संवादसेतु

मीडिया का आत्मावलोकन…

मिशन से प्रोफेशन तक का सफर

आजादी से पहले पत्रकारिता मिशन के रूप में थी। गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबू राव विष्णु पराड़कर, महात्मा गांधी, जुगल किशोर जैसे पत्रकारों ने अंग्रेजों की यातनाएं सहने के बावजूद भी अपने कलम की धार को पैना बनाए रखा और देश की आजादी में अपना सम्पूर्ण योगदान दिया। आजादी के बाद पत्रकारिता का व्यावसायीकरण होने के आरोप लगते रहे हैं। कहा जाता है कि आज पत्रकारिता मिशन न होकर केवल अपने निजी हितों की पूर्ति कर रहा है। आधुनिक भारतीय पत्रकारिता ने स्वतंत्रता संघर्ष की विरासत से स्वयं को डी लिंक कर लिया है। आप इससे कहां तक सहमत हैं ?

मेरे विचारों में आज की पत्रकारिता निश्चित रूप से व्यवसायीकरण के झूले में झूल रही है। पत्रकारिता को जिन लोगों ने उज्ज्वल बनाया वे समझौतावादी नहीं थे। उस दौर के हमारे सामने गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबू राव विष्णु पराड़कर, लाला लाजपत राय आदि उदाहरण हैं, जो पत्रकारिता समाज सेवा के लिए किया करते थे। उस दौर के उदाहरण तो हमें याद हैं लेकिन आज के दौर में हम ऐसे कितने ईमानदार लोगों के नाम गिना सकते हैं, शायद इक्का या दुक्का ही ऐसे लोग होंगे जो इस देश के समाज के उत्थान में कलम के सच्चे सिपाही हैं। खबर की कीमत आज के आधुनिक पत्रकार जान पा रहे हैं कि जिस खबर से पैसा न निकले वे खबर नही है। खबर से पैसा कितना निकल सकता है सभी समाचार उद्योग ये ही देखते हैं।

अरूण कुमार (लेगेसी इंडिया)

 

ये बात सही है कि आज पत्रकारिता व्यावसायिक है। पहले लोगों का जीवन खेती पर निर्भर था। आज औद्योगिकीकरण का दौर है। लोग शहर में नौकरी की तलाश में आते हैं। ऐसे में उनके पास आजीविका का साधन केवल नौकरी ही होती है और यदि वे किसी मिषन के लिये अपना जीवन दांव पार लगा भी दे तो क्या वो संस्था उसके परिवार की जिम्मेदारी लेगी, ये वही भारत है, जहां सीमा पर शहीद हुये जवानों की विधवा मुआवजे के लिये आजीवन सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाती रहती है।

रिचा वर्मा (आकाशवाणी)

अंग्रेजों की यातनाएं सहने के बावजूद भी गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबू राव विष्णु पराड़कर, महात्मा गांधी, जुगल किशोर जैसे पत्रकारों ने अपने कलम की धार को पैना बनाए रखा बिल्कुल सही। सवाल यह है कि ये बड़े नाम किसके लिए लिख रहे थे, स्वयं के लिए, लोक-हित के लिए। हम व्यवसाय के लिए लिख रहे हैं। हमारे कलम की स्याही मीडिया मालिक खरीदता है, इसलिए उसकी धार भी वही तय करता है। पत्रकारिता के मिशन की बजाय राहुल के यूपी मिशन पर ध्यान दें, तरक्की जल्दी होगी। वरना पैर में हवाई चप्पल और कंधे पर झोले के सिवाय पत्रकारिता हमें कुछ नहीं दे सकती। हां, अगर व्यवस्था से लड़ने का इतना ही जूनून है तो पत्रकारों को पहले खुद की लड़ाई लड़नी होगी। 10-20 हजार में खुश होकर मालिक के अहसानों के तले दबने के बजाय मीडिया में ही काम करने वाले आईटी, मैनेजमेंट कर्मियों के समान वेतन की लड़ाई लड़नी होगी। जो खुद की लड़ाई नहीं लड़ सकता, वह पत्रकारिता की लड़ाई क्या खाक लड़ेगा.

