संवादसेतु

मीडिया का आत्मावलोकन…

मीडिया की परिपक्वता पर सवाल

न्यूज ऑफ द वर्ल्ड साप्ताहिक समाचार पत्र के बंद होने से मीडिया जगत में हलचल मच गई है। आर्थिक रूप से संपन्न पत्र न्यूज ऑफ द वल्र्ड ब्रिटेन का लोकप्रिय समाचार पत्र था। राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों को उठाने के लिए प्रसिद्ध यह पत्र कालांतर में अपने मार्ग से भटककर लोगों के निजी जीवन में तांक-झांक करने और मनोरंजन सूचना के नाम पर सस्ती एवं सनसनीखेज सामग्री प्रस्तुत करने लगा था। भारतीय मीडिया की भूमिका पर भी जब-जब सवाल उठते हैं, तर्क दिया जाता है कि भारतीय पत्रकारिता अपनी शैशव अवस्था में है, जबकि अमेरिका और ब्रिटेन की पत्रकारिता की परिपक्वता का उदाहरण देते हुए कहा जाता है कि भारतीय मीडिया समय के साथ उस स्तर तक पहुंच जाएगी। लेकिन यहां प्रश्न उठता है कि इस परिपक्वता का मतलब क्या है? अमेरिका और ब्रिटेन को आदर्श मानने से क्या भारत भी न्यूज ऑफ द वल्र्ड जैसी पत्रकारिता करेगा?  उस आदर्श तक पत्रकारिता उठकर पहुंचेगी या गिरकर?  इस पर पत्रकारों के विचार इस प्रकार से हैं-

न्यूज ऑफ द वर्ल्ड पत्र पर हुए विवाद और अब उसके बंद होने से वैश्विक स्तर पर मीडिया में नैतिकता और बाजारवाद को लेकर बहस शुरू हो गयी है। इस बहस ने एक बार फिर भारतीय मीडिया को कटघरे में खड़ा कर दिया है। आज भारतीय मीडिया ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां वो नैतिकता और आदर्शों की बलि चढ़ाकर बाजारवाद के चंगुल में फंसा नजर आ रहा है। आज खबरें, खबरें नहीं बल्कि विज्ञापन नजर आ रहीं है और साथ ही साथ समाचारों के फुटपाथीकरण ने भारतीय मीडिया की साख को गहरा आघात पहुंचाया है। भारतीय मीडिया पर आए दिन सवाल खड़े हो रहे हैं, विश्वसनीयता भी कम हुई है। बाजारीकरण का मीडिया पर खासा प्रभाव देखने को मिल रहा है। खबरों और मीडिया के बिकने के आरोपों के साथ-साथ कई नए मामले भी सामने आ रहे हैं। ऐसे में भारत में पत्रकारिता को किसी तरह अपने बूढ़े कन्धों पर ढो रहे पत्रकारों के माथे पर बल जरूर दिखाई दे रहे हैं। उनको यही चिंता है कि ये बच्चा बड़ा कब होगा। भारत में प्रिंट मीडिया इलेक्ट्रानिक मीडिया के मुकाबले ज्यादा परिपक्व नजर आता है, लेकिन वो भी बाजार के हाथों मजबूर है। ऐसे में मैं उम्मीद करता हूं कि भारतीय मीडिया जल्द ही अपनी शैशव अवस्था से बाहर आएगा और अपनी जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाएगा।

हिमांशु डबराल, आज समाज

कुछ दशक पहले मीडिया एक मिशन के रूप में जानी जाती थी, लेकिन वर्तमान समय में मीडिया व्यावसायिक हो गई है। आज कुकुरमुत्तों की तरह अखबार और चैनल खुल रहें हैं. टीआरपी की अंधी दौड़ में मीडिया अपने मार्ग से भटकती हुई नजर आ रही है, जबकि दर्शकों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। मेरे विचारानुसार पत्रकारिता को व्यवसाय न मानकर मिशन के रूप में देखा जाए तो ज्यादा बेहतर होगा

