ली से पयामे आजादी निकाला जिसने ब्रिटिश कुशासन की जमकर आलोचना की। ब्रिटिश सरकार ने इस पत्र को बंद करने का भरसक प्रयास किया और इस अखबार की प्रति किसी के पास पाए जाने पर उसे कठोर यातनाएं दी जाती थी। इसके बाद इण्डियन घोष, द हिन्दू, पायनियर, अमृत बाजार पत्रिका, द ट्रिब्यून जैसे कई समाचार पत्र सामने आए।

लोकमान्य तिलक ने पत्रकारिता के माध्यम से उग्र राष्ट्रवाद की स्थापना की। उनके समाचार पत्र मराठा और केसरी, उग्र प्रवृत्ति का जीता जागता उदाहरण है। गांधीजी ने पत्रकारिता के माध्यम से पूरे समाज को एकजुट करने का कार्य किया और स्वाधीनता संग्राम की दिशा सुनिश्चित की। नवभारत, नवजीवन, हरिजन, हरिजन सेवक, हरिजन बंधु, यंग इंडिया, आदि समाचार पत्र गांधी जी के विचारों के संवाहक थे। गांधी जी राजनीति के अलावा अन्य विषयों पर भी लिखते थे। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों को भी उजागर कर इसे समाप्त करने पर बल दिया। गणेश शंकर विद्यार्थी ने कानपुर से प्रताप नामक पत्र निकाला जो अंग्रेजी सरकार का घोर विरोधी बन गया। अरविंद घोष ने वंदे मातरम, युगांतर, कर्मयोगी और धर्म आदि का सम्पादन किया। बाबू राव विष्णु पराड़कर ने वर्ष 1920 में आज का संपादन किया जिसका उद्देश्य आजादी प्राप्त करना था।

आजादी से पहले पत्रकारिता को मिशन माना जाता था और भारत के पत्रकारों ने अपनी कलम की ताकत आजादी प्राप्त करने में लगाई। आजादी मिलने के बाद समाचार पत्रों के स्वरूप में परिवर्तन आना स्वाभाविक था क्योंकि उनका आजादी का उद्देश्य पूरा हो चुका था। समाचार-पत्रों को आजादी मिलने और साक्षरता दर बढ़ने के कारण आजादी के बाद बड़ी संख्या में समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं का प्रकाशन होने लगा। साथ ही रेडिया एवं टेलीविजन के विकास के कारण मीडिया जगत में बड़ा बदलाव देखा गया। स्वतंत्रता से पहले जिस पत्रकारिता को मिशन माना जाता था अब धीरे-धीरे वह प्रोफेशन में बदल रही थी।

वर्ष 1947 से लेकर वर्ष 1975 तक पत्रकारिता जगत में विकासात्मक पत्रकारिता का दौर रहा। नए उद्योगों के खुलने और तकनीकी विकास के कारण उस समय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में भारत के विकास की खबरें प्रमुखता से छपती थी। समाचार-पत्रों में धीरे-धीरे विज्ञापनों की संख्या बढ़ रही थी व इसे रोजगार का साधन माना जाने लगा था।

वर्ष 1975 में एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर काले बादल छा गए, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर मीडिया पर सेंसरशिप ठोक दी। विपक्ष की ओर से भ्रष्टाचार, कमजोर आर्थिक नीति को लेकर उनके खिलाफ उठ रहे सवालों के कारण इंदिरा गांधी ने प्रेस से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली। लगभग 19 महीनों तक चले आपातकाल के दौरान भारतीय मीडिया शिथिल अवस्था में थी। उस समय दो समाचार पत्रों द इंडियन एक्सप्रेस और द स्टेट्समेन ने उनके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की तो उनकी वित्तीय सहायता रोक दी गई। इंदिरा गांधी ने भारतीय मीडिया की कमजोर नस को अच्छे से पहचान लिया था। उन्होंने मीडिया को अपने पक्ष में करने के लिए उनको दी जाने वाली वित्तीय सहायता में इजाफा कर दिया और प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी। उस समय कुछ पत्रकार सरकार की चाटुकारिता में स्वयं के मार्ग से भटक गए और कुछ चाहकर भी सरकार के विरूद्ध स्वतंत्र रूप से अपने विचारों को नहीं प्रकट कर सकें। कुछ पत्रकार ऐसे भी थे जो सत्य के मार्ग पर अडिग रहें। आपातकाल के दौरान समाचार पत्रों में सरकारी प्रेस विज्ञप्तियां ही ज्यादा नजर आती थी। कुछ सम्पादकों ने सेंसरशिप के विरोध में सम्पादकीय खाली छोड़ दिया। लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी एक पुस्तक में कहा है-

