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आस्था नहीं, आश्चर्य का कुंभ

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सूचनाओं और संदेशों को उसके संदर्भों से काटकर प्रस्तुत करने की प्रक्रिया हमेशा अनर्थ को ही जन्म देती है। जड़ से कटी सूचना पाठक को भी दिग्भ्रमित करती है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में सूचना का स्वरुप भी वैश्विक हो गया है और तथ्य हर परिस्थितियों में समान रुप से प्रभावी होते हैं। लेकिन यह लोग भूल जाते हैं कि तथ्यों के चयन की प्रक्रिया कोई निरपेक्ष प्रक्रिया नहीं है, व्यक्ति की दृष्टि और स्थानीय संस्कृति इस चयन प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। यदि कुंभ को मीडियाई जगत में एक केस स्टडी मानकर अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि परिप्रेक्ष्य विहीन सूचना समझ को बढाती नहीं, बल्कि समझ के चारों ओर एक कुहासा पैदा कर देती है। शायद, इसी कारण, पश्चिमी नजरों में आस्था का एक सैलाब, संवाद का एक वृहद प्लेटफार्म, आश्चर्य के एक आयोजन के रूप में तब्दील हो जाता है। इलाहाबाद में लगभग दो महीने तक चले कुंभ में जहां करोड़ों लोगों ने आस्था की डुबकी लगाई। वहीं पश्चिमी मीडिया भी एक स्थान पर इतने लोगों को देखकर हतप्रभ रहा। ऐसे वक्त में जब उपभोक्तावादी संस्कृति हावी है, तब आस्था और आध्यात्म के संगम में इतने विशाल जनसमुदाय का एकत्रीरण कम से कम विदेशी मीडिया को तो हतप्रभ करने वाला ही था।
 विश्व के प्रतिष्ठित समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं ने कुंभ मेले को आश्चर्य की दृष्टि से देखा कि किस प्रकार से एक स्थान पर करोड़ों लोग एकत्रित हुए। है।संवाद सेतु की टीम ने पश्चिमी मीडिया की अंतर्वस्तु की पडताल कर उसके दृष्टिकोण को समझने की कोशिश की।
कुंभ पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए टाइम मैगजीन ने अपनी वेबसाइट पर लिखा-
‘‘मानव समुदाय का सबसे बड़ा एकत्रीकरण इन दिनों उत्तर भारत के इलाहाबाद शहर में चल रहा है। गंगा, यमुना एवं पौराणिक नदी सरस्वती के तट पर कुंभ मेले के उत्सव का आयोजन चल रहा है, जिसमें एक करोड़ से अधिक लोग एकत्रित हैं। यह ऐसा समय है जब भारत की वैश्विक चिंताएं बढ़ रही हैं और सामाजिक समस्याएं भी गहराई हैं, तब इन साधुओं के भभूत से सराबोर चेहरे और सिर पर सांपों की तरह से लिपटे बाल इन सभी समस्याओं को पिछली सीट पर धकेलने का काम करते हैं। जो पूरे उन्माद के साथ गंगा में डुबकी लगा रहे हैं। हालांकि इसमें कोई नई बात नहीं है कि भारत से बाहर का कोई भी व्यक्ति इसे समय की बर्बादी ही कहेगा। यहां 19वीं सदी में भारत में तैनात रहे एक अधिकारी का यह वक्तव्य महत्वपूर्ण है, जिन्होंने कुंभ को देखने के बाद यह महसूस किया था कि भारत को ईसाईयत के प्रभाव में लाना जरूरी है।‘‘
‘‘अब भी लोग इन पवित्र नदियों के संगम तट पर एकत्र होते हैं। इनमें से कुछ लोग तो जैसे अपना प्राण स्वेच्छा से त्यागने आते हैं। डूबी हुई लाशें जब ऊपर आती हैं तो वह गिद्धों का आहार बन जाती हैं जो आत्माहुति के इस स्थान के चारों तरफ मंडराते रहते हैं। कोई भी समझदार व्यक्ति यदि इस भयानक दृश्य को देखेगा तो प्रसन्नता और अविनाशी आनंद के पीछे पागल इन लोगों के मतांतरण करने की बात उसके भीतर जरूर जगेगी।‘‘
टाइम के अनुसार यह किसी के लिए भी आश्चर्य का विषय हो सकता है कि लोग इतनी विशाल भीड़ से क्यों जुड़ना चाहते हैं। कुछ निश्चित शुभ दिनों में गंगा, यमुना एवं सरस्वती के संगम तट पर लाखों लोग लोग एकत्र होते हैं। एटलांटिक क्वार्टज वेबसाइट ने इस मेले को वैश्विक संदर्भ में देखते हुए लिखा-
