संवादसेतु

मीडिया का आत्मावलोकन…

पूंजी प्रवाह के आगे नतमस्तक पत्रकारिता

लोकतंत्र में पत्रकारिता ही एक ऐसा पेशा है जिसे सामाजिक सरोकारों का सच्चा पहरूआ कह सकते हैं क्योंकि पत्रकारिता का लक्ष्य सच का अन्वेषण है। सामाजिक शुचिता के लिए सच का अन्वेषण जरूरी है। सच भी ऐसा कि जो समाज में बेहतरी की बयार को निर्विरोध बहाये जिसके तले हर मनुष्य खुद को संतुष्ट समझे।

पत्रकारिता का उद्भव ही मदांध व्यवस्था पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से हुआ था लेकिन आज की वर्तमान स्थिति में यह बातें बेमानी ही नजर आ रहीं हैं। खुद को आगे पहुंचाने और लोगों की भीड़ से अलग दिखने की चाह में जो भी अनर्गल चीज छापी या परोसी जा सकती हैं, सभी किया जा रहा है। अगर आज की पत्रकारिता को मिशन का चश्मा उतार कर देखा जाये तो स्पष्ट ह¨ता है कि मीडिया समाचारों के स्थान पर सस्ती लोकप्रियता के लिए चटपटी खबरों को प्राथमिकता दे रही है।

एक दौर हुआ करता था जब पत्रकारिता को निष्पक्ष एवं पत्रकारों को श्रद्धा के रूप में देखा जाता था। जो समाज के बेसहारों का सहारा बन उनकी आवाज को कुम्भकर्णी नींद में सोए हुक्मरानों तक पहुंचाने का माद्दा रखती थी। उस दौर के पत्रकार की कल्पना दीन-ईमान के ताकत पर सत्तामद में चूर प्रतिष्ठानों की चूलें हिलाने वाले क्रांतिकारी फकीर के रूप में होती थी। यह बात अब बीते दौर की कहानी बन कर रह गयी है। आज की पत्रकारिता के सरोकार बदल गये हैं और वह भौतिकवादी समाज में चेरी की भूमिका में तब्दील हो गयी है। जिसका काम लोगों के स्वाद को और मजेदार बनाते हुए उनके मन को तरावट पहुंचाना है। देश के सामाजिक चरित्र के अर्थ प्रधान होने का प्रभाव मीडिया पर भी पड़ा है और आज मीडिया उसी अर्थ लोलुपता की ओर अग्रसर है, या यूं कहिए की द्रुत गति से भाग रही है। इस दौड़ में पत्रकारिता ने अपने चरित्र को इस कदर बदला है कि अब समझ ही नहीं आता कि मीडिया सच की खबरें बनाती है या फिर खबरों में सच का छलावा करती है, लेकिन जो भी हो यह किसी भी दशा में निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं है।

पत्रकारिता का मूल उद्देश्य है सूचना, ज्ञान और मनोरंजन प्रदान करना। किसी समाचार पत्र को जीवित रखने के लिए उसमें प्राण होना आवश्यक है। पत्र का प्राण होता है समाचार, लेकिन बढ़ते बाजारवाद और आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण विज्ञापन इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि पत्रकारिता का वास्तविक स्वरूप ही बदल गया है। राष्ट्रीय स्तर के समाचारों के लिए सुरक्षित पत्रों के प्रथम पृष्ठ पर भी अर्द्धनग्न चित्र विज्ञापनों के साथ प्रमुखता से प्रकाशित हो रहे हैं। समाचार पत्रों का सम्पादकीय जो समाज के बौद्धिक वर्ग क¨ उद्वेलित करता था, जिनसे जनमानस भी प्रभावित होता था, उसका प्रयोग आज अपने प्रतिद्वन्द्वी को नीचा दिखाने के लिए किया जा रहा है। इससे पत्रकारिता के गिरते स्तर और उसकी दिशा को लेकर अनेक सवाल खडे़ हो गये हैं। फिल्म अभिनेत्रियों की शादी और रोमांस के सम्मुख आम महिलाओं की मौलिक समस्याएं, उनके रोजगार, स्वास्थ्य उनके ऊपर होने वाले अत्याचारों से संबंधित समाचार स्पष्ट रूप से नहीं आ पा रहें हैं। यदि होता भी है तो बेमन, केवल दिखाने के लिए।