“उन्होंने हमें झुकने के लिए कहा और हमने रेंगना शुरू कर दिया।”

1977 में जब चुनाव हुए तो मोरारजी देसाई की सरकार आई और उन्होंने प्रेस पर लगी सेंसरशिप को हटा दिया। इसके बाद समाचार पत्रों ने आपातकाल के दौरान छिपाई गई बातों को छापा। पत्रकारिता द्वारा आजादी के दौरान किया गया संघर्ष बहुत पीछे छूट चुका था और पत्रकारिता अब पेशे में तब्दील हो चुकी थी।भारत में एक और ऐसी घटना घटी जिसने पत्रकारिता के स्वरूप को एक बार फिर बदल दिया। वर्ष 1991 की उदारीकरण की नीति और वैश्वीकरण के कारण पत्रकारिता पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा और पत्रकारिता में धीरे-धीरे कामर्शियलाइजेशन का दौर आने लगा।

आम जनता को सत्य उजागर कर प्रभावित करने वाले मीडिया पर राजनीति व बाजार का प्रभाव पड़ना शुरू हो गया। पत्रकारों की कलम को बाजार ने प्रभावित कर खरीदना शुरू कर दिया। वर्तमान दौर कामर्शियलाइजेशन का ही दौर है, जिसमें मीडिया के लिए समाचारों से ज्यादा विज्ञापन का महत्व है। बाजार में उपलब्ध उत्पादों का प्रचार समाचार बनाकर किया जा रहा है। आज समाचार का पहला पृष्ठ भी बाजार खरीदने लगा है। वहीं पिछले कुछ दिनों में पत्रकारिता में भ्रष्टाचार के जो मामले सामने आए उसको देखकर पत्रकारिता का उद्देश्य धुंधला होता नजर आता है। 2जी स्पेक्ट्रम मामले में जिस तरह कुछ पत्रकारों की भूमिका सामने आई उसको देखकर अब आम जन का विश्वास भी मीडिया से हट रहा है।

आजादी से पहले पत्रकारों ने किसी भी प्रलोभनों में आए बिना निःस्वार्थ भाव से अपना कर्तव्य निभाया था। अंग्रेजों द्वारा प्रेस पर रोक लगाने के बाद भी उन्होंने अपनी कलम को नहीं रोका, लेकिन आज परिस्थितियां बदलती नजर आ रहीं हैं। पत्रकारिता आज सेवा से आगे बढ़कर व्यवसाय में परिवर्तित हो चुकी है। यहां पर एक बार फिर पराड़कर जी के वही शब्द याद आते हैं जिनमें उन्होंने पत्रकारिता के भविष्य को भांप लिया था-

“एक समय आएगा, जब हिंदी पत्र रोटरी पर छपेंगे, संपादकों को ऊंची तनख्वाहें मिलेंगी, सब कुछ होगा किन्तु उनकी आत्मा मर जाएगी, सम्पादक, सम्पादक न होकर मालिक का नौकर होगा।”

नेहा जैन, अगस्त अंक, २०११

कलम का सिपाही मौत का राही

राष्ट्र की रक्षा के लिए सेना के बाद दूसरा स्थान पत्रकार का आता है. अपनी कलम की ताकत से वह भ्रष्टाचार एवं देश की सुरक्षा पर सेंध लगाने के लिए गिद्ध की तरह नजर गढ़ाए बैठे असामाजिक तत्वों पर अपनी पैनी नजर रख उन्हें उजागर करता है. लेकिन कभी-कभी कलम के सिपाही पत्रकार की खुद की जिंदगी खतरे में पड़ जाती है। सत्य को उजागर करने पर कई लोग उसके जान के दुश्मन बन जाते हैं.