आशीष प्रताप सिंह, पीटीसी न्यूज, दिल्ली

सार्थक पत्रकारिता वही है जो देश के हित को ध्यान रखे। तात्कालिक लाभ कमाने के लिए सनसनीखेज पत्रकारिता का दुरूपयोग उसका भविष्य अंधकार की ओर ले जाएगा। हमें भारतीय पत्रकारिता को ब्रिटेन के संदर्भ में देखने की जरूरत नहीं है। पत्रकारिता के मूल्य विदेशी न होकर हमारे अपने होने चाहिए। पत्रकारिता में पूंजी का प्रभुत्व कम और देश सेवा का अधिक होना चाहिए। आदर्श पत्रकारिता माखनलाल चतुर्वेदी और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे महान दिग्गजों की थी जिसे पत्रकारिता का शैशव काल कहा जा रहा है । हमें उसी शैशव अवस्था की ओर वापस लौटना होगा।

विमल कुमार सिंह, भारतीय पक्ष

भारतीय पत्रकारिता शैशवावस्था में है! मैं नहीं मानता। रही बात सीखने की तो इसकी कोई सीमा या उम्र नहीं होती। न्यूज ऑफ द वल्र्ड बंद हो गया, हंगामा पसर गया। क्या इससे पत्रकारिता व्यवसाय से परे हटकर समाज सेवा में लग जाएगी, ऐसा नहीं होने वाला है। पत्रकार नौकरी करता है। उसे भी भूख लगती है, ऊपर उठने की ललक उसमें भी है, सबसे तेज के चक्कर में वह भी गलतियां करता है। यही उसके पेशे का उसूल है। और हां, पेशा और आदर्श को मिलाकर मत देखिए, बड़ा घाल-मेल है। नौकरी खतरे में पड़ जाएगी।‘‘

चंदन कुमार, जागरण जोश डाट काम

वर्तमान समय में मीडिया की भूमिका वाकई संदेह के घेरे में है, लेकिन इसके लिए मीडिया को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। कभी समाज और कद्दावर लोगो के हिसाब से कुछ करना पड़ता है तो कभी खुद की मजबूरी में, पर सच यही है कि गलत हो रहा है। जहां तक बात विदेशी मीडिया की नकल करने का है तो किसी की कॉपी करना एकदम गलत है, हां उससे कुछ बेहतर तथ्य निकाल कर खुद का विकास करना सही है। परिपक्वता के लिए खुद की समझ को परखना जरूरी है कि आखिर व्यक्ति या संस्था विशेष क्या चाहता है और उसके लिए किस प्रकार के मार्ग को अपनाता है- समझौते का या सिद्धांत का.

आकाश राय, हिन्दुस्थान समाचार

वर्तमान समय में समाचारपत्रों में एक सबसे बड़ी कमी यह आ रही है कि यहां हिन्दी भाषा पर अधिक जोर न देते हुए अंग्रेजी पर दिया जा रहा है। इसलिए मेरे विचार से अगर वास्तव में भारतीय पत्रकारिता की गरिमा बनाएं रखना है तो हमें अपनी मातृभाषा पर अधिक जोर देना चाहिए। हमें किसी भी अन्य भाषा का प्रयोग कर महान बनने से अच्छा है कि अपनी मातृभाषा पर गर्व करें।

सोहन लाल, राष्ट्रीय उजाला

यह चिंता की बात है कि मीडिया नकारात्मक चीजों को आगे ला रहा है जिससे समाज पर बुरा असर पड़ रहा है। मीडिया समाज, देश और सत्ता के बीच में सकारात्मक गतिविधियों को प्रोत्साहन दे क्योंकि यही एक माध्यम है जो देश-दुनिया में नकारात्मक को सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान कर सकता है। समाचार पत्र और समाचार चैनल यदि सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ चलें तो यह भारत के प्रगतिशील समाज की प्रगति के लिए बहुत अच्छा होगा।

अवनीश राजपूत, विश्व हिन्दू वायस, वेब पोर्टल  

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