‘‘कल्पना करें कि शंघाई शहर की सारी आबादी 4 गुणा 8 किलोमीटर के मैदान में एकत्र होती है। यहां एकत्र आबादी को देखें तो न्यूयार्क का प्रत्येक व्यक्ति, महिला एवं बच्चे यहां अपनी हाजिरी दर्ज कराते हैं। इतना ही नहीं, मेेले का क्षेत्र भी पिछली बार की तुलना में बढ़ा है, जहां 2011 में मेले का क्षेत्रफल 1,495.31 हेक्टेयर था एवं 11 सेक्टरों में विभाजित था। वहीं 2013 में मेले का क्षेत्रफल 1936.56 हेक्टेयर एवं 14 सेक्टर हो गया। यह क्षेत्रफल लगभग 4,784 एकड़ हुआ जो लगभग दुनिया के सबसे बड़े पार्क मैड्रिड के कासा डे कैंपो के बराबर है।
इसी प्रकार से पत्रिका ने कुंभ के दौरान विभिन्न प्रकार प्रदूषण के आंकड़े भी निकाले हैं और मेला क्षेत्र को एक कठिन क्षेत्र करार देने का प्रयास किया है। हालांकि पत्रिका की वेबसाइट पर ही यूनिवर्सिटी आफ सेंट एंडयूज में फीजियोलाजिकल स्टीफन रिचर की यह पंक्तियां भी उद्धृत हैं, जिसमें उन्होंने कुंभ को सामाजिक संबंधों के विकास का प्लेटफार्म बताते हुए लिखा है-
 ‘‘ हमारा मानना है कि यह मेला सामाजिक संबंधों का परिचय कराता है और यह बताता है कि हम अकेले नहीं हैं। हम अन्य लोगों को भी बुला सकते हैं और वह लोग हमारे लिए सुरक्षा जाल का काम करते हैं। यहां आकर लोग एक-दूसरे के मंगल की कामना करते हैं और उसके बाद अपने जीवन की सामान्य पटरी पर लौट जाते हैं।‘‘
अंत में पत्रिका ने लिखा है कि संभवतः हिंदुओं के पूर्वज किसी समय एक उद्देश्य के लिए नदी किनारे एकत्र हुए होंगे और यह परंपरा आज भी जारी है। वहीं द गार्जियन ने अपनी वेबसाइट पर एक सवाल पूछा है कि
-दुनिया में ऐसी कौन सी जगह है, जहां किसी भी स्थान से अधिक लोग एकत्र होते हों ? मानव के समूचे इतिहास में ऐसा कौन सा स्थान है, जहां सबसे अधिक लोगों के पैरों के निशान हों ?
इस सवाल के जवाब में पाठकों ने मक्का, टाइम्स स्क्वायर, टोक्यो शिब्युआ क्रासिंग समेत कुंभ को वह स्थान बताया जहां दुनिया भर के किसी भी स्थान से अधिक लोग एकत्र होते हैं।
एक पाठक सेरजियो कार्वाल्हो का जवाब था कि-
‘‘मेरे अनुमान से भारत के इलाहाबाद में यमुना एवं गंगा के संगम तट पर दुनिया में सबसे अधिक लोग कुंभ मेले के दौरान एकत्रित होते हैं और हजारों तीर्थयात्री यहां अस्थियां भी प्रवाहित करते हैं। यहां पर लोग हजारों वर्षों से तीर्थयात्रा के उद्देश्य से एकत्र होते रहे हैं।‘‘
वहीं द मीडिया इंटरनेशनल ने कुंभ मेले को दुनिया का सबसे बड़ा पर्व करार देते हुए लिखा कि इस मेले में हज यात्रा से भी अधिक लोग एकत्र होते हैं।
बीबीसी ने मार्क टली की रिपोर्ट के जरिए कुंभ को सामाजिक समरसता, संवाद के मंच एवं विश्व कल्याण के उद्देश्य से लगे कुंभ मेले को केवल साधुओं के करतबों और नागा साधुओं तक ही सीमित रखा। मार्क टली ने अपनी रिपोर्ट में भारत में व्यतीत अपने जीवन में कुंभ को सबसे बड़ा आश्चर्य बताते हुए अमृत मंथन की कथा का जिक्र किया है और मेले में साधुओं के करतबों का जिक्र किया है। कुल मिलाकर बीबीसी की पूरी रिपोर्ट कुंभ को आश्चर्य बताने पर ही केंद्रित रही।
कुंभ मेले के संदर्भ में विदेशी मीडिया कवरेज की बात करें तो उसका पूरा ध्यान कुंभ को आश्चर्य एवं अंध आस्था बताने पर ही केंद्रित रहा। जबकि उसने कुंभ मेले के सामाजिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक पक्ष को नजरंदाज कर दिया। जहां मेले के दौरान दुनिया के अनेकों देशों से लोग इस आयोजन के बारे में जानने एवं उसमें भागीदारी के लिए आए थे तो उसके उलट विदेशी मीडिया ने अपनी बौखलाहट के कारण इस आयोजन को नकरात्मक तौर पर प्रस्तुत करने में ही अपनी सारी ताकत झोंक दी।

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