विडंबना यह है कि सेना के पास तो आत्मरक्षा के लिए हथियार है लेकिन पत्रकार के पास केवल कलम जो सत्य उजागर करने के लिए तो एक सशक्त हथियार है लेकिन आत्मरक्षा के लिए नहीं. जब कोई उसकी हत्या के इरादे से उसे निशाना बनाता है तो वह आत्मरक्षा में असमर्थ होता है. पत्रकार को अपना कार्य करते समय यदि कोई मारता है तो मरने के बाद उसे वो सम्मान प्राप्त नहीं होता जो एक सैनिकों को प्राप्त होता है जबकि दोनों का काम जोखिमपूर्ण और राष्ट्रवाद से ओत प्रोत होता है.

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करने वाले भारत में अभी तक पत्रकारों को सुरक्षा प्रदान करने वाला कोई ठोस कानून नहीं है. सत्य की कलम से लिखने वाले पत्रकार पर मौत का साया हरदम मंडराता रहता है. पत्रकारों की सुरक्षा से संबंधित कानून को जब भी लाने की बात की गई तो उस पर कभी भी गंभीरता से विचार नहीं किया गया. आखिर ऐसा क्या है जो देश की सत्ता पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होने देती क्यों कानून लाने की बात पर वह चुप्पी साध लेती है. भारत के संविधान में जहां सूचना लेने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, वहां इस अधिकार के कई बार हनन के बावजूद सरकार क्यों कुछ नहीं करती क्या यह लोकतंत्र और मौलिक अधिकारों पर प्रश्न चिन्ह नहीं है.

हाल ही में खोजी पत्रकार ज्योतिर्मय डे की हत्या ने इन प्रश्नों को एक बार फिर से उजागर कर दिया है. डे की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. अंडरवर्ल्ड की गतिविधियों को उजागर करने वाले डे ने तेल माफियाओं के काले धंधे को भी उजागर किया था. वह चंदन की तस्करी का खुलासा भी करना चाहते थे. इतने बड़े स्तर पर हो रही इन गतिविधियों को उजागर करने की कीमत डे को अपनी जान गंवाकर चुकानी पड़ी. जे डे की हत्या के पीछे कभी तेल माफियाओं तो कभी अंडरवर्ल्ड का हाथ बताया जा रहा है.

लेकिन सबसे शर्मनाक बात है कि मुंबई सरकार इस हत्याकांड की सीबीआई जांच कराने से मना कर रही है जबकि मुंबई पुलिस से अभी तक यह मामला सुलझ नहीं सका। ज्यादा समय बीतने पर हत्या के आरोपी सभी सबूत मिटाने में सफल हो जाएंगे। आखिर ऐसा क्या है जो सरकार इस मामले की सीबीआई जांच कराने से कतरा रही है. इससे पहले पाकिस्तान के पत्रकार सलीम शहजाद को भी मार दिया गया था। उन्होंने अलकायदा और पाकिस्तानी सेना के बीच संबंधों को उजागर किया था।

पत्रकारों की सुरक्षा के लिए बनी संस्था सीपीजे के मुताबिक भारत में वर्ष 1992 से लेकर अब तक कुल 44 पत्रकार मारे जा चुके हैं. जिनमें से केवल 27 पत्रकारों की मौत की गुत्थी ही सुलझ पाई है। इन पत्रकारों की सूची नीचे दी गई है।

1       ज्योतिर्मय डे – मिडडे, 11 जून 2011                                                                                              मुंबई,गोली मारकर हत्या

2       उमेश राजपूत – नई दुनिया, 22 फरवरी 2011                                                                                 रायपुर,गोली मारकर हत्या

3       विजय प्रताप सिंह- इंडियन एक्सप्रेस, 20 जुलाई 2010                                                                इलाहाबाद बम धमाके में मौत