चंदन कुमार (उप-संपादक, जागरण जोश.कॉम)

 

ये सही है कि आजादी से पूर्व पत्रकारिता एक मिशन के रूप में थी और आज पत्रकारिता मिशन न होकर केवल अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति भर रह गयी है। मैं इसे थोड़ा अलग नजरिए से भी देखता हूं, पहले भले ही पत्रकारों के विचार अलग-अलग रहें हों मगर सभी का मकसद एक था, सिर्फ और सिर्फ आजादी। आज भी वैचारिक तौर पर पत्रकारों में भिन्नता तो दिखती है मगर साथ ही एक मकसद विहीन पत्रकारिता की अंधी दौड़ में भी वो शामिल दिखाई देते हैं, जो पहले नहीं था। ऐसे में पत्रकारिता के भी मायने बदले हैं, काम का तरीका बदला है स्वरूप बदला है।

अनूप आकाश वर्मा (पंचायत संदेश, संपादक)

 

आज की पत्रकारिता मिशन से हटकर केवल प्रोफेशन बन गयी है! किसी भी मीडियाकर्मी को इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि उसके द्वारा बनायी गयी न्यूज का क्या प्रभाव पड़ता है और उसका क्या औचित्य है ? मतलब सिर्फ इस बात से है कि उसे उस खबर के बदले रकम मिलती है या नहीं। वो रकम जिसके जरिये वो अपना और अपने परिवार को सुख सुविधाएं दिला सके। ऐसे में किसी पर आरोप लगाना कि वह कर्म के बजाये अर्थ को महत्व देने लगा है सही नहीं होगा क्योंकि कहीं न कहीं उसने समाज के बदलते परिवेश के साथ समझौता कर लिया है और ये कहना कि समाज की दिशा गलत है, ठीक नहीं!

आकाश राय (हिन्दुस्थान समाचार)

 

आजादी के पहले पत्रकारिता मिशन थी लेकिन धीरे धीरे जब समाज का विकास हुआ तो पत्रकारिता का भी विकास हुआ। सभी अखबार और चैनल टीआरपी की होड़ में जुट गए। इसके लिए उन्हें अपने जमींर से समझौता करते हुए पूंजी की ओर झुकना पड़ा, इसीलिए पैसा कमाने के चक्कर में पत्रकारिता का धीरे धीरे व्यावसायीकरण होने लगा। आज पत्रकारिता भी पैसा कमाने और रोजी रोटी चलाने का जरिया बन गई है।

आशीष सिंह (पीटीसी न्यूज)

 

पत्रकारिता आज एक व्यवसाय है ये बात एक दम साफ है इसमें कोई दो राय नहीं हैं। रामदेव और अन्ना के मामले में मीडिया की भूमिका सबके सामने है। अपनी स्वतंत्रता का रोना रोने वाली मीडिया ने सरकार का बचाव कुछ ऐसे किया कि कोई अंधा और विवेकहीन भी समझ जाये की मीडिया कितनी स्वतंत्र है। उसके बाद एक के बाद एक कई घटनाएं चाहे मुंबई ब्लास्ट के बाद राहुल वाणी, कश्मीर में तिरंगा या फिर दिग्गी राजा की हर बात पर संघ को बदनाम करने की नाकाम कोशिश, मीडिया ने इन सबको खूब जोर शोर से छापा और अपना मिशन दिखाया। सभी लोग भ्रष्टाचारी हैं या बेईमान हैं ऐसा कहना गलत है लेकिन हर बार बेईमानी को मजबूरी बता देना किसी भी लिहाज से ठीक नहीं है।

विकास शर्मा (आज समाज)

अगस्त अंक, २०११

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