पत्रकारिता के इतिहास पर नजर डाले तो समझ आता है कि भारत में पत्रकारिता अमीरों के मनोरंजन के साधन के रूप में विकसित होने की बजाय स्वतंत्रता संग्राम के एक साधन के रूप में विकसित हुई थी। इसलिए जब सन् 1920 के दशक में यूरोप में पत्रकारिता की सामाजिक भूमिका पर बहस शुरू हो रही थी, भारतीय पत्रकारिता ने प्रौढ़ता प्राप्त की। सन् 1827 में राजा राममोहन राय ने पत्रकारिता के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लिखा था- ‘मेरा उद्देश्य मात्र इतना है कि जनता के सामने ऐसे बौद्धिक निबंध उपस्थित करूं जो उनके अनुभव को बढ़ाएं और सामाजिक प्रगति में सहायक सिद्ध हो। मैं अपने शक्तिशाली शासकों को उनकी प्रजा की परिस्थितियों का सही परिचय देना चाहता हूं और प्रजा को उनके शासकों द्वारा स्थापित विधि व्यवस्था से परिचित कराना चाहता हूं ताकि जनता को शासन अधिकाधिक सुविधा दे सके। जनता उन उपायों से अवगत हो सके जिनके द्वारा शासकों से सुरक्षा पाई जा सके और अपनी उचित मांगें पूरी कराई जा सके। वर्तमान में राजा रामम¨हन राय की यह बातें केवल शब्द मात्र हैं जिन पर चलने में किसी भी पत्रकार की कोई रूचि नहीं है। आखिर उसे भी समाज में अपनी ऊंचाईयों को छूना है। आज के समय में मीडिया अर्थात् पत्रकारिता से जुड़े लोगों का लक्ष्य सामाजिक सरोकार न होकर आर्थिक सरोकार हो गया है। वैसे भी व्यवसायिक दौर में सामाजिक सरोकार की बातें अपने आप में ही बेमानी हैं। सरोकार के नाम पर अगर कहीं किसी कोने में पत्रकारिता के अंतर्गत कुछ हो भी रहा है तो वो भी केवल पत्रकारिता के पेशे की रस्म अदायगी भर है।

पत्रकारिता के पतित पावनी कार्यनिष्ठा से सत्य, सरोकार और निष्पक्षता के विलुप्त होने के पीछे वैश्वीकरण की भूमिका भी कम नहीं है। सभी समाचार-पत्र अन्तर्राष्ट्रीय अर राष्ट्रीय समाचारों के बीच झूलने लगे हैं। विदेशी पत्रकारिता की नकल पर आज अधिकांश पत्र सनसनी तथा उत्तेजना पैदा करने वाले समाचारों को सचित्र छापने की दौड़ में जुटे हैं। इन्टरनेट से संकलित समाचार कच्चे माल के रूप में जहां इन्हें सहजता से उपलब्ध हो रहे हैं, वहीं प्रौद्योगिकी का उपयोग कर अपने पत्रों को क्षेत्रीय रूप दे रहे हैं, जिसके कारण पत्रकारिता का सार्वभौमिक स्वर ही विलीन होने लगा है। ऐसी पत्र-पत्रिकाएं व टेलीविजन चैनल जो गे डे यानी कि समलैंगिकता दिवस मनाते हैं संस्कृति की रक्षा की बातों को मोरल पोलिसिंग कहकर बदनाम करने की कोशिशें करते हैं, भारतीय परंपरराओं और जीवन मूल्यों का मजाक उड़ाते हैं, खुलकर अश्लीलता, वासनायुक्त जीवन और अमर्यादित आचरणों का समर्थन करते हैं और कहते हैं कि यह सब वे पब्लिक डिमांड यानी कि जनता की मांग पर कर रहे हैं। परन्तु वास्तविकता यही है कि बाजारवाद से लाभान्वित होने के प्रयास में दूसरों पर दोषारोपण करके स्वयं को मुक्त नहीं किया जा सकता।

आज यदि महात्मा गांधी, राजा राममोहन राय, बाबू राव विष्णु पराड़कर या माखनलाल चतुर्वेदी जीवित होते तो क्या वे इसे सहन कर पाते, क्या उन जैसे पत्रकारों की विरासत को आज के पत्रकार ठीक से स्मरण भी कर पा रहे हैं\ क्या आज के पत्रकारों में उनकी उस समृद्ध विरासत को संभालने की क्षमता है\ ये प्रश्न ऐसे हैं जिनके उत्तर आज की भारतीय पत्रकारिता को तलाशने की जरूरत है, अन्यथा न तो वह पत्रकारिता ही रह जाएगी और न ही उसमें भारतीय कहलाने लायक कुछ होगा। इसके अलावा पत्रकारिता के लिए बड़ा खतरा गलत दिशा में बढ़ा कदम है, जिसके लिए बाजारवादी आकर्षण से मुक्त होकर पुनः स्थापित परंपरा का अनुसरण करना ही होगा, तभी पत्रकारिता की विश्वसनीयता बढ़ेगी। मीडिया संस्थानों और पत्रकारों को पीत पत्रकारिता एवं सत्ताभोगी नेताओं के प्रशस्ति गान के बजाय जनमानस के दुःख दर्द का निवारण, समाज एवं राष्ट्र के उन्नयन के लिए निःस्वार्थ भाव से कर्तव्य-पालन करना होगा, तभी वह लोकतंत्र में चौथे स्तंभ का अस्तित्व बनाये रखने में सफल हो सकेंगे।

आकाश राय, अगस्त अंक 2011

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