4       हेमन्त पांडे –  फ्रीलांसर, 2 जुलाई 2010                                                                                        आन्ध्र प्रदेश, माओवादियों और पुलिस के बीच मुठभेड़  के दौरान मौत

5       विकास रंजन – हिन्दुस्तान, 25 नवंबर 2008                                                                               रौसेरा, मोटरबाइक सवार तीन युवकों द्वारा गोली मारकर हत्या

6       जगजीत सैकिया – अमर असम, 20 नवंबर 2008,                                                                      असम गोली मारकर हत्या

7       जावेद अहमद मिर – डेली ट्रिब्यून,13 अगस्त 2008                                                                  जम्मू-कश्मीर अलगाववादियों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस मुठभेड़ में मौत

8       अशोक सोढी – डेली एक्सेल्सर, 11 मई 2008,                                                                            जम्मू-कश्मीर आतंकी मुठभेड़ के दौरान फोटोग्राफर सोढी की मौत

9       मोहम्मद मुस्लिमुद्दीन – असमिया प्रतिदिन,1 अप्रैल 2008                                                     असम,छः हमलावरों द्वारा गोली मारकर हत्या

10      अरूण नारायण देकाते – तरूण भारत, 10 जून 2006, नागपुर                                                 चार अज्ञात युवकों द्वारा हमला

11      प्रहलाद गौला – असमिया खबर, 6 जनवरी 2006, असम                                                        चाकू मारकर हत्या

12      दिलीप मोहापात्र – अजी कगोज, 8 नवंबर 2004, उड़ीसा                                                           अपहरण कर हत्या

13      असिया जिलानी – फ्रीलांसर, 20 अप्रैल 2004, कश्मीर                                                          बम धमाके में मौत

14      वीराबोएना यदागिरी – आन्ध्र प्रभा, 21 फरवरी 2004,                                                          आन्ध्र प्रदेश चाकू मारकर हत्या

15      परमानंद गोयल – पंजाब केसरी, 18 सितंबर 2003,                                                            हरियाणा तीन अज्ञात युवकों द्वारा गोली मारकर हत्या

16      इंद्रा मोहन हकसम – अमर असम, 24 जून 2003,                                                              असम उल्फा द्वारा अपहरण कर हत्या

17      परवाज़ मोहम्मद सुल्तान – नाफा समाचार संगठन, 31 जनवरी 2003                              श्रीनगर, गोली मारकर हत्या

18      रामचंद्र छतरपति – पूरा सच, 21 नवंबर 2002,                                                                  हरियाणा, गोली मारकर हत्या

19      यम्बेम मेघजीत सिंह – नार्थईस्ट विजन, 13 अक्टूबर 2002                                              मणिपुर, प्रताड़ना के पश्चात गोली मारकर हत्या

20      पारितोष पांडे – जनसत्ता एक्सप्रेस, 14 अप्रैल 2002                                                          लखनऊ,गोली मारकर हत्या

21      मूलचंद यादव – फ्रीलान्सर, 30 जुलाई 2001                                                                   झांसी, गोली मारकर हत्या

22      थऊनाओजम ब्रजमणि सिंह – मणिपुर न्यूज, 20 अगस्त 2000                                    मणिपुर, गोली मारकर हत्या

23      प्रदीप भाटिया – द हिन्दुस्तान टाइम्स, श्रीनगर, 10 अगस्त 2000                                  बम धमाके में भाटिया समेत छः अन्य पत्रकारों की मौत

24      वी. सेल्वरज – नक्कीरन, 31 जुलाई 2000                                                                     तमिलनाडु, चाकू मारकर हत्या

25      अधीर राय – फ्रीलांसर, 18 मार्च 2000,                                                                           झारखंड, गोली मारकर हत्या

26      एन.ए. लालरूहलू – शान, 10 अक्टूबर 1999,                                                                 मणिपुर, गोली मारकर हत्या

27      इरफान हुसैन – आउटलुक, 13 मार्च 1999                                                                      नई दिल्ली, अपहरण कर चाकू मारकर हत्या

28    शिवानी भटनागर – इंडियन एक्सप्रेस, 23 जनवरी 1999                                                नई दिल्ली,चाकू मारकर हत्या

29      एस. गंगाधर राजू – ईटीवी, 19 नवंबर 1997                                                                  हैदराबाद, कार बम धमाके में मौंत

30      एस. कृष्णा – ईटीवी, 19 नवंबर 1997                                                                          हैदराबाद, कार बम धमाके में मौंत

31      जी. राजशेखर – ईटीवी, 19 नवंबर 1997                                                                       हैदराबाद, कार बम धमाके में मौत

32      जगदीष बसु – ईटीवी, 19 नवंबर 1997                                                                         हैदराबाद, कार बम धमाके में मौत

33      पी. श्रीनिवास राव – ईटीवी, 19 नवंबर 1997                                                                हैदराबाद  कार   बम धमाके में मौत

34      सईदन शफि – दूरदर्शन टीवी, 16 मार्च 1997                                                                 श्रीनगर, गोली  मारकर हत्या

35      अल्ताफ अहमद फक्टू – दूरदर्शन टीवी, 1 जनवरी 1997                                                श्रीनगर, गोली मारकर हत्या

36      पराग कुमार दास – असमिया प्रतिदिन, 17 मार्च 1996,                                              असम, गोली मारकर हत्या

37      गुलाम रसूल शेख – रहनुमा-ए-कश्मीर, 10 अप्रैल 1996                                            कश्मीर, अपहरण कर हत्या

38      मुस्ताक अली – एजेन्सी फ्रांस प्रेस, एशियन न्यूज इंटरनेशनल                                   10 सितंबर 1995 श्रीनगर, लेटरबम

धमाके में मौत

39      गुलाम मुहम्मद लोने – फ्रीलांसर, 29 अगस्त 1994                                                 कश्मीर, गोली मारकर हत्या

40      दिनेश पाठक – संदेश, 22 मई 1993                                                                         बड़ोदा, चाकू मारकर हत्या

41      भोला नाथ मासूम – हिंद समाचार, 31 जनवरी 1993                                                राजपुर, गोली मारकर हत्या

42      एम.एल. मनचंदा – आल इंडिया रेडियो, 18 मई 1992                                             पंजाब, अपहरण कर हत्या

43      राम सिंह बिलिंग – अज़दी आवाज़, डेली अजीत, 3 जनवरी    1992                         जालंधर हिरासत में मौत

44      बख्शी तीरथ सिंह – हिन्द समाचार, 27 फरवरी 1992                                             धुरी अज्ञात युवकों द्वारा हत्या

इन पत्रकारों में से अधिकतर पत्रकारों की हत्या गोली मारकर की गई है। अपहृत हुए पत्रकारों को तो बुरी तरह से प्रताडि़त किया गया है। इसके अलावा पत्रकारों पर हमलों की खबरें तो आती ही रहती है। हाल ही में यूपी पुलिस द्वारा किया गया पत्रकार पर हमला, छत्तीसगढ़ में असामाजिक तत्वों द्वारा पत्रकारों पर हमलों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रष्न चिन्ह लगा दिया है।

पत्रकारिता की नींव राष्ट्रवाद समाज के सही दिशा निर्माण और लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए रखी गई थी। पत्रकारों को संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों की धारा 19,1 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। इसी के तहत वह

निर्भीकतापूर्वक अपनी बात को देश के सामने रखता है। लेकिन पत्रकारों की इस स्वतंत्रता को चोट पहुंचाई जा रही है और उसकी आवाज को दबाने का पुरजोर प्रयास किया जा रहा है। यह संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकार का उल्लंघन तो है ही लोकतंत्र पर भी आघात है। यदि इसी तरह पत्रकारों पर हमलों की घटनाएं होती रही तो बहुत कम पत्रकार निर्भीक छवि वाले बचेंगे। ऐसी स्थिति में लोकतंत्र का चैथा स्तंभ भी लड़खड़ा जाएगा। आज पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और इससे सम्बन्धित उपयोगी कानून लाने की जरूरत है जिससे पत्रकार निर्भीकतापूर्वक अपने विचार व्यक्त कर सकें।

नेहा जैन, जुलाई अंक २०११

Post Navigation